किस्सा दस दरवेश

 शुक्रवार, 9 दिसंबर, 2011 को 14:47 IST तक के समाचार
  • दिल्ली सूफ़ी दरगाह

    दिल्ली और सूफ़ी फ़लसफ़े का रिश्ता तकरीबन आठ सदी पुराना है. हिंदुस्तान में सूफ़ियों के चिश्तिया सिलसिले की बुनियाद रखने वाले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ख़लीफा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने तेरहवीं सदी की शुरुआत में महरौली को अपना डेरा बनाया. मुहब्बत और भाईचारे के उनके पैग़ाम की ख़ुशबू चारों तरफ़ फैलने लगी और देहली पर सूफ़ियाना रंग चढ़ता गया.

    सूफ़ी पीरों के खानकाहों ने दिल्ली को एक अनूठी पहचान दी. कभी आंखें बंद किए ज़िक्र और तफ़क्कुर में डूबी हुई और कभी समां और रक्स की मजलिस सजाए. बाहरी चकाचौंध से दूर उसके दिल में खुदा से प्रेम और इंसानों के लिए शफ़कत का दरिया बहने लगा. दिल्ली की कला, तहज़ीब और अदब पर इन खानकाहों का ज़बर्दस्त असर रहा है. इनके दरवाज़े हर मज़हब के लोगों के लिए हमेशा खुले रहे. वे इस्लामी और हिंदू तसव्वुफ़ों के बीच बहस के इदारा रहे, जिसका फ़ायदा दोनों मजहबों के अमन-पसंद तबकों को हुआ. (सभी तस्वीरें और आलेख - पार्थिव कुमार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए)

  • दरगाह कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी

    दरगाह ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी: कुतुब साहब और इंसानियत के बीच रिश्ता दर्द का था. वे दिन-रात आंखें बंद किए ज़िक्र में डूबे रहते थे. कोई मुलाकाती आता तो उनकी आंखें खुलतीं मगर फिर वे अपनी दुनिया में लौट जाते. भूख लगती तो काक (एक तरह की रोटी) के कुछ निवाले मुंह में डाल ठंडा पानी पी लेते. उनके नाम के साथ 'काकी' इसी वजह से जुड़ गया था.

    क़ुतुब मीनार से कुछ ही दूरी पर महरौली गांव में क़ुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह को उनके ख़लीफा शेख़ फ़रीद के नातेदार शेख़ ख़लील ने 1542 में बनवाया था. मुग़लों समेत कई बादशाहों ने इसकी वुसत की. हर साल उर्स के दौरान दरगाह पर खूब रौनक होती है.

    क़ुतुबुद्दीन बख्तियार का जन्म 1173 में मौजूदा तुर्कमेनिस्तान के औश में हुआ था. उन्होंने अपने मुर्शीद मोइनुद्दीन के कहने पर ही दिल्ली में रहने का फैसला किया.

  • निज़ामुद्दीन

    दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया: बेशक सूफ़ी फ़लसफ़े से दिल्ली की पहली पहचान क़ुतुबुद्दीन बख्तियार ने कराई थी, लेकिन इसे अवाम के बीच फैलाने का एतराफ़ निज़ामुद्दीन को जाता है. बाबा फ़रीदुद्दीन गंजेशकर के खलीफ़ा निज़ामुद्दीन, मज़हब को सियासत से अलग रखने के हिमायती थे. वे मानते थे कि सत्ता के क़रीब जाने से अवाम और उनके बीच फ़ासला बढ़ जाएगा.

    दिल्ली ने अलाउद्दीन मसूद से लेकर मोहम्मद बिन तुगलक़ तक 13 सुलतान देखे. लेकिन निज़ामुद्दीन ने इन सब से दूरी बनाए रखी. उनकी इस उदासीनता की वजह से ही ख़ासकर ग़ियासुद्दीन तुगलक़ के साथ उनके रिश्ते कड़वाहट भरे रहे. मगर दिल्ली की अवाम ने उन्हें हमेशा सिर आंखों पर बिठाया और उनकी दरगाह पर आज भी दिन भर हज़ारों जायरीनों की भीड़ रहती है.

    निज़ामुद्दीन अपनी मां और बहन के साथ दिल्ली के जिस इलाके में बसे,उसे मौजूदा समय में अधचिनी के नाम से जाना जाता है.

  • चिराग देहली

    दरगाह शेख़ नसीरुद्दीन महमूद चिराग देहली: नसीरुद्दीन महमूद दिल्ली में चिश्तिया सिलसिले के आख़िरी संत थे और उन्हें चिराग देहली का ख़िताब दिया गया. उनकी दरगाह दिल्ली के जिस भीड़भाड़ वाले इलाके में है, उसे भी चिराग दिल्ली के नाम से जाना जाता है. वे 40 साल की उम्र में दिल्ली आकर निज़ामुद्दीन के मुरीद बन गए थे.

    1325 में हज़रत निज़ामुद्दीन के इंतकाल के बाद शेख नसीरुद्दीन बेहद मुश्किल दौर में चिश्तिया सिलसिले के सज्जादानशीं हुए. उस ज़माने में हर तरफ़ रूढि़वाद का बोलबाला था और सूफ़ियों के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही थीं. सूफ़ी खानकाहों में भी जादूटोना, निठल्लापन और कब्र की पूजा जैसी बुराइयां पनप चुकी थीं. नसीरुद्दीन ने चिश्तिया सिलसिले पर बाहरी और अंदरूनी हमलों का बखूबी सामना करते हुए प्रेम और भाईचारे का चिराग जलाए रखा. उनका इंतकाल 1356 में हुआ और इसके साथ ही दिल्ली में सूफ़ियों के चिश्तिया सिलसिले के पहले दौर का अंत हो गया.

  • बाग़े बेदिल

    बागे बेदिल:

    बेदिल अज कुलफ़ते शिकस्त मुनाल

    बज़्मे हस्ती दुकाने शीशागर अस्त

    अबू अल मानी के नाम से मशहूर सूफ़ी शायर अब्दुल कादर बेदिल मानते थे कि ज़िंदगी फानी है इसलिए इसकी नाकामियों पर ग़म नहीं करना चाहिए. उनकी गुमनाम सी दरगाह मथुरा रोड पर नेशनल स्टेडियम के पिछवाड़े में है. बेदिल शायर के अलावा कहानीकार और फ़लसफी भी थे. मिर्जा असदुल्ला बेग ग़ालिब तक उनकी शायरी का लोहा मानते थे. ग़ालिब ने लिखा है:

    तर्जे बेदिल में रेख्ता कहना

    असदुल्ला खान कयामत है

    बेदिल के परिवार वाले अफ़ग़ानिस्तान के थे और मुगलों के दरबारी के तौर पर वे हिंदुस्तान आए थे. घने दरख़्तों वाले एक छोटे से बाग में बना बेदिल का हरे और सफेद रंग का मकबरा उनकी शख़्सियत की तरह ही सादगी से भरा है.

  • दरगाह मटका पीर

    दरगाह मटका पीर: बागे बेदिल के ठीक सामने मथुरा रोड़ के उस पार एक चारदीवारी पर रखे और पेड़ों की टहनियों पर टंगे सैंकडों मटके सबका ध्यान खींचते हैं. ये सूफ़ी संत हज़रत शेख अबू बकर तुसी हैदरी कलंदरी की दरगाह है. अबू बकर इस्लाम का पैग़ाम फ़ैलाने के लिए 12 वीं सदी में ईरान के तरतूस इलाके से हिंदुस्तान आए थे.

    अबू बकर के मटका पीर में तब्दील होने की कहानी बेहद दिलचस्प है. कहानी के मुताबिक़ अबू बकर ने एक बार दरिया जुमना के किनारे टहलते समय एक कमज़ोर नौजवान को देखा जो अपनी बीमारी से तंग आकर खुदख़ुशी करने जा रहा था. अबू बकर ने उसे अपने मटके से पानी पिलाया और उसकी बीमारी दूर हो गई. इसके बाद अबू बकर को मटका पीर के नाम से जाना जाने लगा और वे दूर-दूर तक मशहूर हो गए.

  • बाकी बिल्लाह

    दरगाह हज़रत ख़्वाजा बाकी बिल्लाह: सूफ़ी मानते हैं कि इंसान का मुंतहा अल्लाह है और मौत उसे इस मंज़िल तक पहुंचाती है. सदर बाज़ार के इंसानी समंदर में सैंकड़ों मकबरों से घिरी बाकी बिल्लाह की दरगाह उनके इस एतकाद की अलामत है. हरे रंग के दरवाज़े के अंदर दरगाह में एक शांति और ठंडक का एहसास बसता है.

    बाकी बिल्लाह का जन्म काबुल में 1563 में हुआ. वह काबुल और समरकंद में अपनी तालीम पूरी करने के बाद मुल्तान और लाहौर होते हुए दिल्ली पहुंचे. उनसे मशविरा लेने वालों में बादशाह अकबर के दरबारी कुली खान और अब्दुल रहीम खान-ई-खाना शामिल थे.

    फ़ना में यकीन रखने वाले बाकी बिल्लाह ज़्यादातर अकेले रहना पसंद करते थे. उनकी दरगाह पर कव्वालों, खादिमों और फकीरों का हुजूम नहीं होता. वे 1603 में इस दुनिया से रुख़सत हुए और उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक ही उनके मकबरे पर छत नहीं बनाई गई है.

  • तुर्कमान

    दरगाह तुर्कमान बयाबानी: शाहजहानाबाद के 14 दरवाजों में से एक तुर्कमान गेट का नाम 12वीं सदी के एक सूफ़ी संत से जुड़ा है. तुर्कमान बयाबानी 1193 में तराई की दूसरी लड़ाई में मोहम्मद गोरी की जीत के बाद दिल्ली आए. दिल्ली का रामलीला मैदान जिस जगह है, वहां उन दिनों घने जंगलों से घिरा एक बड़ा तालाब हुआ करता था. बयाबानी ने इसी जगह रहने का फैसला किया.

    बयाबानी के मुरीदों में सुलतान मोहम्मद गोरी और क़ुतुबुद्दीन ऐबक भी थे. कहते हैं कि उन्होंने ऐबक को इत्तला भी किया था कि उसे घोड़ों से खतरा है. मगर सुलतान ने उनकी बात नहीं मानी और उसकी मौत चैगन खेलते समय घोड़े से गिरने की वजह से ही हुई. वे अपने जमाने में भले ही मशहूर रहे हों, लेकिन वक्त ने उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया है. इक्कादुक्का ही कोई दुआ मांगने के लिए इस पीर के दरवाज़े पर ठहर जाता है.

  • हरे भरे सरमद

    दरगाह सरमद शहीद और हरे भरे साहिब: आर्मेनियाई फ़कीर सरमद शहीद और उनके उस्ताद सैयद अब्दुल हुसैन हरे भरे साहिब की दरगाह जामा मस्जिद के शाही दरवाजे के नज़दीक है. कीमती पत्थरों के सौदागर सरमद यहूदी थे और बादशाह शाहजहां के जमाने में दिल्ली में आकर बस गए. हरे भरे साहिब की संगत में वे अपना सब कुछ छोड़ फकीर बन गए.

    सरमद शाहजहानाबाद की गलियों के नंगे घूमते और अपनी रूबाइयां सुनाया करते थे. वे काफी मशहूर थे और उनके मुरीदों में शाहजहां का बड़ा बेटा दारा शिकोह भी शामिल था. औरंगज़ेब ने बादशाह बनने के बाद सरमद को दारा का साथ देने के आरोप में गिरफ्तार करवा दिया. जब उनसे पूछा गया कि वे नंगे क्यों रहते हैं तो उन्होंने कहा - मेरे पास छिपाने को कुछ भी नहीं है. इस्लाम के खिलाफ काम करने का इलज़ाम लगा कर सरमद का सिर कलम करवा दिया गया. कहते हैं कि सरमद की मौत के साथ ही मुग़लों के पतन की कहानी भी शुरू हो गई.

  • माई साहिबा

    दरगाह माई साहिबा: कुरान में अल्लाह की नज़र में मर्द और औरत के दर्जे को एक बराबर बताया गया है. प्रेम और बंदगी के ज़रिए अल्लाह तक पहुंचने की ख्वाहिश रखने वाले सूफियों ने भी दोनों के बीच कोई फर्क नहीं किया. दिल्ली में सूफ़ी नजरिए को मक़बूलियत दिलाने में जिन महिला संतों ने बड़ी भूमिका निभाई, उनमें बीबी ज़ुलेखा भी शामिल थीं, जिन्हें माई साहिबा के नाम से भी जाना जाता है.

    निज़ामुद्दीन की मां ज़ुलेखा ज़्यादातर समय अल्लाह की इबादत में डूबी रहती थीं और उन्होंने अपने बेटे को किसी भी हाल में नेकी का दामन नहीं छोड़ने की सीख दी. कहते हैं कि वे किसी भी औरत का दुख नहीं देख पातीं और तुरंत उस पर अपनी दुआओं की बारिश कर देती हैं. लिहाज़ा उनकी दरगाह पर जाने वालों में महिलाओं की तादाद ज्यादा होती है. पर यहां निज़ामुद्दीन की दरगाह की तरह पीरज़ादों और दुकानदारों की भीड़ नहीं दिखती.

  • दरगाह फ़ातिमा बी

    दरगाह फ़ातिमा बी: निज़ामुद्दीन बस्ती के नज़दीक लाला लाजपत राय मार्ग पर ओबेराय होटल के साए में फ़ातिमा बी की दरगाह है. तेरहवीं सदी की इस सूफ़ी संत के बारे में ज़्यादा कुछ जानकारी नहीं है. दिल्ली की रबिया के नाम से मशहूर फ़ातिमा को शेख़ फ़रीद ने अपनी मुंहबोली बहन बनाया था. फ़ातिमा के ज़िंदा रहते हज़रत निज़ामुद्दीन उनसे कई बार मिले और उनके इंतकाल के बाद वे अक्सर उनकी मजार पर जाया करते थे.

    फ़ातिमा की दरगाह के सामने फ्लाई-ओवर पर बेतहाशा भागती गाडि़यों की कतार कभी नहीं टूटती. वक्त तेज़ी से बदल रहा है. कल जो नया था वो अब पुराना हो चुका है. जो आज नया है, वो कल पुराना हो जाएगा. एक तस्वीर उभरते ही पिछली धुंधली पड़ जाती है. लेकिन सदाबहार है अपनेपन का वह बासंती रंग जिसने दिल्ली को अनूठी पहचान दी है.

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