घायल आत्माओं और सहमी भावनाओं का कश्मीर

कश्मीर में सेना
Image caption कुछ साल पहले तक कश्मीर में जगह-जगह सेना की मौजूदगी आम बात थी.

एक पत्रकार के तौर पर भारत-प्रशासित कश्मीर जाने का पहला अवसर 1996 में मिला. उस समय अलगाववादी आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था. विभिन्न चरमपंथी संगठन पूरी तरह से सक्रिय थे. कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर भारतीय सुरक्षा बलों का पहरा था.

राजधानी श्रीनगर के सभी होटल बंद हो चुके थे. पूरे शहर में बस एक ही होटल खुला रह गया था. बाहर से आने वाले पत्रकार इसी होटल में ठहरते थे. रात में ऐलानिया या ग़ैर-ऐलानिया “शूट एट साइट” निर्देश रहते थे.

दिन में सड़कों पर बहुत कम लोग दिखाई देते थे. अधिकतर दुकाने बंद होती थीं. चार बजते-बजते सड़कें सुनसान हो जातीं और पूरे वातावरण में एक भयानक सा सन्नाटा छा जाता. हर ओर डर का साम्राज्य होता. ऐसा लगता जैसे हवाएं घिरी हुई हों, पल थम गए हों और भावनाओं पर पहरे हों.

फ़ौज की मौजूदगी

श्रीनगर में हर जगह, हर चौराहे और हर मोड़ पर सुरक्षा बलों की तलाशी चौकियां होती थीं. सुरक्षाकर्मी तरह-तरह की गाड़ियों में पूरे शहर में गश्त लगाया करते और रास्ते में लोगों को रोक कर तलाशी लेते.

मेरी भी कई बार तलाशी ली गई. कई बार तलाशी के दौरान सुरक्षाकर्मियों का रवैया इतना बुरा होता कि बहुत झुंझलाहट होती. इस तरह की तलाशी का ये मेरा पहले इत्तेफ़ाक था. एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक के तौर पर यह प्रक्रिया मुझे बहुत दुखदायी और अपमानजनक लगती. लेकिन कश्मीरियों को इस प्रक्रिया से कई-कई बार गुज़रना पड़ता था. उनके ख़ामोश चेहरों से दुख झलकता था.

श्रीनगर से दूसरे शहरों और क़स्बों में जाना एक कठिन प्रक्रिया थी. रास्ते वीरान, सड़कों पर सिर्फ़ फ़ौज की गाड़ियां दिखाई देतीं और महत्वपूर्ण मोड़ पर बंकर और सेना की नाकेबंदी होती थी.

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन के दौरान साठ हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. बीते हुए 22 वर्षों में कश्मीर ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं. इन बीते हुए वर्षों में शायद ही वहाँ कोई ऐसा इंसान होगा जिस के जीवन पर इन परिस्थितियों का प्रत्यक्ष प्रभाव न पड़ा हो.

एक पत्रकार के तौर पर हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि कश्मीरी अगर भारत से अलग होना चाहते हैं तो उसका क्या कारण है? क्या भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार आने से यहाँ के हालात बेहतर हो जाएंगे? क्या कश्मीर की नयी पीढ़ी विश्व के दूसरे तमाम युवाओं की तरह बेहतर आर्थिक भविष्य पर अपनी दृष्टि केंद्रित करेंगे?

बहुत से सवालों के जवाब फ़ौरन मिल जाते और कुछ के जवाब समय बीतने के साथ मिलते.

खुली फ़िज़ा

कुछ दिनों से कश्मीर में जीवन कुछ हद तक शांतिपूर्ण है. हिंसात्मक आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका है.

पिछले दिनों एक अर्से के बाद मुझे घाटी के अंदरूनी क्षेत्रों में जाने का मौका मिला. वर्षों बाद ये पहला अवसर था जब हज़ारों किलोमीटर के सफ़र में मुझे कहीं रोका नहीं गया. मेरी कहीं तलाशी नहीं हुई और कोई मुझसे ये पूछने नहीं आया कि मुझे कहां जाना है या किससे मिलना है.

Image caption हिंसा में कमी होने के बावजूद अब भी कश्मीर के लोगों के जीवन के अधिकतर पहलू सरकार के नियंत्रण में हैं.

काफ़ी अर्से के बाद फ़िज़ा कुछ खुली-खुली सी महसूस हुई. सड़कों पर सुरक्षाकर्मी नज़र नहीं आए. शहरों, क़स्बों और गांवों में उनकी मौजूदगी पहले से बहुत कम है. अधिकतर बंकर और चौकियां हटाई जा चुकी हैं. लेकिन अब भी कश्मीर दुनिया का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ सेना की मौजूदगी बहुत ज़्यादा है.

लेकिन अगर कश्मीर के बीते दिनों पर नज़र डालें तो सतह पर फैली ये ख़ामोशी किसी भ्रम की तरह नज़र आती है. लगभग डेढ़ वर्ष पहले इसी तरह के शांतिपूर्ण वातावरण में घाटी अचानक प्रर्दशनों और नारों से गूंज उठी थी. सौ से ज़्यादा प्रर्दशनकारी नवयुक सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए थे.

अनिश्चितता की स्थिति

हिंसा से भरे बीते हुए दिनों की तुलना में आज अवश्य एक ठहराव है. लेकिन इस ठहराव के पीछे घायल आत्माएं हैं, दबी हुई सिसकियां हैं और सहमे हुए जज़्बात हैं. ऐसा लगता है कि पूरी वादी अनिश्चितता के वातावरण में त्रिशंकु बनी हुई है.

कश्मीर के लोगों के जीवन के अधिकतर पहलू सरकार के नियंत्रण में हैं. यहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता मौलिक अधिकार नहीं बल्कि सरकारी रियायत है. इंटरनेट, टेलीफ़ोन, और एसएमएस जैसे संदेश भेजने और विचारों के आदान-प्रदान के सभी साधन सरकारी निगरानी में हैं. ख़ुफ़िया एजेंसियों का एक व्यापक जाल फैला हुआ है और छोटे-छोटे जलसों-जुलूसों की ख़बर भी पल भर में प्रशासन को हो जाती है.

कश्मीर एक ऐसे मुक़ाम पर है जहाँ ख़ुद कश्मीरियों को भी नहीं पता कि अब क्या होने वाला है. लोग हिंसा से तंग आ चुके हैं लेकिन उन्हें ये अंदेशा भी है कि नयी पीढ़ी बेबसी और अनिश्चिंतता के इस माहौल में कहीं दोबारा हिंसा के रास्ते पर न चल दे.

घायल आत्माओं और सहमें हुए जज़्बों की इस घाटी के दर्द को महसूस करने के लिए किसी के पास समय नहीं है.

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