परमाणु ऊर्जा संयंत्र बंद हों?

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption पिछले महीनों में दक्षिण भारत के कूडनकूलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाए जाने का भीषण विरोध किया गया है.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका में देश में बनाए जा रहे सभी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण पर रोक लगाने की मांग की गई है.

साथ ही ये अपील भी की गई है कि परमाणु दायित्व क़ानून 2010 को असंवैधानिक क़रार दिया जाए और जानकारों की एक स्वायत्त संस्था बनाई जाए, जो देश में मौजूदा और प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा की समीक्षा करे.

न्यायालय ने याचिका की सुनवाई शुक्रवार तक स्थगित कर दी है.

याचिकाकर्ताओं में पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम, पूर्व नौसेना प्रमुख एल रामदास, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी, प्रधानमंत्री के पूर्व सचिव केआर वेणुगोपाल और परमाणु वैज्ञानिक पीएम भार्गव शामिल हैं.

बीबीसी ने जब पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम से बात की, तो उन्होंने कहा कि जापान में फुकुशिमा संयंत्र में दुर्घटना होने के बाद जब दुनिया के कई देश (जर्मनी, इटली आदि ) अपने परमाणु कार्यक्रमों की दोबारा समीक्षा कर रहे हैं तो भारत क्यों नहीं.

टीएसआर सुब्र्ह्मण्यम ने कहा, “अमरीका का दबाव हो या भारत की भौगोलिक स्थिति या फिर पड़ोसी देश, भारत ने जो क़ानून बनाया है उसके तहत परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में दुर्घटना की स्थिति में प्लांट लगाने वाले की ज़िम्मेदारी कम आंकी गई है, जबकि ये समझना ज़रूरी है कि ऐसी दुर्घटना का प्रभाव लंबे समय तक रहता है और इसके आर्थिक मुआवज़े के लिए पर्याप्त प्रावधान होना चाहिए.”

भारत के परमाणु दायित्व क़ानून 2010 के मुताबिक किसी दुर्घटना की सूरत में दिए जाने वाले मुआवज़े की अधिकतम राशि 1500 करोड़ रुपए है.

याचिका में कहा गया है कि मुआवज़े की अधिकतम राशि पहले से तय करना और आपूर्तिकर्ताओं को दुर्घटना में ज़िम्मेदार ना मानकर मौजूदा क़ानून जनता के सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण में रहने के अधिकार का उल्लंघन करता है.

ऊर्जा के अन्य विकल्प?

सुब्रह्मण्यम ने बताया कि भारत की ऊर्जा की ज़रूरतों का पांच फीसदी से भी कम परमाणु ऊर्जा से पूरा होता है जिसके लिए यूरेनियम की ज़रूरत होती है.

समय के साथ यूरेनियम और महंगा होता जा रहा है और करोड़ों डॉलर का प्लांट लगने के बाद उसे चलाने का खर्चा भी बहुत ज़्यादा है, तो ऐसे में ऊर्जा के अन्य स्रोत के साथ परमाणु ऊर्जा की तुलना करनी चाहिए.

आर्थिक मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा भी कहते हैं कि भारत को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को कोयले, तेल या परमाणु स्रोत से पूरा करने के अलावा अन्य विकल्प देखने चाहिए. टीएसआर सुब्रह्मण्यम की ही तरह उनका मानना है कि सौर ऊर्जा के विकास के लिए भारत में बहुत अनुकूल परिस्थितियाँ हैं.

ग़ौरतलब है कि पिछले महीनों में दक्षिण भारत के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाए जाने का कड़ा विरोध किया गया है.

आख़िरकार सरकार को संयंत्र की सुरक्षा की समीक्षा के लिए विशेष जांच समिति का गठन भी करना पड़ा है. जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री वी नारायण स्वामी और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी इलाक़े का दौरा किया.

पड़ोसी देशों में नए संयंत्र

लेकिन परमाणु ऊर्जा से जुड़े ख़तरों की इन सब चर्चाओं के बीच, बांग्लादेश में पहला परमाणु संयंत्र लगाया जाने वाला है. पिछले महीने बांग्लादेश ने अपना पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के लिए रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी के साथ एक ऐतिहासिक परमाणु करार किया है.

वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भी चीन के साथ दो नए परमाणु संयंत्र लगाने का क़रार किया है. उम्मीद की जा रही है कि संधि के बाद 2013 तक बांग्लादेश के पहले दो परमाणु संयंत्रों पर काम शुरू हो जाएगा. इन संयंत्रों की क्षमता 1000 मेगावाट की होगी.

पाकिस्तान में भी परमाणु ऊर्जा से देश की क़रीब दो फीसदी बिजली ज़रूरतें ही पूरी होती हैं. इसके लिए पाकिस्तान के कराची शहर में पाकिस्तान परमाणु प्राधिकरण के तहत एक परमाणु बिजली संयंत्र काम करता है.

कराची का परमाणु संयंत्र 1972 में देश में बिजली की मांग पूरी करने के लिए लगाया गया था और पहले 137 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता था जो अब केवल 80 मेगावॉट रह गया है.

इसी महीने कराची से क़रीब 15 किलोमीटर दूर समुद्री तट पर स्थित इस बिजली घर में 'भारी पानी' का रिसाव हुआ था, जिसके बाद संयंत्र को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया है.

इस्लामाबाद के क़ायदे आज़म विश्वविद्यालय में प्रोफेसर परवेज़ हूडबॉय ने बीबीसी को बताया कि ये संयंत्र बहुत पुराना हो गया है और इसे बंद कर देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इस रिसाव से बड़ी दुर्घटना हो सकती थी लेकिन इसके बावजूद परमाणु ऊर्जा प्रमुख ने ऐलान किया कि ये संयंत्र अभी 10 साल और चलाया जाएगा.

प्रोफेसर परवेज़ हूडबॉय ने कहा, “जो दो नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाए जाने हैं वो भी कराची शहर में ही हैं, ये शहर बहुत बढ़ गया है और उसकी आबादी अब मुंबई जितनी यानी क़रीब 1 करोड़ 70 लाख हो गई है, अगर कोई दुर्घटना हुई तो इसके भयावह परिणाम हो सकते हैं”.

साथ ही उन्होंने कहा कि जनता में इन ख़तरों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है इसीलिए सरकार की नीति पर कोई तल्ख़ सवाल नहीं उठाए जा रहे.

संबंधित समाचार