इरोम शर्मिला के हक़ में रैली को अनुमति ना मिलने से नाराज़गी

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Image caption अफ़सपा पूर्वोतर और भारत प्रशासित कश्मीर में लागू है

मणिपुर में 11 साल से अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला के समर्थन में दिल्ली में रैली की इजाज़त ना मिलने पर कार्यकर्ताओं से नारज़गी ज़ाहिर की है.

इरोम शर्मिला पूर्वोतर में लागू सशस्त्र विशेषाधिकार क़ानून के विरोध में अनशन पर हैं. दिल्ली पुलिस ने उनके समर्थकों को शनिवार को राजघाट पर रैली करने की अनुमति नहीं दी.

इरोम शर्मिला के समर्थन में आए संगठनों ने एक 'अहिंसक अनशन' की अनुमति ना देने को शर्मनाक बताया और साथ ही एक आवाज़ में कहा कि वे इरोम के आंदोलन के साथ हैं.

इन संगठनों में से एक नेशनल एलांयस आफ़ पिपुल्स मुवमेंट ने ही 'शर्मिला बचाओं अभियान 'चलाया था जिसके तहत देश भर में यात्राएं निकाली गई थी.

संगठनों के इस समूह ने 'राष्ट्रीय हस्ताक्षर अभियान' भी चलाया था जिसमें इन हस्ताक्षर किए हुए बैनरों को राष्ट्रपति को सौंपना था लेकिन इन समूहों का कहना था कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के शहर में ना होने के कारण ऐसा नहीं हो सका.

मानवाधिकार के लिए संघर्षरत इरोम पूर्वोत्तर राज्यों में लागू ' सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून 'यानी अफ़सपा के कथित दुरूपयोग के मद्देनज़र इस क़ानून को निरस्त करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं.

इरोम का दर्द

मणिपुर के जस्ट पीस फ़ाउंडेशन के बबलु सवाल उठाते है कि जब महाराष्ट्र से आकर अन्ना हज़ारे भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते है तो सरकार हिल जाती है लेकिन उन्हें 11 साल से अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला का दर्द क्यों नहीं दिखाई देता.

सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून साल 1958 से पूर्वोत्तर राज्यों में जबकि 1990 से ये भारत प्रशासित कश्मीर में भी लागू है.

सूचना के अधिकार से जुड़ी और राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य अरुणा रॉय का कहना है कि लोकतंत्र में अफ़सपा के लिए कोई जगह नहीं है.

अरुणा रॉय ने कहा,''अगर हम लोग भारत के पूरे हिस्से को बराबरी का दर्जा नहीं देते हैं, चाहे वे पूर्वोत्तर हो या जम्मू-कश्मीर जहाँ अफ़सपा लागू है तो वहाँ सारे सवैधानिक अधिकार स्थगित होते है. तो हम गणतंत्र कैसे है, संविधान कहा लागू है? वहां चुनाव होते है तो ऐसे में चुनाव का क्या मतलब है? ''

इरोम से सरकार बात करे

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Image caption शर्मिला बचाओ कारवां के तहत 16 अक्तुबर से 27 अक्तुबर तक देशभर में यात्रा निकाली गई .

नर्मदा आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का कहना था कि पूर्वोतर और जम्मू-कश्मीर में मानवधिकारों का दोहन का कारण सेना है.

मेधा पाटकर का कहना था,''उमर अब्दुल्ला भी कह चुके है और अब समय आ गया है कि धीरे-धीरे अफ़सपा हटाया जाना चाहिए.हिंसक या सशस्त्र संघर्षवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी है तो उनके लिए अलग क़ानून हैं और इरोम से भी सरकार को जा कर बात करनी चाहिए.पूर्वोत्तर के राज्यों को एहसास दिलाना होगा कि वे भी भारत का एक हिस्सा है.''

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में कहा था कि बदली हुई परिस्थितियों में राज्य के कुछ हिस्सों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून को हटाया जाना चाहिए.

इससे पहले बीस भारतीयों के एक दल ने भारत प्रशासित कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से इम्फ़ाल तक की अपनी यात्रा निकाली थी और इसे 'इरोम शर्मिला बचाओ जन-कारवां ' नाम दिया गया था

इस कारवां ने 16 अक्तुबर से 27 अक्तुबर तक देश भर के दस राज्यों का दौरा किया था.

इस यात्रा में ही शामिल हुई गुजरात की शहनाज़ दिल्ली में अनशन में भाग लेने के लिए आई हुई थी.

उनका कहना था कि उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान दस राज्यों का दौरा किया.कश्मीर से इंफ़ाल के बाद उन्होंने दूसरे चरण की यात्रा भी की जो अहमदाबाद से कश्मीर तक पूरी की.

लोगों को जागरुक

अपने अनुभव के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि जब वे लोगों से मिली तो उन लोगों को सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून और इरोम शर्मिला के बारे में कुछ पता नहीं था.

उनका कहना था,''मुझे लगा कि मैं एक महिला हूँ और मुझे इरोम का साथ देना चाहिए. हमने लोगों के पास जाकर पर्चे बांटे और लोगों को इरोम और उसके आंदोलन के बारे में लोगों को जागरुक करने का काम किया और लोगों को इससे से जुड़ने की अपील की.''

पटना में रहने वाली तन्या दसवी कक्षा में पढ़ती है.वे भी इस मुहिम से जुड़ी हुई है.

जब उन्होंने इरोम शर्मिला पर नाटक देखा तो उनमें उत्सुकता हुई कि वे उनके अनशन के बारे और जाने.अपनी उत्सुकता को शांत करने के बाद उन्होंने अपने शहर में शर्मिला के लिए मशाल उठा ली.

उन्होंने अपने दोस्तों को अपने साथ जोड़ा और स्कूलों में जा-जा कर शर्मिला के समर्थन में और अफ़सपा के विरोध में 4000 हस्ताक्षर इकट्ठा किए.

तन्या कहती है कि पहले लोगों ने हमें मज़ाक में लिया कि ये पूर्वोतर का मुद्दा है लेकिन जब लोगों ने पढ़ना शुरु किया तो लगा कि कुछ करना चाहिए और अब बहुत से लोग जुड़ते चले गए है.

वे कहती कि,''हमारे देश में लोकतंत्र ,मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों की बात होती है लेकिन इरोम को नज़रबंद करके रखा गया है.ऐसे में हमारे ही देश के एक हिस्से में इन अधिकारों की धज़्जियाँ उठाई जाती है.''

इस आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने लाखों की संख्या में लोगों हस्ताक्षर इकट्ठा कर लोगों को इस मुहिम से जोड़ा है. उनका मानना है कि इरोम के आंदोलन की लौ को बढ़ाने में लोग तो आगे आ रहे है बस अब सरकार के हरकत में आने की देर है.

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