भारत को सावधानी से चुनने होंगे विकल्प

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Image caption राजनेताओं को जनता को अपने साथ जोड़ने के लिए नए सिरे से विचार करना होगा

भारत के संस्थापकों के लिए राजनीतिक आज़ादी ही उनका पुरस्कार थी. लेकिन कई दशकों बाद बहुत से लोगों को लगता है कि इस आज़ादी से बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ.

भारत के उन व्यावसायिक कुलीनों के लिए, जो चीन से प्रतिस्पर्धा के लिए आतुर हैं, भ्रष्टाचार से उकता गए मध्यम वर्ग के लिए, लोकतंत्रवादी बुद्धिजीवियों के लिए और उन हताश नागरिकों के लिए, जिन्होंने सत्ता के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए हैं, लोकतंत्र भ्रांतियों की एक कथा भर है.

लोकतांत्रिक राजनीति को आर्थिक अवसरों के विस्तार के लिए आवश्यक निर्णायक क़दमों के रास्ते में बाधक माना जाने लगा है.

एक ऐसे समाज में जहाँ उम्मीदें तेज़ी से पनप रही हैं, जहाँ युवाओं के उतावलेपन के आगे पुराने विवाद धराशाई हो रहे हैं, वहाँ लोकतंत्र को लेकर ये निराशा आश्चर्यचकित भी नहीं करती.

एक ढर्रे में फंसी सरकार के सामने ये ख़तरनाक स्थिति है कि वह नागरिकों की सहज नाराज़गी को समझ न पाए. किसी भी समाज को आघात का ख़तरा तब सबसे अधिक होता है जब चीज़ों में सुधार हो रहा हो, तब नहीं, जब वह निष्क्रिय हो या उसमें एक ठहराव हो.

भारत में जिस गति से इतिहास बदला है उसने राजनीतिक निर्णयों को बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है. तेज़ी से तरक्की कर रहा भारत अब विकल्पों की अनदेखी नहीं कर सकता. आगे आने वाले दशकों में भारत को शिक्षा, पर्यावरणीय संसाधनों, सामाजिक और वित्तीय ज़िम्मेदारियों और विदेशी संबंधों के मामलों में अपनी नीतियों का चयन करना होगा, जो उसकी दिशा तय करेंगे. बाद में इन नीतियों को त्यागना या उनका पुनर्निर्धारण भी संभव नहीं होगा.

विकल्प

भारत जिन विकल्पों का चयन करेगा उसी से यह तय होगा कि वह अपने सामने खड़ी चुनौतियों का सामना किस तरह करेगा.

इनमें लोकतांत्रिक परिस्थितियों में ग्रामीण आबादी का शहरी आबादी में अब तक का सबसे बड़ा संक्रमण, मानव पूंजी के विकास की दिशा में कार्य और साझा आर्थिक विकास के लिए आवश्यक पर्यावरणीय और ऊर्जा स्रोतों को बचाए रखना शामिल है.

इससे ये भी तय होगा कि भारत शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी देशों से किस तरह से मुक़ाबला करेगा, किस तरह अपने अस्थिर पड़ोसियों को क़ाबू में रखेगा और एक ऐसे अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में, जहाँ पूंजी अस्थिर है और जहाँ नए और अनजाने ख़तरे जीवन का हिस्सा हैं, अपने रास्ते किस तरह से तलाश करेगा.

यह एक ऐसा एजेंडा है जो किसी भी समाज की अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में भी परीक्षा ले सकता है. लेकिन भारत को यह लक्ष्य ऐसे समय में हासिल करना होगा जब परिस्थितियाँ कठिन होंगी और संसाधनों का अभाव होगा. भारत के पास कुछ वर्षों की एक समयावधि होगी जिसके भीतर उसे मौक़े हथियाने होंगे.

जो कुछ भी भारत करेगा वह उसकी उद्यमिता प्रतिभा या तकनीकी कौशल या सस्ते मज़दूरों की उपलब्धता पर नहीं बल्कि इन सबसे ज़्यादा राजनीति पर निर्भर करेगी.

संभावनाएँ

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Image caption हज़ारे के आंदोलन को व्यापक जन समर्थन मिला

लेकिन ऐसे ऐतिहासिक समय में जब संभावनाएँ उभर रही हैं और नई समस्याओं का अंबार खड़ा हो रहा है भारत में राजनीति में बदलाव की परिस्थितियाँ बहुत छिन्न-भिन्न दिखती हैं.

राजनीतिक कल्पनाशक्ति, विवेक और कार्यान्वित करना कुछ ऐसी क्षमताएँ थीं जिनकी वजह से भारत अस्तित्व में आ सका लेकिन यह एक विचलित करने वाली विडंबना है कि अब ऐसा प्रतीत होता है कि ये तीनों क्षमताएँ अब भारत में नहीं बची हैं.

लोकतंत्र एक ऐसा विशिष्ट स्रोत था जिसने आधुनिक भारत को वैधता प्रदान की. लेकिन बहुत से लोगों को लगता है कि यही लोकतंत्र अब देश में बुराइयों का रास्ता बन गया है और इसकी वजह से बहुत से लोगों ने अपनी सारी उम्मीदें तंत्र को रिश्वतखोरी से ठीक करने में लगा रखी हैं.

1990 के दशक में शुरु हुए धर्म और जाति के आधार पर विशेषाधिकार या छूट के सिलसिले ने भारत को पहचान के संघर्ष में डुबो कर रख दिया था. और अब यह लगता है कि देश के कई हिस्सों में पूरी तरह से हावी हो गया है.

एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है कि भारत के आर्थिक विकास ने इन लड़ाइयों को थाम लिया है. हालांकि इसमें एक हद तक सच्चाई भी है, लेकिन ये बहुत आंशिक है. उदाहरण के तौर पर यह तर्क इस सवाल का कोई जवाब पेश नहीं करता कि क्यों भारत का सबसे विकसित और तेज़ी से विकसित हो रहा राज्य गुजरात, वह जो बड़े व्यवसाय के लिए एक ‘कैलेंडर गर्ल’ की तरह रहा है, वही गुजरात क्यों भारत में सबसे अधिक उग्र राष्ट्रवाद और ज़हरीली राजनीति से भरा राज्य है?

दरअसल जिस चीज़ ने, थोड़े समय के लिए ही सही, इस संघर्ष को शांत रखा, वह चाहे जितनी भी जर्जर हो, भारत की लोकतांत्रिक राजनीति ही है.

लोकतंत्र

भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र में ही यह क्षमता है कि उसने भारत की विविधता के बीच भी उसने सिर्फ़ सामूहिक पहचान को महत्व न देकर लोगों के भिन्न निजी हितों और उनकी पहचान को न केवल अहमियत दी बल्कि उसे बढ़ावा भी दिया.

इसी ने भारत को न केवल सामाजिक संघर्ष से बचाया वह कई अन्य देशों की तरह से आत्म-विनाश से बच गया. उदाहरण के तौर पर यदि भारत के क्षेत्रीय पड़ोसियों के खुरदुरे इतिहास की बात करें तो वे छोटी और एकरूप आबादी वाले देश थे लेकिन एक सामूहिक पहचान लादने की उनकी इच्छा ने उनका नुक़सान ही किया.

जिसने भारत का यह हश्र होने से बचाया वह भारत की सहज नैतिकता या सांस्कृतिक अद्वितीयता नहीं थी बल्कि यह एक राजनीतिक आविष्कार का परिणाम है. भारत के संस्थापकों की ओर रचे गए संवैधानिक लोकतंत्र के गूढ़ वास्तुशिल्प का परिणाम. लोकतंत्र की एकमात्र और विस्मयकारी उपलब्धि यह रही है कि उसने भारत को एक राजनीतिक इकाई बनाए रखा है.

और अब यह इकाई एक बड़ा बाज़ार बन गया है जिसकी ताक़त उसकी आंतरिक विविधता और गतिशीलता है. यह एक ऐसा अपरिमित बाज़ार बन गया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय पूंजी के लिए पर्याप्त आकर्षण मौजूद है और यही भारत के लिए सबसे बड़ा तुलनात्मक फ़ायदा साबित हो रहा है. इसी की वजह से ही भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था की संभावित युक्ति बन गया है.

1990 के दशक में शुरू हुआ पहचान का संघर्ष आने वाले वर्षों में कब तक थमा रहेगा वह भारत की इस राजनीतिक तंत्र की क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह देश के नए विकास को कितना टिकाऊ बनाए रखता है और आगे कितना विकास करता है.

आय, संपत्ति और अवसरों में बढ़ती विषमता एक वैश्विक सच्चाई है, लेकिन यह विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं में एक गंभीर समस्या बन सकती है.

इक्कीसवीं सदी के भारत में जब विकास उन हिस्सों में ज़्यादा होगा जो ज़्यादा उत्पादक हैं, तब उसके सामने आर्थिक कायापलट के साथ आने वाली असमानता का प्रभाव एक बड़ा सवाल रहेगा. यह एक ऐसा सवाल है जिसका हल किसी भी तेज़ी से विकसित हो रहे समाज में तलाश करना संभव नहीं हुआ है, चाहे वह लोकतांत्रिक हो या तानाशाही.

पुराने ढाँचे

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Image caption भारत को गाँव से शहर की ओर पलायन के मुद्दे का भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सामना करना होगा

आधुनिक इतिहास पर एक नज़र डालें तो हम पाएँगे कि बाज़ार आधारित पूंजीवाद के विकल्प की तलाश ने कई महान क्रांतिकारी और सुधारवादी आंदोलनों को जन्म दिया है. यह आंदोलन बहुत सफल नहीं हो सके और जिन जीवन परिस्थितियों की वजह से इन आंदोलनों का जन्म हुआ वह उतनी ही तनावपूर्ण और पीड़ादायक बनी रहीं. और यह बात दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ रही दो अर्थव्यवस्थाओं, चीन और भारत के लिए भी लागू होती है. इसका एक अर्थ ये भी है कि भारत और चीन जैसे देश के लिए वैश्विक ताक़त बन पाना उनकी इस क्षमता पर निर्भर करेगा कि वे बाज़ार आधारित पूंजीवाद का कितना अच्छा विकल्प ईजाद कर पाते हैं.

भारत के लिए ऐसे विकल्प की तलाश आने वाले वर्षों में एक प्राथमिकता होगी. भारत के आर्थिक भविष्य के लिए यह आवश्यक होगा कि बाज़ार आधारित पूंजीवाद के प्रति पनप रही वैश्विक विरक्ति का ज़्यादा असर भारत पर न हो. भारत में अधिकांश लोग इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि उनकी भी बारी आएगी. लेकिन हाल के हफ़्तों के घटनाक्रम ने हमें ये भी याद दिलाया है कि विषमता और असमानता को लेकर सहनशीलता तेज़ी से पाला भी बदल सकती है.

भारत में सिर्फ़ छह दशकों के समय और लोकतंत्र ने प्राचीन ढाँचों को तोड़ दिया है और एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया है, इसलिए ये हो सकता है कि तेज़ी से हो रहा असंतुलित विकास एकाएक ही उस गूढ़ आत्मवंचना को धराशाई कर दे, जिसने अब तक भारत में असंगत विषमता के बावजूद लोगों को सामूहिक प्रदर्शन से रोके रखा है.

ऐसे समय में जब राजनीतिज्ञ अपनी लोक-लुभावन नीतियों के भरोसे हैं, अपनी नव-अर्जित समृद्धि की वजह से भारत के कॉर्पोरेट जगत ने भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. अगर एक नई राजनीतिक कल्पनाशक्ति और विवेक का संचार नहीं हुआ तो वो लोग, जो विकास की तेज़ रफ़्तार में या तो अलग-थलग पड़ गए हैं या अपनी संपत्ति गँवा बैठे हैं, अपनी नाराज़गी में भारत के इतिहास का रुख़ मोड़ सकते हैं.

(सुनील खिलनानी, किंग्स कॉलेज, लंदन के किंग्स इंडिया इंस्टीट्यूट में अवंता प्रोफ़ेसर और निदेशक हैं. वे ‘द आइडिया ऑफ़ इंडिया’ नाम की चर्चित किताब के लेखक भी हैं, जिसका नया संस्करण, नई भूमिका के साथ जनवरी, 2012 में प्रकाशित होगा.)

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