नंद नगरी की आग के सवाल

Image caption हर तरफ़ जले की गंध, जले कपड़ों और कीचड़ से सने हुए सैकड़ों जूते चप्पलों का ढेर

दिल्ली के नंद नगरी इलाके की तंग गलियों से गुज़रते हुए जब मैं घटना स्थल पर पहुंचा तो पत्रकारों का जमावड़ा था, पुलिस के बैरीकेड थे और पुलिस किसी भी व्यक्ति को सामुदायिक भवन के अंदर नही जाने दे रही थी.

अभी भी सैकड़ों की तादाद में किन्नर सामुदायिक भवन के बाहर बदहवास हालत में रो रहे थे.

गेट के भीतर झांकने की कोशिश की तो देखा कि जले हुए पंडाल का शामियाना बता रहा था कि आग कितनी भयंकर थी.

हर तरफ़ जले की गंध, जले कपड़ों और कीचड़ से सने हुए सैकड़ों जूते चप्पल का ढेर.

किन्नरों के दर्द का आलम ये था कि रो- रो कर अब आवाज़ ने भी उनका साथ छोड़ दिया था.

झूमर की चिंगारी

एक प्रत्यक्षदर्शी किन्नर ने बताया कि कल की भयावह रात कितनी काली थी.

हज़ारों की तादाद में किन्नर मौजूद थे कि अचानक टेंट में लगे झूमर से चिंगारी निकली और इससे पहले कि कुछ समझ में आता देखते ही देखते पूरा पंडाल जलकर ख़ाक हो गया. भगदड़ मच गई, लोग एक दूसरे के ऊपर गिरने लगे.

भागने का रास्ता सिर्फ़ एक ही था. वो गेट भी आधा बंद था. बाहर निकलने में कुछ लोग कामयाब हो गए, पर कुछ की वहीं चिता बन गई.

कुछ लोग ऐसे भी भीड़ में थे जिन्होंने छीना झपटी शुरू कर दी और सामान चुराकर भागने लगे.जब तक आग बुझाने वाले आते तब तक सब कुछ ख़ाक हो चुका था. चिंगारी से भड़की इस आग में 14 किन्नर मारे जा चुके थे और बीसियों को जली हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया.

आग की दहलीज़ पर दिल्ली

इस घटना ने एक बार फिर से आग के मुहाने पर बैठी दिल्ली के सच सामने ला दिया.

ये कोई पहला मौंका नही है जब कहीं किसी पंडाल में आग लगी हो.

इसी साल दिवाली के मौके पर दिल्ली में छोटी बड़ी दो सौ से ज़्यादा आग लगने की घटनाएं दर्ज़ की गईं.

पूरी दिल्ली में शादी के मौसम में पार्क और सामुदायिक भवन पंडालों से पट जाते हैं.

बड़ा सवाल

बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पंडाल आग के प्रकोप से सुरक्षित हैं.

क्या इन सारे आयोजनों के लिए अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिया जाता है.

दिल्ली अग्निशमन विभाग के निदेशक एके शर्मा कहते हैं कि इन अस्थाई ढाँचों के लिए 2009 से विभाग ने अनापत्ति प्रमाण पत्र देना बंद कर दिया है. अब ये ज़िम्मेदारी आयोजकों और प्रबंधकों की है कि वो आयोजन की जगहों पर आग से बचाव की व्यवस्था करें और उन्हें आयोजन स्थल पर आग से बचाव के प्रावधानों को अपनाने की घोषणा लिखनी पड़ती है, इसके बाद अगर किसी तरह की कमी पाये जाने पर उनके ख़िलाफ़ फ़ायर सेफ्टी एक्ट के तहत कार्रवाई होती है.

नंद नगरी के मामले में आयोजकों ने न तो इस तरह का कोई घोषणा पत्र दिया और न ही आग से बचाव के प्रावधान अपनाए.

दिल्ली पुलिस ने सम्मेलन के आयोजकों के ख़िलाफ़ लापरवाही से मौत का मामला दर्ज किया है और हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए दिल्ली सरकार ने दो-दो लाख रुपये का मुआवज़ा दिए जाने की घोषणा की है.

नंदनगरी हादसा कई तरह से आंखें खोलने वाला है.

किसी तरह के सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए जो मानक तय हैं, उन्हें पूरा करने की ज़िम्मेदारी आयोजक और प्रशासन दोनों निभाने में क्यों कोताही बरतते हैं?

और घटना घट जाने के बाद दोष एक दूसरे पर क्यों मढ़ देते हैं ?

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