बिहार लोकायुक्त विधेयक पारित

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' बिहार लोकायुक्त विधेयक 2011 ' को राज्य विधान सभा ने बुधवार शाम एक संक्षिप्त बहस के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया.

राज्य में भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जांच के लिए एक नई लोकायुक्त संस्था का गठन इस अधिनियम का उद्देश्य है.

बिहार के मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सरकारी अधिकारी और कर्मचारी समेत निगम, बोर्ड और पंचायत कर्मियों को भी जांच के दायरे में लाने का प्रावधान इस अधिनियम में है.

बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों से पारित होने और राज्यपाल की मंज़ूरी मिलने के तीस दिनों के भीतर इसे राज्य सरकार अधिसूचित करेगी.

उसके बाद ही यह विधेयक क़ानून का रूप ले सकेगा. और तब पांच सदस्यों वाली एक चयन समिति बिहार की तीन सदस्यीय नई लोकायुक्त संस्था के अध्यक्ष और दो सदस्यों के चयन की अनुशंसा करेंगे.

लेकिन प्रस्तावित क़ानून का एक दिलचस्प पहलू ये है कि बिहार में तीन महीना पहले जो लोकायुक्त बने हैं जस्टिस चंद्रमोहन प्रसाद, वही अपने कार्यकाल पूरा होने तक नई लोकायुक्त संस्था के प्रथम अध्यक्ष होंगे.

इस लोकायुक्त पीठ के तीन में से दो सदस्यों का न्यायिक सेवा का सदस्य होना ज़रूरी है. साथ ही पांच सदस्यों की एक खोजबीन समिति भी होगी, जो लोकायुक्त पीठ केलिए उपयुक्त सदस्यों का एक पैनल तैयार करेगी.

चयन समिति उसी पैनल में से तीन नाम चुनकर राज्यपाल को भेजेगी और उसी आधार पर राज्यपाल यहाँ लोकायुक्त पीठ को मंज़ूरी देंगे.

अब सवाल उठ रहा है कि नीतीश सरकार चयन समिति में बिहार विधान परिषद् के सभापति को संयोजक और बिहार विधानसभा के अध्यक्ष को सदस्य बनाकर लोकायुक्त चयन की कैसी निष्पक्षता दिखा रही है ?

ज़ाहिर है कि परिषद् के सभापति ताराकांत झा भारतीय जनता पार्टी से और विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी जनता दल(युनाईटेड) से जुड़े रहे हैं. और यही दोनों दल यहाँ सत्ता में हैं.

इतना ही नहीं, विधानसभा अध्यक्ष और परिषद् सभापति भी लोकायुक्त की जांच के दायरे में आते हैं. इसलिए सवाल पूछा जा रहा है कि इन दोनों को लोकायुक्त चयन की मुख्य भूमिका में लाने और विपक्ष को चयन समिति से बाहर रखने का औचित्य क्या है ?

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