सरकार ने लोकपाल बिल लोकसभा में पेश किया

Image caption लोकपाल को जांच करने का अधिकार दिए जाने को लेकर अन्ना हज़ारे और सरकार के बीच गतिरोध बरक़रार है.

सरकार ने आख़िरकार लोकपाल बिल लोकसभा में पेश कर दिया है.

संसदीय कार्यमंत्री नारायणसामी ने गुरूवार को लोकसभा में बिल पेश किया. लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसमें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण के प्रावधानों का विरोध किया है.

इससे पहले गुरुवार दोपहर लोकसभा में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव ने लोकपाल समिति में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की मांग की थी.

जनता दल(यू) के शरद यादव ने भी उनकी मांग का समर्थन किया था.

उम्मीद जताई जा रही थी कि गुरुवार सुबह को ही लोकपाल विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया जाएगा. लेकिन सुबह के सत्र में ये संभव नहीं हो सका था.

जैसे ही गुरूवार को संसद की कार्यवाही शुरू हुई कई दलों ने इसके कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी.

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और जनता दल(यू) के अध्यक्ष शरद यादव ने लोकपाल समिति में अल्पसंख्यकों के आरक्षण की मांग की थी.

भारी हंगामें के बाद सदन को स्थगित करना पड़ा. सदन की कार्यवाही दोबारा जब दो बजे शुरू हुई तो भी हंगामा जारी रहा. लोकसभा अध्यक्ष ने एक दफ़ा फिर सदन को स्थगित कर दिया.

दोपहर 330 बजे जब लोकसभा की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई तब संसदीय कार्यमंत्री नारायणसामी ने पिछले बिल को वापस लिया और फिर एक नए बिल को पेश किया जिसमें दलित, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है.

बताया जा रहा है कि लोकपाल बिल पर चर्चा क्रिसमस की छुट्टी के बाद 27 दिसंबर को की जाएगी.

'विरोध के स्वर'

नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने इसमें अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिए जाने का विरोध किया. सुषमा स्वराज ने इसे ग़ैरसंवैधानिक क़रार देते हुए वापस लेने की मांग की.

राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने लोकपाल समिति में अल्पसंख्यकों को शामिल किए जाने का स्वागत किया लेकिन उन्होंने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि सरकार ने अन्ना हज़ार के आंदोलन से डर कर जल्दबाज़ी में बिल पेश किया है.

उन्होंने प्रधानमंत्री और सीबीआई को प्रस्तावित लोकपाल के दायरे में लाने का कड़ा विरोध किया.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने चेतावनी दी कि लोकपाल को इतने अधिकार दिए जाने से इस बात की आशंका है कि लोकपाल अपने अधिकारों का ग़लत इस्तेमाल कर सकते हैं.

शिवसेना ने भी इसका विरोध किया. शिवसेना के अनुसार एक शक्तिशाली लोकपाल से देश के लोकतंत्र से तानाशाही की तरफ़ चले जाने का ख़तरा है.

सीपीआई ने लोकपाल बिल पेश किए जाने के लिए सरकार को धन्यवाद दिया लेकिन साथ ही ये भी कहा कि संसद की सर्वोच्चता के साथ किसी भी हालत में समझौता नहीं किया जा सकता है.

सीपीआई नेता गुरूदास दासगुप्ता ने अन्ना हज़ारे का नाम लिए बेग़ैर उनकी तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि इस देश में एक और आदमी राष्ट्रपिता बनने की कोशिश कर रहा है जबकि सच्चाई ये है कि इस देश के केवल एक ही राष्ट्रपिता है.

उन्होंने कहा कि सरकार को किसी एक व्यक्ति की धमकी के आगे झुक कर कोई काम नहीं करना चाहिए.

भाजपा, जनता दल(यू) और एआईएडीम ने इस बिल के कुछ प्रावधानों को संविधान के संघीय ढांचे पर भी हमला बताया.

लेकिन सरकार पर की गई टिप्पणियों का जवाब देते हुए लोकसभा में सदन के नेता और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार ने ना ही किसी जल्दबाज़ी में और ना ही किसी के दबाव में बिल पेश किया है.

उन्होंने ये भी कहा कि इस बारे में काफ़ी विचार विमर्श के बाद ही बिल पेश किया गया है और आख़िरकार लोकसभा के 543 सांसद मिलकर इस बिल को पास करेंगे.

प्रणब मुखर्जी ने कहा कि लोकपाल बिल पारित या ख़ारिज करना सदन का अधिकार है और वह संवैधानिक है या नहीं, यह तय करना न्यायपालिका का अधिकार है, न कि किसी पार्टी का.

गतिरोध

इस बीच लोकपाल बिल के प्रावधानों को लेकर अन्ना हज़ारे और सरकार के बीच गतिरोध बरक़रार है.

सशक्त लोकपाल की मांग कर रहे अन्ना हज़ारे ने अपने पैतृक गांव महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धी में गुरूवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि मौजूदा लोकपाल बिल से देश में भ्रष्टाचार कभी ख़त्म नहीं होगा.

उन्होंने एक दफ़ा फिर दोहराया कि सीबीआई को लोकपाल के दायरे में नहीं लाने की वजह ये है कि सरकार इससे डरती है.

अन्ना के मुताबिक़ अगर सीबीआई लोकपाल के दायरे में होगी तो कई मंत्रियों को जेल जाना पड़ेगा.

लोकपाल समिति में आरक्षण के बारे में अन्ना हज़ारे ने कहा कि इसका फ़ैसला संसद को करना चाहिए.

अन्ना ने सिटिज़ंस चार्टर को भी लोकपाल से बाहर रखे जाने की आलोचना की थी. सिटिज़ंस चार्टर बिल को मंगलवार को संसद में पेश किया गया था.

संबंधित समाचार