'तंदूरी की तानाशाही मुग़लई का मिथक'

दिल्ली शहर के सौ सालों का ज़िक्र हो और इस शहर के खाने और यहां के ज़ायकों पर बात न हो ये मुमकिन नहीं. कई सौ साल का इतिहास लिए ये शहर आज हमारे लिए भारत का प्रारुप बन गया है, लेकिन दिल्ली की अपनी संस्कृति क्या है, क्या है यहां के खाने की वो ख़ासियत जो हमें मुंबई या कोलकाता या फिर किसी और शहर में नहीं मिलेगी.

'दिल्ली कल आज और कल' की इस कड़ी में इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हमने मुलाकात की दिल्ली में रहने वाले प्रोफेसर पुष्पेश पंत से.

पुष्पेश जी पिछले 46 साल से दिल्ली में रह रहे हैं और इस शहर और यहां के खानों से उनका रिश्ता दिल और ज़बान का ही नहीं बल्कि क़लम का भी रहा है.

दिल्ली का एक अर्थ है 'देहलीज़' है और पुष्पेश पंत की मानें तो ये शहर वाकई भारत के अलग-अलग खानों और उसकी बहुसांस्कृतिक छटा की देहलीज़ है.

दिल्ली के खानों को असल में चार अलग-अलग तरह के स्वाद में बांटा जा सकता है. जिनमें इस शहर में बसने वाले बनियों, कायस्थों, पंजाबियों और मुसलमानों के ज़ायके शामिल हैं.

यही वजह है कि अपने इस सफ़र की शुरुआत हमने की पुरानी दिल्ली से भी पुरानी एक दिल्ली से जहां कभी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया बसते थे. निज़ामुद्दीन वो इलाका है जिसकी तहज़ीब और ज़ायकों का असर दिल्ली पर आज भी हर तरफ है.

‘मुग़लई का मिथक’

Image caption निज़ामुद्दीन की गलियों में आज भी पाए, निहारी, दाल-गोश्त और खमीरी रोटियों का जलवा बरक़रार है.

19वीं सदी की शुरुआत में मुग़लों का दौर था और जामा मस्जि़द के साए तले दिल्ली की गलियों में क़बाब और सोहन हलवे की महक थी. निहारी, पसंदे, बिरयानी और स्ट्यू दिल्ली के खाने की पहचान हुआ करते थे. निज़ामुद्दीन का ये इलाका दिल्ली के खाने को लेकर फैले ‘मुग़लई के मिथक’ को भी तोड़ता है.

पुष्पेश कहते हैं, ''दिल्ली का खाना जिसे मुग़लई कहकर दुनियाभर में परोसा जाता है वो असल में फ़ारसी खाने के नहीं बल्कि तुर्को-अफ़ग़ान खाने के नज़दीक है. दिल्ली में मिलने वाला मांसाहारी भोजन भले ही अपने मिजाज़ में खालिस नूरजहानी, चंगेज़ी, मुग़लई न हो लेकिन इन्ही नामों की ओट में बेचा जाता है.''

निज़ामुद्दीन में आज भी हर तरफ़ दिखती है देग़ में पकती बिरयानी, फिरनी-बालूशाही, उलटे तवे की गर्मागरम रोटियां और गोश्त के एक से बढ़कर एक व्यंजन.

दिल्ली के चाट और खोमचे वाले इसी दौर की निशानियां है जो आज भी हमारे बाज़ारों और गलियों की शान हैं.

तभी हमें दिखी चांदी से चमकते नक्क़ाशीदार बर्तनों की एक दुकान जिसने मुग़लों के शाही दस्तरखान की याद को एक बार फिर ताज़ा कर दिया.

'परांठे वाली गली'

निज़ामुद्दीन के बाद हमने रुख किया चांदनी चौका का. लाल किले के साए में बसे शाहजहानाबाद यानि पुरानी दिल्ली का ये इलाका किसी ज़माने में दिल्ली का दिल हुआ करता था. पुरानी दिल्ली में उन दिनों व्यापारी, दुकानदार, शाही कामगार बसते थे. यो वो लोग थे जो दरबार के नज़दीक थे और जिनके खाने-पहनने-ओढ़ने में संपन्नता की ठसक और शाही ठाठ को अपनाने की ललक दिखती थी.

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Image caption दिल्ली की मशहूर पराठें वाली गली में 1857 में बनी पराठों की यह दुकान आज भी उसी जगह मौजूद है.

चांदनी चौक की मशहूर पराठें वाली गली में मौजूद 1875 में बनी एक दुकान पर हमने टमाटर परांठे, पापड़ परांठे और नींबू परांठे का स्वाद चखा और इस बीच इस दुकान की छठी पीढ़ी आनंद तिवारी से बातचीत का दौर चल पड़ा.

आनंद कहते हैं, ''पहले एक आने का परांठा हुआ करता था और दो तरह के परांठे थे सादा और आलू का. अब तीस रुपए का पराठां है और 22 तरह के परांठे आपको मिल जाएंगे. पहले पंगत में बैठकर पानी के लोटे साथ परांठा परोसा जाता था लेकिन आज लोग बैठने की बढ़िया जगह चाहते हैं. ज़माना अब वो नहीं रहा.''

1911 की घोषणा के बाद जैसे-जैसे दिल्ली अंग्रेज़ों के लिए महत्वपूर्ण हुई, खाने-पीने के नए तौर तरीकों ने भी इस शहर का रुख किया.

अंग्रेज़ अधिकारी और उनके कारिंदे अपने साथ अंग्रेज़ी खानों का ज़ायका दिल्ली लाए और एक समय ऐसा भी आया जब भारतीयों के लिए उनका अपना ही खाना शानो-शौकत का हिस्सा नहीं रहा.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नई दिल्ली मानो अंग्रेज़ अधिकारियों और सिपाहियों की छावनी में बदल गई थी और इन लोगों ने शहर में एंग्लो-भारतीय खानों का आग़ाज़ किया. जल्द ही ये खाने भारतीय दावतों और रेस्त्रां की सूचियों का हिस्सा हो गए.

Image caption दिल्ली का एक अर्थ है देहलीज़ जहां आने वाले लोग भारत के हर राज्य, हर क्षेत्र के खाने का ज़ायका चख सकते हैं.

1930 में नए शहर के उदघाटन के बाद लाहौर, कलकत्ता और मुंबई की तरह दिल्ली ने भी अपनी पहचान स्थापित की. ये सत्ता का गढ़ था और हर आमोख़ास शख़्सियत इससे जुड़ना चाहती थी.

शहर में पश्चिमी जीवनशैली का रंग घुलने लगा और रेस्त्रां, खाने के साथ अब मनोरंजन की भी जगह थे. लाइव-संगीत, डांसिंग फ्लोर और खाने की सूची में ग्रिल्ड, रोस्टेड, बेक्ड खाने, सूफ़ले, सूप सब कुछ शामिल था.

कनॉट-प्लेस में उस दौर में खुले स्टैंडर्ड, वेंगर्स और गेलॉर्ड जैसे रेस्त्रां शहर की युवा पीढ़ी के लिए चांदनी चौक की हलचल से दूर रुमानियत भरे अड्डे बन गए.

40 के दशक में जब ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ का बिगुल बजा तब दिल्ली राजनीतिक उठापटक का गढ़ बन गई और आज़ादी के बाद हुए विभाजन ने जिस शहर पर सबसे ज़्यादा असर डाला वो था दिल्ली.

1947 में विभाजन के बाद हज़ारों की संख्या में यहां आए विस्थापितों के साथ दिल्ली में घुले पंजाबियत के रंग ने शहर की रग-रग पर अपनी छाप छोड़ी.

Image caption विस्थापितों के साथ पहली बार दिल्ली में तंदूर आए और दिल्लीवालों ने तंदूरी का स्वाद चखा.

विस्थापितों के साथ इस शहर में एक नई चीज़ आई जिसे पहले पहल देखकर लोग हतप्रभ रह गए. शरणार्थी शिविरों के आसपास बड़े-बड़े तंदूर लगे और दिल्लीवालों के लिए तेज़ी से बनतीं गर्मा-गरम रोटियों का तिलिस्म टूटा.

ये दिल्ली के फैलने और बढ़ने का दौर था. जगह-जगह ढाबे खुले जो घर से दूर घर के से खाने की सुविधा लिए थे. दाल, रोटी, सब्ज़ी और चिकन-करी की सादगी लिए ये ढाबे जल्द ही दिल्ली वालों के दिल पर राज करने लगे.

'स्ट्रीट-फूड' का जलवा

ढाबों के अलावा खोमचे और रेहड़ियां अप्रावासियों के लिए रोज़गार का ज़रिया थीं और देशभर के खानों का झरोखा भी. दुनियाभर में मशहूर हुए दिल्ली के ऐसे ही दो ‘खोमचे-वालों’ की दास्तां बयां करते हुए पुष्पेश पंत कहते हैं, ''दिल्ली में मोतीमहल की शुरुआत करने वाले कुंदन लाल जी जिन्हें बटर-चिकन की इजाद से भी जोड़कर देखा जाता है और क्वालिटी रेस्रां के मालिक पीएन लांबा साहब ने बहुत छोटे स्तर पर अपनी दुकानों की शुरुआत की थी. ये वो लोग हैं जिनकी दुकानें और खाने गलियों से निकलकर दुनियाभर में पहुंचे हैं.''

पंजाबी स्वाद और संस्कृति ने भारतीयों ही नहीं बल्कि विदेशियों को भी अपना मुरीद बना लिया है. विदेशियों के लिए ये 'तंदूरी' स्वाद आज दिल्ली ही नहीं बल्कि भारत की पहचान है.

लेकिन इस खाने ने दिल्ली का जो पनीरीकरण किया वो खाने के शौकीनों को रास नहीं आता. पुश्पेश कहते हैं, ''पंजाबी खाना और तहज़ीब दिल्ली की आबो-हवा में घुलमिल चुकी है. ‘कुक्कड़’ के तंदूरी पुनर्जन्म ने हर ज़ायके को पछाड़ दिया है और शाकाहारी लोगों के लिए ‘दाल मखनी’ इबादत की तरह हो गई है. यहां तक की मौसमी सब्जियों की जगह पनीर ने ले ली है. ‘पिंडी, पेशावरी, ख़ैबर’ जैसे नाम जो कभी खानों के साथ जुड़कर उनकी पहचान और स्वाद को बयां करते थे अब ‘शाही’ और ‘कढ़ाही’ हो कर रह गए हैं.''

बहुसांस्कृतिक दिल्ली

दिल्ली जब आज़ाद भारत की राजधानी बनी तब एक प्रशासनिक शहर के रुप में भी उसका रुतबा बढ़ता गया.

दफ़्तरों और अफ़सरों, बाज़ारों और खरीददारों के इस बोलबाले के बीच तरह-तरह की चाट, मिठाई और भारतीय नाश्तों ने दिल्ली रुख किया. कई दक्षिण भारतीय होटल खुले और बंगाली-गुजराती खाने के गढ़ पनपे लगे.

दिल्ली में इस ज़ायके का सबसे पुराना गढ़ बंगाली मार्केट ही हमारा अगला पड़ाव था.

Image caption दिल्ली में दुनियाभर से आए विदेशी मेहमान तरह-तरह के खानों और उनकी रंगबिरंगी महक के प्रशंसक हैं.

पुष्पेश ने हमें बताया कि इस इलाके के शुरुआती दौर की कहानी भी कुछ निराली है. वो बताते हैं, ''बंगाली मार्केट का नाता किसी बंगाली से नहीं एक पंजाबी लाला बंगालीमल से है. जिस दौर में कनॉट-प्लेस बसा और उसके आसपास प्रशासनिक, सांस्कृतिक हलचल शुरु हुई उस वक्त ये इलाका अपनी चाट और मिठाईयों के लिए मशहूर हुआ. अफसरों, विदेशी मेहमानों और कलाकारों के लिए ये इलाका मुलाकातों का जरिया था जहां पेट और जेब पर हल्के खाने का विकल्प मौजूद था. यहां बने बंगाली स्वीट हाउस, नाथू और भीमसेन स्वीट्स के फ्रेंचाइज़ आज दिल्ली ही नहीं लंदन, कैलीफ़ोर्निया तक पहुंच चुके हैं.''

दिल्ली संपन्न हो रही थी लेकिन ‘मंहगाई डायन’ के चर्चे 2011 में ही नहीं 1960 के दशक में भी दिल्ली में आम थे. सरकार की खिलाफ़त के तौर पर दिल्ली में इस दौरान कई कोऑपरेटिव कॉफ़ी हाऊस खुले. ये वो जगह थीं जहां 75 पैसे की कॉफ़ी के साथ सैंडविच, ऑमलेट, हैमबर्गर और गर्मा-गरम बहस का विकल्प मौजूद था. दिल्ली के कनॉट-प्लेस इलाके में ये कॉफ़ी हाउस आज भी मौजूद है लेकिन उदारीकरण के इस दौर में अब कॉफ़ी की कीमत दस रुपए है.

भूमंडलीकृत हुई दिल्ली

90 के दशक में उदारीकरण के बाद दिल्ली अवसरों का नया पिटारा है. हर राज्य हर देश से लोग अब यहां आते हैं. एक महानगर और देश राजधानी होने के नाते दिल्ली शहर और इसका खाना भूमंडलीकृत हो चुका है.

दिल्ली के पॉश ग्रीन पार्क इलाके की एक सब्ज़ी की दुकान पर हमारी मुलाकात हुई मोहम्मद अतीक से और उन्होंने हमें बताया, ''मैं पिछले 25 साल से इस जगह पर सब्ज़ी की दुकान लगा रहा हूं. पहले हम मौसमी सब्ज़ियां बेचते थे लेकिन अब जुकनी (ज़ूकीनी), बरकोली (ब्रॉक्ली) सलाद पत्ता, लाल-पीली शिमला मिर्च, मशरुम ज़्यादा बिकती है. ग्राहक विदेशों से देखकर आते हैं और हमें बताते हैं कि सब्ज़ी कैसी दिखती है. यहां मूली-पालक नहीं बिकता यहां तो इंपोर्टेड सब्ज़ी मांगते हैं लोग.''

Image caption दिल्ली का एक उभरता हुआ ज़ायका है लिट्टी-चोखा जो दिल्ली में बिहार से आए लोगों की सौगात है.

दिल्ली के इस नए चेहरे को लेकर पुष्पेश कहते हैं, ''पिछले दो दशक में दिल्ली को उसके खाने के नज़रिए से बयां करें तो ये दशक बहुतायत और फ्यूज़न-कनफ़्यूजन की कहानी कहते हैं. दिल्ली में मध्यवर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है, पारंपरिक खानों की ओर लोगों का रुझान बढ़ा है और क्षेत्रीय ज़ायकों के साथ दिल्ली वाले अब ग्लोबल-फूड के भी दिवाने हैं.''

दिल्ली के लुप्त होते ज़ायके

कुलमिलाकर दिल्ली में अब कोच्ची-अमृतसरी, मैक्सिकन-मुग़लई, पारसी-पंजाबी खाने गलबहियां डाले हैं.

लेकिन अफसोस है तो बस इतना कि इस देशी-विदेशी छप्पनभोग के बीच कोरमा, कलिया, फुलकियों और सालन का ज़िक्र अब फ़ीका पड़ रहा है.

पुष्पेश कहते हैं, ''सिकुड़ती-बदलती पुरानी दिल्ली के साथ नर्गिसी कोफ़्ते, पसंदे और टके पैसे की सब्ज़ी अब शायद ही दिखती है. दिल्ली के सोहन हलवे की जगह अब बंगाली छेने ने ले ली है और फालसे का शरबत जल्द ही लुप्त हो जाएगा. पुरानी दिल्ली ही है जहां आज भी पराठों के साथ तीन तरह की सब्ज़ी, निहारी और पाए परोसे जाते हैं.''

दिल्ली के अपने इस सफ़र को खत्म कर हम घर लौट रहे थे तो गाड़ी में चलते एफ़एम पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की एक और जीत का ऐलान हुआ, लेकिन ये जश्न सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं. भारत इन दिनों चढ़ते सूरज का नाम है और नई दिल्ली के हर रंग से इस ठसक की झलक मिलती है.

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