दर्द कश्मीरी अल्पसंख्यकों का, वतन में बेवतनी

अगिया कौर कश्मीर
Image caption अगिया कौर बारह साल से अपने बेटे के आने की राह देख रही हैं.

चाहे बर्फ़ से पटे श्रीनगर में कंपकपाती सर्दियों के दिन हों, या फिर शहर में 'गड़बड़ियों और हंगामों' के दौर, अगिया कौर पिछले बारह सालों में लाल चौक गुरूद्वारे की सुबह की प्रार्थना सभा में हिस्सा लेने से नहीं चूकी, जहां वो अपने बेटे की सलामती और वापसी की प्रार्थना करने जाती हैं.

अगिया कौर का 14-वर्षीय बेटा इच्छापाल सिंह साल 2000 में हुई सेना की एक कार्रवाई के बाद लापता हो गया था.

शहर के बाहरी इलाक़े रावलपुरा का निवासी इच्छापाल सिंह मां के कहने से पास के किराना दुकान से चीनी लाने गया था. अगिया कौर को अफ़सोस है कि उन्होंने इच्छापाल को बाहर जाने के लिए क्यों कहा.

अगिया कौर कहती हैं, "जब इच्छापाल घंटो बीतने के बाद भी वापस नहीं लौटा तो मुझे फ़िक्र होने लगी. मैं घर से बाहर गई तो देखा कि सेना के वाहन हर तरफ़ मौजूद हैं, तब मुझे समझ में आया की वहां सेना की कार्रवाई हुई है और वो चरमपंथियों को तलाश कर रहे हैं."

वो राजनेताओं के झूठे वायदों और आश्वासनों से तंग आ चुकी हैं और कहती हैं, "अब ख़ुदा ही मेरा सहारा है. मुझे उम्मीद है कि वो ज़रूर वापस आएगा."

अगिया अब किराए के एक बहुत ही छोटे से घर में रहती हैं.

उदाहरण

साल 1947 में ब्रिटिश सरकार के जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर का दो तिहाई इलाक़ा भारत द्वारा प्रशासित है जबकि बक़िया पाकिस्तान के पास है.

अगिया कौर भारतीय कश्मीर में अल्पसंख्यकों की दुखद स्थिति का एक उदाहरण हैं, एक ऐसी स्थिति जिसके बारे में सामान्यत: बातचीत कम ही होती है.

मानवधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि पिछले दो दशकों में कम से कम 250 सिख नागरिक मारे गए हैं.

सिख सहयोग समीति के अध्यक्ष जगमोहन सिंह रैना के अनुसार, "इस तादाद में उन लोगों के नाम भी शामिल हैं जो सिखों पर हुए दो हमलों के दौरान मारे गए थे. हमने पुलिस हिरासत से लापता होने के नौ मामले भी दर्ज किए हैं."

जगमोहन सिंह रैना बलबीर सिंह के बारे में बताते हैं जिसे जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष टास्क फ़ोर्स ने 20 साल पहले क़ब्ज़े में लिया था और जिसके परिवार वालों को आज भी उसके ठिकाने का पता नहीं है.

पेशे से दर्ज़ी बलबीर सिंह श्रीनगर के रहते थे.

पंडित

कश्मीर के हिंदूओं, जिन्हें अक्सर पंडित कहकर बुलाया जाता है, के हालात इससे भी अधिक दर्दनाक हैं.

हाल में ही दक्षिणी कश्मीर के एशमुक़ाम गांव में रहने वाला पंडित समुदाय का नौजवान सुनील रैना घर से कालेज के लिए निकला और तबसे लापता है.

गुमशुदगी के इस तरह के छह और मामले भी सामने आए हैं.

पंडित समुदाय के लोग प्रशासन की अनदेखी से व्यथित हैं. वो कहते हैं कि पुलिस ने इनमें से किसी भी मामले में एफ़आईआर दर्ज नहीं की है.

उन्नीस सौ नब्बे के दशक में घाटी में शुरू हुई हिंसा के बाद, चरमपंथियों से लगातार मिलने वाली धमकियों और समुदाय के कुछ लोगों की हत्याओं के बाद, अधिकांशतर पंडित घाटी छोड़कर जा चुके हैं.

बने रहने का फ़ैसला

बावजूद इसके 600 से अधिक परिवारों ने विस्थापन के विरूद्ध फैसला लिया और वो अब भी घाटी में रह रहे हैं.

संजय टिक्कू इन्हीं में से एक हैं और इनका नेतृत्व करते हैं.

वो कहते हैं, "हमारे फ़ैसले की कोई क़दर नहीं है. सरकारी उदासीनता ने हममें वतन में बेवतनी की भावना पैदा कर दी है. हम जब भी किसी सरकारी काम से जाते हैं तो हमसे निर्वासित न होने का प्रमाण-पत्र मांगा जाता है. जब सभी इस जगह को छोड़कर जा रहे थे हमने अपनी धरती पर रूकने का निर्णय किया, तो क्या वो फ़ैसला ग़लत था?"

संजय टिक्कू का कहना है कि पिछले बीस सालों में 600 से अधिक पंडितों की हत्या हो चुकी है लेकिन पुलिस ने सिर्फ़ 219 मामले दर्ज किए हैं.

इस मामले का एक पहलू ये भी है, कि जहां कश्मीर में रहने वाले पंडितों को लगातार अनदेखी का दुख बर्दाश्त करना पड़ रहा है, वहीं एक भावना ये भी है कि जो लोग घाटी छोड़कर चले गए भारत सरकार उन्हें सिर-माथे पर बैठा रही है.

भेदभाव

जगमोहन सिंह रैना कहते हैं, "भारत सरकार ने घाटी छोड़कर गए पंडितों के लिए छह हज़ार नौकरियों की घोषणा की लेकिन उसमें यहां रह रहे पंडितों और सिखों का कोई ज़िक्र नहीं. ये सरासर भेदभाव है."

जम्मू क्षेत्र में रहने वाले हिंदूओं का दुख भी कुछ कम नहीं.

जम्मू के छत्ता में रहने वाली मेसो देवी को साल 2005 में एक ख़त मिला जिसमें लिखा था कि उनके लापता बेटे और दो दोस्तों को दरअसल फ़ौज ने एक फ़र्जी हमले में मार दिया था.

इसके कुछ ही दिनों बाद कथित फ़र्जी हमले के 'चश्मदीद' कैप्टन सुमित कोहली अपने कमरे में मृत पाए गए.

कहा जा रहा है कि मेसो देवी को भेजी गई चिट्ठी कैप्टन सुमित कोहली ने ही लिखी थी. ख़त में फ़र्जी हमले में सेना के राष्ट्रीय राइफ़ल्स के अधिकारियों और जवानों के शामिल होने की बात कही गई थी.

न्याय की मांग

कैप्टन कोहली की मां और पत्नी ने भारतीय नेताओं से मुलाक़ात कर उनसे मामले की पूरी छानबीन की मांग की है.

कैप्टन कोहली की मां वीना कोहली कहती हैं, "मेरा बेटा इसलिए मारा गया क्योंकि वो न्याय की मांग कर रहा था."

न्याय के लिए कोहली परिवार की जंग जारी है.

जाने माने नागरिक ख़ुर्रम परवेज़ कहते हैं, "हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए उठाई गई आवाज़ को भी कश्मीरी पृथकतावाद का नाम दे दिया जाता है. अल्पसंख्यक इन मामलों पर और भी मुखर होते लेकिन वो अंजाम से डरते हैं. कश्मीर में मानवधिकार के लिए आवाज़ उठाने को राष्ट्रद्रोह के तौर पर देखा जाता है."

हालांकि कश्मीर में अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच संबंध ठीक हैं लेकिन सरकारी अनदेखी ने उन्हें अपनी ही वतन में दुख झेलने को मजबूर कर दिया है.

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