ख़ुद को उदार मानने वाला, सरकार के लिए एक 'क्रूर चेहरा'

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मुल्लाजोला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी को भारत सरकार कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के एक 'क्रूर चेहरे' के रूप में देखती है.

ख़ुद किशनजी ने एक साक्षात्कार में भी यह दावा किया था कि उन्होंने सौ के करीब लोगों को मारा है.

मगर इसके बावजूद वह अपने आपको माओवादियों में सबसे उदार नेताओं में मानते थे. किशनजी माओवादियों की जनमुक्ति छापामार सेना के कमांडर-इन-चीफ़ थे और ऐसा कहा जाता है कि संगठन में वह गणपति के बाद दूसरे नंबर पर थे.

चौवन साल के कोटेश्वर राव के पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उनकी पढ़ाई लिखाई आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले में हुई.

कहा जाता है कि आपातकाल के बाद वह भूमिगत हो गए थे और फिर 1980 के दशक में पीपल्स वॉर के गठन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी.

इसके बाद उन्हें पूर्वी भारत में संगठन को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. कहा जाता है कि किशनजी ने माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) और पीपल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) के विलय में भी अहम भूमिका निभाई थी.

मीडिया से रिश्ता

इन दोनों संगठनों के विलय के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ. किशनजी उन चुनिन्दा माओवादी नेताओं में से एक थे जो मीडिया से समय-समय पर रूबरू हुआ करते थे. पश्चिम बंगाल के जंगलमहल के इलाक़े में मोर्चाबंदी किए हुए किशनजी समाचार पत्रों और टीवी चैनेलों के दफ्तरों में फ़ोन कर लंबे-लंबे साक्षात्कार दिया करते थे.

मगर जब कुछ दिनों पहले उनके मुठभेड़ में घायल होने की ख़बर आई तो समाचार पत्रों और चैनलों को उनके फ़ोन कॉल अचानक बंद हो गए. कहा जाता है कि संगठन में किशनजी की ख़ूब चलती थी, यानी वे काफ़ी ताक़तवर थे. इसलिए यह कहा जाता है कि उन्होंने कई नेताओं को संगठन से निकाल दिया या फिर उनसे इत्तेफ़ाक नहीं रखने वाले कई बड़े नेताओं ने संगठन से किनारा कर लिया. जानकारों का मानना है कि मुठभेड़ में हुई उनकी मौत से माओवादियों को झटका ज़रूर लगेगा.

मगर माओवादियों के बीच एक बात आम है और वह है 'एक चेहरे के पीछे कई नाम और एक नाम के पीछे कई चेहरे.'

किसी राजनीतिक दल से हटकर माओवादियों का संगठन फ़ौज की तरह चलाया जाता है जिसमे नेतृत्व की दूसरी पंक्ति हमेशा तैयार रहती है.

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