शहरी निकायों के चुनाव पर मायावती सरकार की आनाकानी

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Image caption मायावती सरकार ने अभी तक स्थानीय निकायों के चुनाव की प्रक्रिया शुरु नहीं की है.

74वें संविधान संशोधन के जरिए स्थानीय निकायों को संवैधानिक संरक्षण दिया गया था ताकि राज्य सरकारें इनके अधिकारों का अतिक्रमण न करें और चुनाव समय पर हो सकें.

लेकिन उत्तर प्रदेश में लगभग साढ़े छह सौ स्थानीय निकायों का कार्यकाल पिछले महीने समाप्त हो गया और मायावती सरकार ने चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं होने दी. हाईकोर्ट ने चुनाव अधिसूचना जारी करने का आदेश दिया भी मगर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर चुनाव कराने पर फिलहाल स्टे ले लिया है.

राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने सितम्बर के पहले हफ्ते में ही चुनाव कार्यक्रम बनाकर राज्य सरकार को भेज दिया था.

नियमों में व्यवस्था है कि चुनाव की औपचारिक अधिसूचना राज्य सरकार जारी करेगी.

सरकार की आनाकानी

लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार कोई न कोई बहाना बनाकर चुनाव कार्यक्रम घोषित करने से कतरा रही थी. इसे देखते हुए कई लोग हाईकोर्ट गए और अदालत ने 31 अक्तूबर तक चुनाव अधिसूचना जारी करने को कहा. मगर राज्य सरकार ने उस पर अमल नही किया.

मुख्य बहाना ये बनाया गया कि वार्डों का आरक्षण नही हो पाया. दूसरा बहाना ये बनाया गया कि 2011 की जनगणना की आंकड़े उपलब्ध नही हैं.

लेकिन हाईकोर्ट ने ये बहाने नही माने. हाईकोर्ट ने बहुत ही कड़े शब्दों में आदेश दिया कि शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव की अधिसूचना हर हालत में 19 दिसंबर तक जारी हो जाए.

हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि अगर राज्य सरकार चुनाव अधिसूचना जारी नहीं करती तो ये एक प्रकार से संवैधानिक तंत्र की विफलता माना जाएगा और गवर्नर उस पर कार्रवाही कर सकते हैं.

लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को राहत देते हुए दो महीने का और समय दे दिया. इस अंतरिम आदेश के मुताबिक़ राज्य सरकार को 11 फरवरी तक वार्डों का आरक्षण आदि करके अधिसूचना जारी करनी है.

लेकिन लगभग उसी समय विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है. इसलिए अब ऐसा लगता है कि फिलहाल शहरी निकायों के चुनाव अभी नही हो पायेंगे.

प्रतिक्रिया

विधानसभा में विरोधी दल के नेता शिवपाल सिंह यादव का कहना है कि बहुजन समाज पार्टी अपनी पोल खुलने और हार के डर से नगरीय निकायों के चुनाव नही करवा रही है.

उन्होंने कहा, “ये चुनाव इसलिए नही कराना चाहतीं क्योंकि इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी कि बुरी तरह से हार होती. जब हार होती तो पोल खुलती. इसके बाद विधान सभा एके चुनाव होने थे, इससे चुनाव का संकेत आ जाता कि इनकी बुरी तरह से हार होगी. केवल इस डर से कि इनकी बुरी तरह हार होगी, इनकी पोल खुलेगी ये चुनाव नही कराना चाहती.”

कहना न होगा कि सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की पार्टी है. इसीलिए बीएसपी ने साल 2006 में स्थानीय नगर निकाय चुनावों में हिस्सा ही नहीं लिया था. पिछले शहरी निकाय चुनावों में सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी और उसके बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को सफलता मिली थी.

सरकार में रहते हुए मायावती सरकार ने नियम बदल दिया था कि स्थानीय निकायों के चुनाव दलीय आधार पर न हों और मेयर तथा नगर पंचायतों के चेयरमैन के चुनाव सीधे जनता से न होकर सभासदों के ज़रिए हों.

गांवो की पार्टी

लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री मायावती सरकार का दबाव डालकर नगरीय निकायों पर कब्ज़ा करना चाहती है.जब मामला अदालत में गया तो अदालत ने बिना दलीय निशान चुनाव का नियम रद्द कर दिया.

प्रेक्षकों का कहना है कि बीएसपी सरकार ने पिछले पांच सालों में शहरी इलाकों में बिजली,पानी जैसी नागरिक सुविधाओं और अपराध नियंत्रण के मामले में कोई खास काम नही किया.

शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं में जागरूकता और आक्रोश भी अधिक होता है.इसलिए मुख्यमंत्री मायावती नही चाहतीं कि विधान सभा चुनाव से ठीक पहले शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव हों.

माया सरकार ने सरकारी अधिकारियों को इन निकायों का प्रशासक बना दिया,लेकिन हाईकोर्ट ने सरकार के इरादों पर पानी फेरते हुए कहा कि नए चुनाव होने तक पुराने मेयर अपने पद पर बने रहेंगे.

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