इंटरनेट कंपनियों का असहयोग: सिब्बल

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Image caption कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार मीडिया की स्वतंत्रता से छेड़खानी नहीं चाहती

मानव-संसाधन और दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि अमरीकी इंटरनेट कंपनियाँ सोशल नेटवर्क वेबसाइटों से ‘अपमानजनक’ तस्वीरों और सामग्री को हटाने में सहयोग नहीं कर रही हैं.

सिब्बल ने कहा कि उन्होंने याहू, गूगल और फ़ेसबुक जैसी कंपनियों के अधिकारियों से इस बारे में बार-बार बात की, लेकिन उनकी ओर से कहा गया कि जब तक इस बारे में अदालत का कोई फ़ैसला नहीं आता, वो इस बारे में कुछ नहीं कर सकते.

सरकार के अगले कदम के बारे में सिब्बल ने कुछ कहने से मना कर दिया, लेकिन उन्होंने कहा कि “एक बात तय है कि इस किस्म का अपमान हम होने नहीं देंगे और सरकार इस बारे में दिशानिर्देश तैयार करेगी.”

दूरसंचार मंत्री ने बताया कि सरकार मीडिया की स्वतंत्रता से छेड़खानी नहीं कर रही है.

उधर समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक फ़ेसबुक ने कहा है कि वो ऐसी किसी भी सामग्री को हटा लेगी जो उसकी शर्तों का उल्लंघन करते हैं.

भारत के विभिन्न हिस्सों से इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर मौजूद सामग्री पर शिकायतें आती रही हैं और इस बारे में पुलिस स्टेशनों में भी शिकायतें दर्ज करवाई जा चुकी है.

कई विश्वेषक ऐसी शिकायतों की आलोचना करते हैं और सरकार के कदमों को सूचना के प्रवाह को रोकने की कोशिश बताते हैं जो सफ़ल नहीं होगी.

संचार मंत्री का कहना था कि वेबसाइटों पर मौजूद ‘अपमानजनक’ तस्वीरें "हिंदुस्तान के लोगों, खासकर धार्मिक लोगों को, अपमानित करती हैं."

साथ ही उन्होंने कहा कि इंटरनेट कंपनियाँ ऐसी सामग्री को हटाने में सहयोग नहीं करना चाहतीं जो कि गलत है.

सिब्बल ने ये भी आरोप लगाया कि जब इन कंपनियों से चरमपंथियों के बारे में कोई जानकारी मांगी जाती है, तो उनकी ओर से ऐसी जानकारियाँ देने में भी हिचकिचाहट होती है और “कुछ लोग तो अदालत भी चले गए.”

मंत्री के अनुसार पिछले कुछ हफ़्तों में उन्होंने इन कंपनियों के अधिकारियों से बार-बार बैठकें की और सोशल नेटवर्क वेबसाइटों से ‘अपमानजनक’ तस्वीरों और सामग्री को हटाने के बारे में कदम उठाने को कहा, लेकिन उनकी ओर से कथित तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

उधर समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक फ़ेसबुक ने एक वक्तव्य में कहा है, “हम ऐसी किसी भी सामग्री को हटा लेंगे जो हमारी शर्तों का उल्लंघन करते हैं, घृणात्मक हों, हिंसा को भड़काती हैं या फिर जिनमें नग्नता है.”

‘उपाय थोपना नहीं चाहते’

सिब्बल ने कहा कि तीन महीने पहले पाँच सितंबर को सबसे पहले ऐसी तस्वीरों को देखा, तो उन्होंने इस बारे में और जानना चाहा.

उनके मुताबिक कंपनियों से कहा गया कि वो इस बारे में कोई रास्ता ढूँढे ताकि ऐसी तस्वीरें अपलोड ना हों.

मंत्री ने बताया कि कंपनियों को जवाब देने के लिए चार हफ़्तों का वक्त दिया गया था, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

सिब्बल ने कहा, “ये तस्वीरें हमारी भावनाओं और धार्मिक संप्रदायों को भी अपमानित करती हैं. हमने जब उन्हें ये तस्वीरें दिखाई थीं तो ये खुद मानते थे कि वो गलत हैं लेकिन वो कुछ करना नहीं चाहते थे. हमने उनसे कहा कि हम आपके ऊपर कोई उपाय थोपना नहीं चाहते. उन्होंने मुँह पर हमसे कहा कि हम कुछ बातों को मानते हैं. फिर कुछ वक्त बीत गया, फिर उन्होंने कुछ नहीं किया.”

उधर साइबर कानूनों के जानकार और वकील पवन दुग्गल बताते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून के मुताबिक अगर किसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर कोई भी ऐसी जानकारी अपलोड होती है जो मानहानि का कारण हो सकती है, उसे 36 घंटों के भीतर हटा लेने के लिए कंपनियाँ वचनबद्ध हैं.

और अगर कंपनियाँ ऐसा नहीं करतीं तो कंपनियाँ भी बराबर की मुलज़िम होंगी.

लेकिन पवन की माने तो सरकार का ये कहना कि वेबसाइट के पन्नों पर नज़र रखने के लिए लोगों को नियुक्त किया जाए, ये असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल है. साथ ही अग़र ऐसा होता है, तो इसमें बहुत खर्चे जुड़े हैं.

चीन से तुलना

चीन से तुलना किए जाने पर पवन कहते हैं कि ऐसा करना सही नहीं है.

दुग्गल कहते हैं, “चीन ने जो किया है अगर आप उसे भारत में करना चाहेंगे तो उसे लेकर बहुत चुनौतियाँ उत्पन्न होंगी. भारत का संविधान आपको ये करने नहीं देगा.”

वकील पवन दुग्गल कहते हैं कि कंपनियों का ये कहना कि हम कुछ नहीं कर सकते, इसकी कानूनी मान्यता भारत में नहीं है.

उनका कहना है, “आप ये नहीं कह सकते कि मैं प्लेटफ़ॉर्म हूँ और ये कदम नहीं उठाउँगा. अधिकांश कंपनियाँ ये कहती हैं कि हम अमरीकी कंपनियाँ हैं, और अमरीकि कानून के तहत बाध्य हैं और आपके कानून को नहीं मान सकते. सरकार बेहद स्पष्ट है कि अग़र आप भारतीय उपभोक्ताओं को निशाना बना रहे हैं तब चाहे आप भारत में स्थित हैं या नहीं, आपको भारतीय कानूनो को मानना पड़ेगा.”

पवन कहते हैं कि सोशल मीडिया वेबसाइट के आ जाने से अब सूचना प्रौद्योगिकी कानूनो में बदलाव की ज़रूरत है. ये कानून वर्ष 2000 में सही था, लेकिन 2011 में ठीक नहीं है.

पवन के अनुसार बीच का रास्ता ये होगा कि अग़र कोई व्यक्ति या फिर सरकार किसी अपमानजनक सामग्री के बारे में इन वेबसाइटों को बताती हैं, तो ये कंपनियाँ खुद ही इन्हें अपने पन्नों से हटा लें. या फिर कंपनियाँ खुद ही पता लगने पर ऐसे पन्नों को हटा सकती हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट

इससे पहले अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा था कि कपिल सिब्बल और वेबसाइटों के अधिकारियों के बीच दो बार बैठक हुई है और वेबसाइटों ने लोगों द्वारा की जा रही आलोचना या तस्वीरों को हटाने में असमर्थता जताई है.

सूत्रों के अनुसार सरकार इन साइटों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हो रही आलोचना और कुछ तस्वीरों से खासी नाराज़ है.

उल्लेखनीय है कि अन्ना के आंदोलन के दौरान सरकार ने माना था कि वो सोशल नेटवर्किंग साइटों पर नज़र नहीं रख पाई थी.

ये बात भी सही है कि इन साइटों पर सरकार की कड़ी आलोचना होती रही है और कई बार ऐसी तस्वीरें भी लगी हैं जो कुछ लोगों को आपत्तिजनक लग सकती हैं.

हालांकि इन वेबसाइटों पर सरकार का किसी तरह का नियंत्रण नहीं है इसलिए वो इनकी सामग्रियों पर रोक नहीं लगा पा रही है.

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