बुर्क़े में जिम

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पिछले कई सालों से एक ही तरह की ज़िंदगी जी रही 35 साल की अनवरी बेगम इन दिनों अपने जीवन में आए बदलाव से काफ़ी ख़ुश हैं.

तीन बच्चों की माँ अनवरी जल्दी-जल्दी चूल्हा-चौकी का काम निपटा, बच्चों को स्कूल और शौहर को काम पर भेज निकल पड़ती है आवाम फ़िटनेस सेंटर की ओर.

अनवरी कहती हैं कि जिस दिन वे जिम नहीं जातीं, उस दिन उन्हें दिनभर ख़ालीपन और शरीर में भारीपन महसूस होता है, लेकिन जब वे जिम जाती हैं, तो उन्हें अपना शरीर गठीला लगता है. पहले तो उन्हें बहुत सुस्ती लगती थी लेकिन अब बहुत चुस्त-दुरुस्त लगती हैं.

वे बताती है, ''पहले घर से निकलना ही नहीं हो पाता था. केवल सब्ज़ी लेने जाते थे फिर घर लौट आते थे. लेकिन जिम में आने के बाद अब दूसरी महिलाओं से भी बात हो जाती है. अब मैं कुछ औरतों की सुनती हूँ, कुछ अपनी कहती हूँ. अब मुझमें एक हिम्मत सी आ गई है.''

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Image caption अवाम फ़िटनेस सेंटर छह महीने पहले खुला था.

जिम से लौटने के बाद वे साफ़-सफ़ाई और घर के अन्य काम निपटाती है और कहती हैं कि जिम जाने के बाद उन्हें थकान भी नहीं लगती.

राजधानी दिल्ली की निज़ामुद्दीन बस्ती की संकरी गलियों में से एक रास्ता आवाम फ़िटनेस सेंटर की तरफ़ जाता है, जहाँ सुबह साढ़े नौ बजे से साढ़े बारह बजे तक महिलाएं करसत करने के लिए जाती हैं.

अनुमति नहीं मिलती

इस जिम की माँग महिलाओं की तरफ से ही आई थी. पहले इस जिम का इस्तेमाल यहाँ के इक्का-दुक्का युवा ही करते थे, लेकिन अब इसे निश्चित समय के लिए महिलाएं उपयोग करती हैं.

इस जिम का नाम भी युवाओं ने ही रखा है और पिछले छह महीने से महिलाएं यहाँ आ रही हैं.

सबा एक बेटी की माँ हैं और पिछले तीन महीने से जिम आ रही हैं. कहती हैं कि वज़न बहुत बढ़ गया था इसलिए उन्होंने जिम आने का सोचा. पहले वे स्वस्थ्य रहने के लिए पार्क जाती थी, लेकिन जब उन्होंने कुछ महिलाओं से आवाम फ़िटनेस सेंटर के बारे में जाना, तो यहाँ आना शुरू कर दिया.

सबा कहती हैं कि मुझे इससे पहले पता ही नहीं था कि जिम भी कुछ होता है. मेरे पति ने कहा कि तुम पार्क में जाती हो, इससे अच्छा जिम जाओ जहां तुम सुरक्षित भी रहोगी.

लेकिन वे कहती है कि एक बात स्पष्ट है, ''अगर जिम में मर्द भी आ रहे होते तो मेरा यहाँ आना संभव नहीं हो पाता. मेरे पति मुझे आने की अनुमति नहीं देते.''

आज़ादी

शहनाज़ कहती है कि यहाँ सभी लोगों का घर बहुत छोटा है, जिसमें बच्चे भी होते हैं और मेहमान आ जाते हैं, तो कोई जगह ही नहीं बचती.

शहनाज़ बताती हैं, ''यहाँ आकर बहुत अच्छा लगता है, महिलाओं से दोस्ती भी हो गई है, यहाँ ख़ाली जगह भी है और ये केवल औरतों का जिम है, तो आज़ादी महसूस होती है. साथ ही आप यहाँ कैसे भी कपड़े पहनकर आ सकते हैं.''

लेकिन इस जिम में आने के लिए महिलाओं को प्रेरित करना इतना आसान नहीं था.

इस जिम की प्रंबधक सालेहा फ़रहीन का कहना है कि महिलाओं को मनाने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी. क्योंकि यहाँ लोग घर से ज़्यादा बाहर नहीं निकलते हैं. जब उन्हें ये बताया गया कि इस जिम की इंस्ट्रक्टर और प्रबंधक भी महिला हैं, तो पहले उन्होंने आकर देखा कि क्या ये वाकई सच है.

सालेहा फ़रहीन कहती है, ''पूरी जाँच-परख करने के बाद महिलाओं ने पाया कि हम जो कह रहे थे उसमे सच्चाई है. साथ ही यहाँ पर कोई कुछ देख नहीं सकता. तब जाकर महिलाओं ने जिम में आना शुरू किया. हमने इन महिलाओं की पहले मेडिकल जाँच भी कराई ताकि ये जाना सकें कि उन्हें कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी नहीं है. अब 40 से ज़्यादा महिलाएं अलग-अलग समय पर जिम में आती हैं और यहाँ उन्हें किसी भी प्रकार के कपड़े पहनने की कोई पांबदी नहीं है.''

मुमताज़ इस जिम में बुर्क़े में ही कसरत करती हैं. कहती हैं कि वे फ़िटनेस को लेकर पहले जागरुक नहीं थी और जिम जाने के बाद उसे पता चला कि औरतों को अपने लिए भी समय निकलाना चाहिए.

मुफ़्त

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Image caption सालेहा फ़रहीन

वे कहती है, ''मेरे पति चाहते हैं कि मैं अगर घर से बाहर निकलती हूँ कि तो कुछ ऐसा-वैसा ना करुँ, जैसे ब़ुर्का ना निकालूँ और मुझे भी केवल फ़िटनेस से मतलब है. इस जिम की सबसे बढ़िया बात ये है कि ये केवल महिलाओं के लिए है और मुफ़्त है.''

इस जिम को इस बस्ती में स्थापित करने में आग़ा ख़ान ट्रस्ट ने भी बड़ी भूमिका निभाई है. ये ट्रस्ट इस बस्ती में पिछले चार साल से काम कर रहा है.

ये ट्रस्ट इस बस्ती में स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा में सुधार और शहरों के नवीनीकरण से जुड़े कार्यक्रमों के लिए भी काम कर रहा है. ये ट्रस्ट नगर निगम की मदद से अपनी परियोजना को अमली जामा पहना रहा है.

इसी ट्रस्ट की एक सदस्य श्वेता माथुर हैं, जो बस्ती में काम की देख-रेख कर रही हैं. वे कहती है कि पहले इस जिम की हालत बहुत ख़राब थी. इमारत टूटी-फूटी हुई थी और मशीनों की हालत भी ख़राब थी.

उन्होंने बताया, ''ट्रस्ट ने यहाँ नई मशीने लगाई है, जिम की इमारत को ठीक किया. एक महिला ट्रेनर का इंतजाम किया ताकि महिलाओं को किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं आए.''

पहले अपनी चारदीवारी में ही सिमटी रहने वाली इन महिलाओं को जहाँ एक ओर स्वास्थ्य संबंधी लाभ मिल रहा है, वहीं अपना दुख-दर्द खुलकर बांटने का मौक़ा भी मिल रहा है. इससे न केवल उनका जीवन के प्रति नज़रिया बदला है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा है.

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