रुपए में गिरावट ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें

रुपए इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption आर्थिक जानकारों के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मुश्किल दौर की शुरुआत हो चुकी है.

लगातार बढ़ती महंगाई और विकास दर में गिरावट के बीच यूरोज़ोन में छाई आर्थिक मंदी का असर भारत पर भी दिखाई देने लगा है. भारतीय रुपए में आज अमरीकी डॉलर के मुकाबले अब तक सबसे चिंताजनक गिरवट दर्ज की गई.

साल 2011 के मुकाबले 10 फ़ीसदी की गिरावट के साथ मंगलवार को रुपए की कीमत 53.42 दर्ज की गई.

इस बीच वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने आज राज्यसभा को संबोधित करते हुए विश्व में छाई आर्थिक मंदी की इस स्थिति को चिंताजनक बताया और कहा कि आर्थिक अस्थिरता के इस दौर का सामना भारत राजनीतिक स्थिरता के बिना नहीं कर सकता.

उन्होंने कहा, ''भारत में दिख रही आर्थिक मंदी असल में यूरोपीय मंदी का असर है लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था में इस संकट से उबरने की क्षमता है...लेकिन राजनीतिक उठापटक और आरोप-प्रत्यारोप से अर्थव्यवस्था का कोई भला नहीं होगा. सरकार अपनी तरफ से आम सहमति बनाने की पूरी कोशिश करेगी लेकिन सभी को इसके लिए आगे आना होगा.''

आयातकों के पास रुपए की इस गिरावट के बाद अपने आयात को कम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं.

मुश्किल दौर की शुरुआत

इंडीयन इंपोर्टर्स एसोसिएशन के सचिव केएस सोडी कहते हैं, ''रुपए की इस गिरावट का इसका सबसे बड़ा असर आयातकों पर पड़ेगा. विदेशों से कुछ भी खरीदने के लिए डॉलर के मुकाबले अब हमें ज़्यादा कीमत अदा करनी होगी. हमारे पास अब यही विकल्प है कि हम अपने आयात को कम करें.''

वहीं आर्थिक मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मुश्किल दौर की शुरुआत हो चुकी है.

वे कहते हैं, ''आयात क्षेत्र में गिरावट का सबसे ज़्यादा असर तेल और पेट्रोलियम क्षेत्र पर पड़ेगा. लगभग हम 100 अरब डॉलर का तेल आयात करते हैं हर साल. फिलहाल तो सरकार राजनीतिक दबाव में तेल की कीमतों को थामे हुए है लेकिन यह देखना होगा अब कितने समय तक वो अपने घाटे को थाम पाएगी.''

सोमवार को भारत के औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र को लेकर जारी आंकड़ों में पिछले साल अक्तूबर के मुकाबले 5.1 फ़ीसदी की गिरावट सामने आई है. सरकारी आँकड़ों के अनुसार दो वर्षों में पहली बार इस तरह की गिरावट देखी गई है और रुपए की कीमत पर इसका भी असर पड़ा था.

पिछले अक्तूबर के मुकाबले निर्माण क्षेत्र में उत्पादन छह फ़ीसदी गिरा है और खनन क्षेत्र का उत्पादन 7.2 प्रतिशत घटा है.

स्टैंडर्ड चार्टेड बैंक के एक मुद्रा विशेषज्ञ थॉमस हॉर के मुताबिक निवेशक तेज़ी से भारतीय मुद्रा बेच रहे क्योंकि विकास दर में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है और इस बीच महंगाई भी एक समस्या बनी हुई.

पिछले हफ़्ते सरकार ने इस वित्तीय वर्ष के लिए आर्थिक विकास का पूर्वानुमान नौ फ़ीसदी से घटाकर 7.25 और 7.75 फ़ीसदी के बीच कर दिया था.

थॉमस हॉर के मुताबिक भारतीय मुद्रा फिलहाल एशिया की सबसे कमज़ोर मुद्गा है.

संबंधित समाचार