....जब भारतीय मेजर ने ख़ुद अपना पैर काटा

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मेजर कार्डोज़ो ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सिलहट की लड़ाई में भाग लिया था. उनको हेलिकॉप्टर से चारों ओर चल रही गोलियों के बीच युद्धस्थल पर उतारा गया था. पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद जब वो उस इलाक़े में गश्त लगा रहे थे, तो उनका पैर एक बारूदी सुरंग पर पड़ा.....आगे की कहानी ख़ुद बता रहे हैं मेजर जनरल बनकर रिटायर हुए इयन कार्डोज़ो......

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उस समय मैं वेलिंगटन स्टॉफ़ कॉलेज में कोर्स कर रहा था. हमें हुक्म मिला कि आप अपने घर-परिवार को छोड़कर सीधे पलटन में पहुँचिए.

जब मैं दिल्ली पहुँचा, तो पता चला कि लड़ाई शुरू हो गई है. पालम पहुँचे, तो पता चला कि विमान कैंसिल हो गए हैं, इसलिए मुझे भागकर नई दिल्ली स्टेशन पहुँचना पड़ा.

यहाँ पहुँचे तो पता चला कि असम मेल निकल गई है. दौड़कर गाड़ी की चेनपुलिंग करके हम ट्रेन में बैठे. असम पहुँचकर हमें पता चला कि सिलहट पर क़ब्ज़े की लड़ाई चल रही है.

हम धर्मनगर पहुँचे और जीप में बैठकर एक जगह खलौरा पहुँचे. वहाँ हम हेलिकॉप्टर के इंतज़ार में थे. हम देख रहे थे कि कई हेलिकॉप्टर में बड़ी संख्या में भारतीय जवान घायल होकर पहुँच रहे थे.

हम हेलिकॉप्टर से जब वहाँ पहुँचें, तो देखा कि भारी गोलाबारी चल रही थी. मोर्टार से, तोपखाने से गोले दाग़े जा रहे थे. वहाँ भयंकर लड़ाई चल रही थी. काफ़ी जवान घायल हो रहे थे और मारे जा रहे थे. साथ ही हम अपने दुश्मन को भी नुक़सान पहुँचा रहे थे.

एमआई रूम पर गोलीबारी हुई और हमारे आठ जवान मारे गए. हमें बताया गया कि 48 घंटे में ही बड़ी पलटन आ जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ नहीं. हमने 10 दिन लड़ाई लड़ी.

नुक़सान

हम नहीं जानते थे कि वो कितने सैनिक थे. हमने उनका काफ़ी नुक़सान किया. लेकिन हमारे पास खाने-पीने का सामान ख़त्म हो रहा था और गोला-बारूद भी कम हो रहा था.

उस समय बीबीसी ने बताया था कि एक ब्रिगेड गोरखा सिलहट में लैंड किया हुआ है. ये सुनकर हमें ये विचार आया कि अगर हम डिफ़ेंस पोजिशन ऐसा बनाए, जिससे ये लगे कि ब्रिगेड के नेतृत्व में हम लड़ाई लड़ रहे हैं.

हमें लग रहा था कि इससे हम पर हमला कम होगा. इस बीच पाकिस्तान को ये संदेश दिया गया कि पाकिस्तानी सैनिक घिरे हुए हैं, आप लोग हथियार डाल दें और आपके साथ जिनेवा संधि के तहत अच्छा व्यवहार किया जाएगा.

इसके बाद 15 तारीख़ को क़रीब एक हज़ार पाकिस्तानी सैनिक चार-पाँच सफ़ेद झंड़ों के साथ हथियार डालने हमारे फ़ॉरवर्ड कंपनी कमांडर के पास पहुँचे.

लेकिन उनकी संख्या देखकर हमने कहा कि आप कल हथियार डालने आना. उन्होंने कहा कि हम आपके ब्रिगेड कमांडर से बात करना चाहते हैं, तो हमने बताया कि ब्रिगेड कमांडर आपसे बात नहीं करना चाहते.

फिर हमने अपने ब्रिगेड कमांडर को सूचना दी. वो फिर हेलिकॉप्टर में पहुँचे. इन लोगों ने ब्रिगेड कमांडर से ये पूछा कि आप कहाँ से आ रहे हो, तो उन्होंने बताया कि वो तो काफ़ी दूर से आ रहे हैं.

जब उन्होंने ये पूछा कि यहाँ कितने लोग थे, जो ब्रिगेड कमांडर ने ये बताया कि यहाँ तो गुरखा राइफ़ल्स की सिर्फ़ एक पलटन थी.

लेकिन हमें तो और भी आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके तो दो ब्रिगेड थे, तीन ब्रिगेडियर थे, सिलहट के गैरीसन कमांडर, 104 अफ़सर, 290 जेसीओ और सात हज़ार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था.

जब हमने जेसीओ से कंबल मांगा तो उसने बोला कि आपके पास कंबल नहीं है, तो हमने बोला कि हम सोने नहीं आपको बर्बाद करने आए हैं. आपके अफ़सर साब के पास भी कंबल नहीं.....मैंने बोला- अगर जवानों के पास कंबल नहीं है तो हमारे अफसर के पास कैसे होता. तो उसने कहा कि अगर हमारी फौज में भारत जैसे अफ़सर होते, तो हम ये दिन नहीं देखते.

पैर काटना पड़ा

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Image caption कार्डोज़ो का एक पैर बारूदी सुरंग में उड़ गया था

आत्मसमर्पण के बाद भी बीएसएफ़ के एक प्लाटून कमांडर को शक़ था कि ख़तरा अब भी बना हुआ है. मैं जाकर उन्हें समझाऊँगा....लेकिन जाते समय बारूदी सुरंग में मैं फँस गया और मेरा एक पैर उड़ गया.

मेरे साथी मुझे उठाकर पलटन में ले आए. मॉरफ़िन और कोई दर्द निवारक दवा नहीं मिली. मैंने अपने गुरखा साथी से बोला कि खुखरी लाकर पैर काट लो, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं हुआ. फिर मैंने खुखरी मांगकर ख़ुद अपना पैर काट लिया. उस कटे पैर को वहीं गड़वा दिया.

सीओ साब ने बोला कि पाकिस्तान का एक युद्धबंदी सर्जन है, मैंने उसे हुक्म दिया है कि वो ऑपरेशन करे. लेकिन मैंने कहा कि मैं भारतीय अस्पताल में जाना चाहता हूँ लेकिन पता चला कि कोई हेलिकॉप्टर नहीं है.

फिर मैं तैयार हुआ. मेजर मोहम्मद बशीर ने मेरा ऑपरेशन किया. उन्होंने बहुत अच्छा ऑपरेशन किया. मैं उसे धन्यवाद नहीं दे पाया. बीबीसी के माध्यम से उन्हें मालूम होगा कि मैं उनका आभारी हूँ. मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहता हूँ.

(बीबीसी के साथ बातचीत पर आधारित)