काश पति ने वादा निभाया होता!

संग्रामपुर
Image caption संग्रामपुर मे रहनेवाली बीबी मशीदुर के पति शाह आलम भी इस ज़हरीली शराब का शिकार बन गए.

संग्रामपुर अपने नाम को पूरी तरह चरितार्थ कर रहा है. इलाक़े का नज़ारा इस समय किसी संग्राम या युद्धस्थल की तरह ही है. संग्रामपुर के लोगों का जीवन किसी संग्राम से कम नहीं है.

पहले लोग रोज़ी-रोटी के लिए संग्राम करते थे और अब बाक़ी जीवन काटने का संग्राम उनके सामने है. अस्पतालों और शव गृहों के सामने शव एक-दूसरे पर अनाज की बोरियों की तरह रखे गए हैं. क़ब्रिस्तान में भी उतनी ही भीड़ है.

स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि कुछ शवों को दफ़नाने की प्रक्रिया चल ही रही होती है कि दस शव और पहुंच जाते हैं.

बुधवार सुबह से ही लोगों की मौत का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह शुक्रवार सुबह तक जस का तस है. पूरे इलाक़े में शवों का जुलूस नज़र आता है.

'वादा'

संग्रामपुर मे रहनेवाली बीबी मशीदुर के पति शाह आलम भी इस ज़हरीली शराब का शिकार बन गए. वह रोते हुए कहती है, ''काश, पति ने अपना वादा निभाया होता.''

मशीदुर कहती है, ''मेरे पति रोज़ शराब पीकर आते थे और घर में अक्सर झगड़े होते थे. वो रोज़ क़सम खाते थे कि कल से शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा. लेकिन उन्होंने एक बार भी अपना वादा नहीं निभाया, वर्ना आज यह दिन नहीं देखना होता.''

आलम की मौत के बाद मशीदुर की चिंता यह है कि उनकी 11 बेटे-बेटियों का गुज़ारा कैसे होगा ?

अहमद सरदार की उम्र तो महज़ 27 साल थी. घर में पत्नी रेजिना के अलावा एक बेटा और बूढ़े मां-बाप थे. अब उनकी आंखों के सामने सूना भविष्य मुंह बाए खड़ा है.

पिता इतने बूढ़े और बीमार हैं कि मज़दूरी नहीं कर सकते. आख़िर घर में चूल्हा कैसे जलेगा? विभिन्न संगठनों की ओर से फ़िलहाल तो राहत शिविरों के ज़रिए खाने का इंतज़ाम किया गया है. लेकिन उसके बाद ? इस सवाल का जवाब न तो मशीदुर के पास है और न ही उनके जैसी सैकड़ों दूसरी महिलाओं के पास.

यह बात अलग है कि इतने बड़े हादसे के बाद तमाम राजनीतिक दल अपना दामन साफ़ रखने के लिए आरोप-प्रत्यारोप में जुट गए हैं.

केंद्रीय मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के महासचिव मुकुल राय पहले ही कह चुके हैं कि वाममोर्चा सरकार ने इस धंधे को कुटीर उद्योग का दर्जा दे दिया था.

कांग्रेस नेता मानस भुइयां भी वाममोर्चा को ही इस घटना के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है, ''पूर्व सरकार ने अवैध शराब भट्ठियों को उद्योग का दर्जा दे दिया था. इसलिए अवैध शराब और अवैध हथियार ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गए थे.''

उधर, पूर्व मंत्री और इलाक़े के माकपा नेता कांति गांगुली आरोप लगाते हैं, ''तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद के छह महीनों में इलाक़े में शराब की भट्ठियों की तादाद तीन गुना बढ़ गई है.''

राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे पर भले कीचड़ उछालने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन कई लोगों का कहना है कि हक़ीकत तो यह है कि किसी का दामन साफ़ नहीं है.

कहा जाता है कि इस धंधे के पीछे के मुख्य लोग हमेशा सत्तारुढ़ राजनीतिक दल के साथ रहते हैं. ज़ाहिर है कि ऐसे में पुलिस या आबकारी विभाग के लोग उनकी ओर टेढ़ी नजर से नहीं देख सकते.

मुआवज़ा

Image caption सरकार ने मरनेवालों के परिजनों को दो-दो लाख़ रुपए का मुआवज़ा देने का एलान किया है

लोगों का कहना है कि संग्रामपुर में अवैध शराब बनाने वाले मूल अभियुक्तों पर पहले माकपा का हाथ था और अब तृणमूल कांग्रेस का.

पति का शव ले जाने के लिए अपने पिता के साथ डायमंड हार्बर अस्पताल के सामने इंतज़ार कर रही छाया कहती है, ''इलाक़े के लोग रोज़ाना यह शराब पीते थे. लेकिन ये उनको एक ही दिन में पी गई.''

वह कहती है कि इतने लोगों की जान लेने वालों को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. छाया की शादी पांच साल पहले हुई थी.

सरकार ने मरनेवालों के परिजनों को दो-दो लाख़ रुपए का मुआवज़ा देने का एलान किया है. छाया और सुल्ताना समेत सैकड़ों महिलाओं को इस सरकारी मुआवज़े का इंतज़ार है.

लोगों का कहना है कि इलाक़े में मुआवज़ा देने-दिलाने के लिए कुछ दलाल भी सक्रिय हो गए हैं.

इन सब के बीच सरकारी सहायता कितनों के हाथ पहुंचेगी और कब तक?

ऐसे ही कई सवालों का जवाब तलाशने की नाकाम कोशिश करते हुए मैं लौट पड़ता हूं कोलकाता की ओर. संग्रामपुर का सन्नाटा और वहां जीवन के संग्राम से जूझ रहे बेहद ग़रीब लोगों को पीछे छोड़ कर.

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