कैसे मिले वर्षों से फ़ेल हो रहे छात्रों से छुटकारा

लखनऊ का छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय इमेज कॉपीरइट KGMC
Image caption छात्रों ने शिकायत की थी कि परीक्षक जानबूझकर उन्हें कम अंक देते हैं मगर उनकी ये शिकायत खा़रिज हो गई

भारत के मेडिकल कॉलेजों में तमाम ऐसे छात्र हैं जो दस-पन्द्रह सालों में भी एमबीबीएस का इम्तिहान नहीं पास कर पाए हैं , मगर वे हॉस्टल समेत समस्त सुविधाएँ ले रहे हैं.

इनमें से अधिकांश छात्र रिज़र्व श्रेणी के हैं, जिन्हें कम अंकों के आधार पर दाखिला मिलता है. अब लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया से कहा है कि वह या तो इन छात्रों के लिए पास का प्रतिशत कम कर दे या फिर इनसे छुटकारा पाने का कोई रास्ता बताए.

लखनऊ के मशहूर किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज या छत्रपति शाहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी में इस समय क़रीब पचास ऐसे छात्र हैं जो दसियों साल से एमबीबीएस का इम्तिहान पास नहीं कर पाए हैं.

सबसे पुराना छात्र 1996 बैच का है. यूनिवर्सिटी अधिकारियों के अनुसार इनमें तीन चौथाई से ज़्यादा छात्र अनुसूचित जातियों के हैं.

यूनिवर्सिटी ने इनके लिए अलग से क्लासेज़ चलवाईं, फ़ीस माफ़ की, किताबें दी. फिर भी ये पास नहीं हुए.

सालों से वही नतीजा

इन छात्रों की तरफ से अनुसूचित जाति आयोग से शिकायत की गई थी कि वे रिज़र्व वर्ग के हैं इसलिए परीक्षक जानबूझकर उन्हें कम नंबर देते हैं. सुनवाई के बाद कमीशन ने यह शिकायत ख़ारिज कर दी.

शिकायत के मद्देनज़र यूनिवर्सिटी ने कॉपियों की बार कोडिंग कर दी, जिससे परीक्षक को छात्र की पहचान न हो.

स्थानीय प्रोफ़ेसर्स पर पक्षपात का आरोप था , इसलिए यूनिवर्सिटी ने बाहर के परीक्षक बुलवाए.मगर हाल ही में फिर वही नतीजा रहा.ये ज़रूरी पचास फ़ीसदी नंबर नहीं ला पाए.

विश्वविद्यालय अधिकारियों के अनुसार छात्रों को यह प्रस्ताव भी दिया गया कि वे परीक्षकों के नाम स्वयं बता दें, जो उत्तर पुस्तिकाओं में लिखी गई सामग्री के आधार पर कॉपी जाँच कर उनको नंबर दे सकें.

हाईकोर्ट का आदेश है कि अगर परीक्षक उत्तर पुस्तिका में लिखी गई बातों को नज़र अंदाज कर नंबर देते हैं तो उन्हें जुर्माना हो सकता है. इसलिए कोई परीक्षक उदारता करते हुए ज़्यादा नंबर नहीं दे सकता.

यूनिवर्सिटी ने मेडिकल कांउसिल ऑफ़ इंडिया को मशविरा दिया है कि इनके लिए पास का परसेंटेज कम करने के अलावा परीक्षा पद्धति में कुछ और बदलाव किए जाएँ.

यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर डीके गुप्ता ने बातचीत में बताया, “ऐसे छात्रों को हम मदद करना चाहते हैं.लेकिन अभी की जो हमारी परीक्षा व्यवस्था है उसमें ये पास नहीं हो पा रहें हैं.पचास प्रतिशत पास मार्क्स हमारे यहाँ मेडिसिन में होता है. और इनकी पास परसेंटेज होती है बीस प्रतिशत , तीस प्रतिशत और पैंतीस प्रतिशत तक. इसलिए पहले तो हमने मेडिकल कांउसिल ऑफ़ इंडिया को सुझाव दिया है कि इनका पास प्रतिशत घटा दिया जाए.”

जहाँ सामान्य वर्ग के छात्रों को मेडिकल प्रवेश परीक्षा में न्यूनतम पचास फीसदी अंक अनिवार्य हैं , रिज़र्व श्रेणी में यह चालीस फीसदी है. कुछ वर्ष पहले तक तो प्रवेश परीक्षा में एक फीसदी नंबर वालों को भी दाखिला मिलता था.

प्रोफ़ेसर डीके गुप्ता का कहना है कि दुनिया के हर इम्तिहान में दस बीस फ़ीसदी लोग फेल होते हैं और हर जगह इम्तिहान पास करने के लिए केवल तीन या चार मौक़े दिए जाते हैं.

Image caption कुलपति डीके गुप्ता चाहते हैं कि परीक्षा पद्धति में कुछ और बदलाव हों या अधिकतम वर्ष तय किए जाएँ

इसलिए तीसरा सुझाव यह दिया गया है कि जो छात्र मेडिकल इम्तिहान पास नहीं कर पाते हैं उनको तीन या चार मौक़ा दें उसके बाद उनको यूनिवर्सिटी से नमस्कार कर दिया जाए.

कई कॉलजों में यही समस्या

यह समस्या केवल लखनऊ मेडिकल कॉलेज की नही है. शिक्षकों का कहना है कि इलाहाबाद, झांसी, मेरठ और मुल्क के दूसरे मेडिकल कालेजों में भी यह समस्या है. मगर कोई उसमें हाथ नहीं डालना चाहता.

यह एक नाज़ुक मुद्दा है, जो आगे चलकर कोर्ट कचहरी में, मुकदमेबाज़ी या राजनीतिक विवाद का विषय बन सकता है इसलिए यूनिवर्सिटी फूंक फूंक कर कदम रख रही है.

यूनिवर्सिटी प्रशासन ने चांसलर यानी गवर्नर बीएल जोशी और मायावती सरकार को भी इसकी सूचना दे दी है.

यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि मेडिकल की पढ़ाई एक ऐसा पेशा है जो लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा है. इसलिए इसके मानक में कमी करना मुनासिब नहीं है. और लगातार फेल हो रहे छात्रों को बाहर करना भी ज़रूरी है.

मेडिकल यूनिवर्सिटी ने औपचारिक पत्र लिखकर गेंद अब मेडिकल काउंसिल के पाले में डाल दी है. देखना है कि मेडिकल काउंसिल इस पर क्या फ़ैसला करती है.

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