स्टालिन की बेटी और भारत

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Image caption स्वेतलाना का हाल में अमरीका में निधन हो गया है. ये तस्वीर 27 अप्रैल 1967 की है जब स्वेतलाना ने न्यूयॉर्क में एक प्रेसवार्ता को संबोधित किया था.

सोवियत संघ के चर्चित नेता स्टालिन की बटी स्वेतलाना अलिलुयेवा का 85 वर्ष की आयु में अमरीका में निधन हो गया है.

उनका भारत से मज़बूत नाता था. वे अपने पिता के बजाय अपनी मां के नाम का इस्तेमाल करती थीं.

वे ब्रजेश सिंह की ‘अनौपचारिक’ पत्नी थीं. ब्रजेश सिंह उन भारतीय कम्युनिस्टों में से एक थे जिन्होंने बीसवीं सदी के तीसरे दशक के बाद मॉस्को को अपना घर बनाया था.

साल 1967 में ब्रजेश सिंह की मौत हो गई. स्वेतलाना ने ये निश्चित किया था कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रिति-रिवाज़ों के हिसाब से हो. बाद में वे ब्रजेश सिंह कि अस्थियां गंगा में बहाने के लिए भारत भी लाई थीं.

हालांकि इसमें उन्हें वक़्त लगा क्योंकि सोवियत नेताओं ने स्वेतलाना को ऐसा न करने के लिए मनाने की काफ़ी कोशिश की.

उसके बाद कई साक्ष्य सामने आए हैं जिनके अनुसार उस समय के सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ने उनसे कहा था कि वो एक बड़ा जोख़िम ले रही हैं क्योंकि कट्टर हिंदुओं में विधवाओं को मृत पति के साथ जलाने की परंपरा है.

लेकिन स्वेतलाना का इरादा पक्का था.

उन्हें भारतीय वीज़ा मिलने में दिक्कत नहीं आई क्योंकि अन्य वजहों के अलावा ब्रजेश सिंह के भतीजे दिनेश सिंह इंदिरा गांधी के क़रीबी थे और केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री भी थे.

जब वे उत्तर प्रदेश में अपने पति के पुश्तैनी गांव से दिल्ली लौटीं तो भारत नेहरू के बाद पहले आम चुनाव की गहमागहमी के बीच था.

'छोटे परमाणु धमाके जैसी ख़बर'

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Image caption स्वेतलाना अपने पिता जोज़फ़ स्टालिन के साथ.

आम चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में तो आई लेकिन काफ़ी कम बहुमत से. साथ ही इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच एक तनावपूर्ण सत्ता संघर्ष भी जारी था. देसाई दूसरी बार इंदिरा गांधी को चुनौती दे रहे थे लेकिन आख़िर में उन्हें उप प्रधानमंत्री बनने के लिए राज़ी किया गया था.

इन्हीं राजनीतिक हालात के वजह से ना तो मीडिया ने और ना ही सियासतदानों ने स्वेतलाना की दिल्ली में मौजूदगी में कोई दिलचस्पी ली.

लेकिन अचानक एक सुबह एक छोटे परमाणु धमाके जैसी ख़बर आई – स्टालिन की बेटी ने भारतीय सरज़मीं पर होते हुए अमरीका में शरण लेने की ठानी है. सोवियत संघ ग़ुस्से में था और उसने इस ग़ुस्से को छिपाया भी नहीं.

भारत इसमें कुछ नहीं कर सकता था लेकिन नज़दीकी संबंध होने के बावजूद कुछ समय तक मॉस्को और दिल्ली के बीच रिश्ते तनावग्रस्त रहे.

सनसनीख़ेज कहानी

स्वेतलाना के अमरीकी शरण में जाने की कहानी भी काफ़ी सनसनीखेज थी.

स्वेतलाना भारत में सोवियत संघ के राजदूत निकोलाई बेनेडिक्टोव के यहां सोवियत दूतावास ठहरी हुई थीं. राजदूत उन्हें वापस मॉस्को लौटने भेजने के लिए मना रहे थे.

स्वेतलाना ने राजदूत को बताया वो अपनी यात्रा के इंतज़ाम करने के लिए बाहर जा रही हैं. उन्होंने एक टैक्सी बुलाई और पास ही स्थित अमरीकी दूतावास में चली गईं.

अमरीकी दूतावास तब तक बंद हो चुका था. स्वेतलाना ने ड्यूटी पर तैनात अधिकारी को बताया कि वो कौन हैं और क्या चाहती हैं.

लगभग घबराते हुए अधिकारी ने सीधे अमरीकी राजदूत चेस्टर बॉवल्स को फ़ोन घुमाया और कहा कि वे तुरंत दफ़्तर आ जाएं क्योंकि हालात ऐसे हैं जिनके बारे में फ़ोन पर बात नहीं की जा सकती.

चेस्टर बॉवल्स आए, स्वेतलाना से बात की और उन्हें एक नोटपैड दिया. और इस नोटपैड पर स्वेतलाना को अपने देश जाने के बजाय अमरीका जाने का कारण लिखने को कहा.

सीआईए अधिकारी के साथ एयरपोर्ट पर

स्वेतलाना ने कारण लिखा और जब साल भर बाद उनकी पुस्तक में ये छपा तो ये प्रभावशाली और पढ़ने लायक़ दस्तावेज़ साबित हुआ.

जब स्वेतलाना नोटपैड पर लिख रही थीं, चेस्टर बॉवल्स ने अमरीकी विदेश मंत्री डीन रस्क को एक ‘गोपनीय’ टेलीग्राम किया, जिसमें हालात का ब्यौरा था और साथ ही आगे की कार्रवाई पर निर्देश मांगे गए थे.

अमरीकी राजूदत ने अपनी टेलीग्राम के अंत में लिखा, “अगर मुझे भारतीय समयानुसार मध्यरात्रि तक विदेश मंत्रालय का जवाब नहीं मिला, तो मैं अपनी ज़िम्मेदारी पर, उसे अमरीकी वीज़ा दे दूंगा. ”

राजदूत ने बाद में बताया था कि जैसा कि उन्हें उम्मीद थी, आधी रात तक कोई निर्देश नहीं आया.

विदेश मंत्रालय के जवाब के अभाव में राजदूत ने एक सीआईए अधिकारी के साथ स्वेतलाना को रोम की एक फ़्लाइट में सवार होने के लिए एयरपोर्ट भेज दिया.

जब स्वेतलाना रोम में सुरक्षित पहुंच गईं तभी इस सनसनीख़ेज़ ख़बर को जग ज़ाहिर किया गया.