इसी दिन दहली थी मुंबई....

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Image caption साल 2008 में मुंबई पर हुए इस हमले में 160 से ज़्यादा लोग मारे गए थे

तीन साल पहले 26 नवंबर के दिन मुंबई पर हुए हमले की बरसी पर शनिवार को मुंबई में इसकी याद में कई सभाएं आयोजित की गई.

साल 2008 में हुआ ये हमला 60 घंटे तक जारी रहा था जिसमें 160 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

मुंबई में 26/11 हमलों की बरसी पर बीबीसी संवाददाता जुबैर अहमद ने इससे जुड़ी कुछ यादें ताज़ा की जिनके बारे में सोचकर लोग आज भी सिहर उठते है.

मुंबई के भीड़-भाड़ वाले इलाके कोलाबा में लिओपोल्ड कैफ़े ग्राहकों से खचा खच भरा है, अधिकतर ग्राहक विदेशी हैं.

लोग आपस में गप-शप करने में मशगूल है और खाने का भी मज़ा ले रहे हैं.

'ऐसा ही माहौल रहा होगा तब भी'

ठीक इसी तरह का माहौल था आज से तीन साल पहले, यानी 26 नवंबर 2008 की रात को, जब अचानक दो बन्दूकधारियों ने इस कैफ़े पर हमला कर दिया था.

वे अपने कलाशनिकोव राईफ़लों से अंधाधुन्ध गोलियां चलाते हैं. कोई टेबल के नीचे छिप जाता है, कोई भागने की कोशिश करता है तो कोई बदनसीब इन हमलों का शिकार हो जाता है.

यहाँ गोलीबारी में दस लोगों की मौत हो जाती हैं. मरनेवालों में यहाँ का एक बेयरा पीर पाशा भी है.

हमले के दौरान रेस्त्रां की रसोई में होने के कारण पीर पाशा के भाई मोहम्मद पाशा की जान बच जाती है.

लेकिन भाई के मारे जाने के ग़म में वो शराब पीने लगता है और डेढ़ साल बाद उसकी भी मौत हो जाती है.

इन दो हमलावरों के साथी मुंबई शहर के दूसरे इलाकों में भी इसी तरह के हमलें करते है.

साठ घंटों तक चला हमला

ताज महल होटल, ट्राइडेंट होटल, छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन और यहूदी केंद्र चाबाड सेंटर पर भी हमलें होते है.

अगले 60 घंटों तक ये हथियारबंद लड़ाके शहर में अलग-अलग जगहों पर हमला करते है.

आख़िर में दस बन्दूकधारियों में से नौ मारे जाते हैं और एक पकड़ लिया जाता है.

मुंबईवासी 26 नवंबर को हुए हमलों में मरने वालों के लिए आज भी इंसाफ़ मांग रहे हैं.

'इंसाफ़ नही मिला'

लिओपोल्ड कैफ़े में कुछ भारतीय ग्राहकों का कहना है की अजमल कसाब को फांसी दे दी जाती तो इन्साफ मिल जाता.

अजमल कसाब वो अकेला बंदूकधारी था जो इस हमले में पकड़ा गया था.

भारतीय अदालतों में उसे फांसी की सजा सुनाई गयी थी.

कैफ़े में आए ग्राहक सौरभ वर्मा बीयर का एक घूंट पीते हैं और कहते हैं, "अजमल कसाब का गुनाह साबित हो गया है अदालत में भी. अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई है, फिर देरी किस बात की? उसे फ़ौरन फांसी पर चढाओ तब हमें चैन मिलेगा."

गोलियों के घाव

लिओपोल्ड कैफ़े में हमले के कुछ दिनो बाद ही रौनक लौट आई थी लेकिन इसकी दीवारों पर गोलियों से हुए छेद आज भी उन हमलों की याद दिलाता है.

लिओपोल्ड के मालिकों ने गोलियों की इन निशानों को यादगार की तौर पर दीवारों पर रहने दिया है.

पहले के मुकाबले अब इस कैफ़े में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और केवल जांच पूरी होने के बाद ही ग्राहकों को अन्दर जाने दिया जाता हैं.

हालाँकि ये सुरक्षा उपाय खतरनाक हमलों की स्थिति में लोगों का बचाव नहीं कर सकेंगे.

क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये कैफे अब भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है?

मैने जर्मनी से आई दो महिला सैलानियों से पूछा, ''आपको डर नहीं लगता लिओपोल्ड आने में?''

इनमे से एक ने कहा, ''मैं हमलों से पहले भी आई थी और इस बार हमलों के बाद आई हूँ. मेरे अन्दर कोई डर नहीं. मुझे भारत में कहीं भी जाने से डर नहीं महसूस होता.''

उसकी सहेली ने कहा, ''जर्मनी में बहुत से लोगों को मालूम तक नहीं है कि साल 2008 में मुंबई में हमले हुए थे.''

चाबाड हॉउस में अब कोई नही रहता

लिओपोल्ड कैफ़े से दस मिनट की दूरी पर स्थित है चाबाड हॉउस, जो कि यहूदियों का एक धार्मिक केंद्र है.

चाबाड हॉउस की इमारत को इस हमले में काफ़ी क्षति पहुंची थी लेकिन मरम्मत के बाद यह इमारत बिल्कुल नई जैसी लगती है.

ये अलग बात है कि आजकल यहाँ कोई नहीं रहता है.

दो पहरेदार बाहर मिलते हैं और अन्दर आने से लोगों को रोक देते हैं.

इसराइल से आये एक यहूदी नागरिक ने कहा, ''हम केवल एक यादगार सभा कर रहे हैं. इस इमारत में एक यहूदी जोड़ी को हमला करने वालों ने मारा था.''

इस व्यक्ति ने बताया कि वह अब पहले से अधिक सतर्क हैं और पत्रकारों तक से बात करने में परहेज़ करते है.

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