क्या राहुल का जोश कांग्रेस की कायापलट कर पाएगा?

Image caption राहुल गांधी 2009 के चुनाव में जो क्रेज पैदा कर पाए थे, वो अब नही रहा.

राहुल गांधी ने एक आक्रामक और जोशीले भाषण के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिवर्तन के लिए ज़ोरदार अपील की है.

मौक़ा था विधान सभा के अगले चुनाव के लिए पार्टी के अभियान का शुभारंभ. स्थान था इलाहाबाद के गंगापार का झूसी क़स्बा, जो कभी पंडित जवाहर लाल नेहरु के संसदीय क्षेत्र फूलपुर का हिस्सा होता था.

पंडित नेहरु न केवल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे, बल्कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान वे युवाओं के नायक थे.

राहुल गांधी ने भी एक बाग़ी युवा के तेवर के साथ अपने परनाना नेहरु के कर्मक्षेत्र से कांग्रेस पार्टी का औपचारिक अभियान शुरू किया.

उन्होंने सत्ता के दो प्रमुख दावेदारों- मायावती और मुलायम सिंह यादव को चिकोटी भी काटी. ख़ुद को ग़रीबों, किसानों, दलितों, बुनकरों और पिछडों का असली हमदर्द भी जताया.

मगर क्या एक जोशीला भाषण विधान सभा चुनाव में विजय दिलाने के लिए पर्याप्त है?

ज़मीनी हकीकत यही है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी की बात तो दूर है कांग्रेस पार्टी को चौथे नंबर से तीसरे नंबर पर लाना भी एक कठिन चुनौती भरा काम है.

जातियों और आंकड़ों का खेल

पिछले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधान सभा में मात्र 22 सीटें मिलीं थीं.

कुल मतों में कांग्रेस की हिस्सेदारी मात्र नौ फ़ीसदी थी. कह सकते हैं कि इस नौ फ़ीसदी में उम्मीदवारों का निजी वोट ज़्यादा था और पार्टी का आधारभूत वोट बैंक नगण्य हो चुका है.

अगर नेहरु जी के ज़माने को याद करें, तो कांग्रेस का वोट लगभग 50 फ़ीसदी हुआ करता था.

1989 में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सत्ता से बाहर हुई, उस समय भी कांग्रेस को 28 फ़ीसदी वोट मिले थे.

इन 20 से 22 सालों में कांग्रेस का लगभग 20 फ़ीसदी वोट खिसक गया. इनमें दलित और मुस्लिम समुदाय के अलावा अगड़ी जातियां शामिल हैं.

दलितों को बहुजन समाज पार्टी ले गई. मुसलमानों को सपा-बसपा ले गईं.

अगड़ी जातियां भी सत्ता में हिस्सेदारी के लिए, जहां जैसा मौक़ा मिला बसपा, सपा और भाजपा से जुड गईं.

पिछले लोक सभा चुनाव में पारिस्थिति थोड़ी भिन्न थी. दिल्ली में फिर से कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना थी.

मुसलमान समाजवादी पार्टी से नाराज़ थे और अगड़ी जातियां बहुजन समाज पार्टी से. ग्रामीण मज़दूरों में नरेगा जैसी योजनाओं ने कांग्रेस के प्रति झुकाव पैदा किया.

इस सबका फ़ायदा कांग्रेस को मिला और उसे 21 सीटें मिल गईं. बाद में फिरोज़ाबाद उपचुनाव में कांग्रेस ने सपा से एक सीट और छीन ली.

ज़मीनी लगाव?

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Image caption उत्तर प्रदेश में फ़िलहाल मायावती का दबदबा बना हुआ है.

राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की बहाली की मुहिम और गाँवों में ग़रीबों के घर-घर जाकर एक नेक नीयत और भला नेता होने का आकर्षण पैदा किया. मध्यम-वर्गीय और नौजवान कामगारों में भी उनके प्रति आकर्षण आया.

लेकिन केंद्र सरकार में राष्ट्रमंडल खेलों और 2-जी के कथित घोटालों से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के आंदोलनों के प्रति कांग्रेस सरकार और राहुल गांधी के रवैए ने इन तबकों को निराश किया है.

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में चौतरफ़ा मुक़ाबले में सरकार बनाने के लिए कम से कम 30 फ़ीसदी वोट चाहिए और विधान सभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों और कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका होती है.

पिछले पांच सालों में भी राहुल गांधी न तो कांग्रेस में नए कार्यकर्ता जोड़ पाए, न ही किसी बड़े सामाजिक समूह से जुड़ पाए.

कांग्रेस पिछले कई चुनावों से जाति और धर्म से ऊपर उठकर विकास के मुद्दे पर वोट मांग रही है. लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद विकास का जो ढांचा भारत ने अपनाया है, उसमे अंग्रेज़ी और तकनीकी शिक्षा से वंचित ग़रीब दलित, पिछड़ा और मुस्लिम समुदाय फ़िट नहीं हुआ. इसलिए उसका लाभ उसे नही मिला.

जाति और धर्म- ये दो ऐसे सक्रिय सामाजिक संगठन हैं, जो भारत के चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं.

उत्तर प्रदेश में सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदारों, मायावती और मुलायम सिंह यादव ने इन्हीं के सहारे अपना ताना-बाना बुना है, जिसकी काट कांग्रेस के पास नहीं है.

राहुल गांधी जिस ग़रीबी और खेती किसानी को देखने जाते हैं. माया और मुलायम ने उसे अपने जीवन में भोगा है और वे उस समाज का हिस्सा हैं.

राहुल ने अपने साथ प्रतीकात्मक रूप से पंडित नेहरु की विरासत की याद दिलाई है. अगर व्यक्तित्व के आधार पर भी तुलना करें, तो जवाहर लाल नेहरु सुख और वैभव का त्यागकर लाठी और जेल खाने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में आए थे.

उन्होंने कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था और उनके साथ कार्यकर्ताओं का भावनात्मक लगाव था. नेहरु के पास देश के लिए एक दूरदर्शिता और सपना था.

इसके विपरीत राहुल गांधी एक शाही खानदान के युवराज के तौर पर राजनीति में आए हैं.

पार्टी के उन ज़मीनी कार्यकर्ताओं के साथ उनका कोई संवाद या आत्मीय संबंध नहीं है, जो गलियों, चौराहों या पान और चाय की दुकानों में आम लोगों के संपर्क में रहते हैं या बूथ स्तर पर चुनाव का प्रबंध करते हुए लाठी डंडे खाते हैं.

राहुल गांधी ने अभी तक तेज़ी से बदलती दुनिया के सामने अपना कोई राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक दर्शन भी सामने नहीं रखा है.

दूरदर्शिता का अभाव

राजनीतिक टीकाकारों का कहना है कि लोगों को जोड़ने के लिए राहुल गांधी को आम आदमी के सरोकारों के साथ साथ पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं से जुडना होगा और अपनी नीतियों तथा सकारात्मक कार्यक्रमों को घोषित करना पड़ेगा.

राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर रमेश दीक्षित कहते हैं ,“राहुल गांधी विपक्ष में नही हैं. वे भारत में हुकूमत चलाने वाली पार्टी के नेता हैं. उन्हें सवाल पूछने के बजाय स्वयं कुछ कर के सवालों का जवाब देना चाहिए.”

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा महत्व ये है कि यहाँ लोक सभा की सबसे ज़्यादा सीटें हैं.

राहुल गांधी की असल चुनौती ये है कि दो साल बाद लोक सभा के चुनाव होने वाले हैं. वे 2009 के चुनाव में जो क्रेज़ पैदा कर पाए थे, वो अब नही रहा.

अगर अगले विधान सभा चुनाव में वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं दिला पाते हैं, तो इससे उनकी नेतृत्व क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगने से कोई नही रोक सकता.

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