अल्पसंख्यक आरक्षण पर बहस

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Image caption लोकपाल समिति में मुस्लिमों को भी आरक्षण दिया गया है.

गुरुवार को राजनीतिक रूप से चर्चा का प्रमुख विषय लोकपाल था, लेकिन सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने एक झटके में इसका रुख मोड़ दिया.

एक ओर लोकपाल विधेयक के अंतर्गत बनने वाली लोकपाल समिति में अल्पसंख्यकों को भी आरक्षण देकर और दूसरी ओर कैबिनेट में अल्पसंख्यकों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी देकर.

नौकरियों में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का संकेत कांग्रेस पार्टी पिछले कुछ दिनों से लगातार दे रही थी तो वहीं लोकपाल में ऐसा उसने कुछ राजनीतिक पार्टियों के दबाव में आकर किया.

लेकिन प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी ने इस मामले को ग़ैरसंवैधानिक बताकर इसका ज़ोरदार विरोध किया है.

वैधानिकता और औचित्य

हालांकि क़ानून के जानकारों की राय इस मामले में एक नहीं है. क़ानून विशेषज्ञ और मशहूर वकील राजीव धवन लोकपाल बिल में आरक्षण की वैधानिकता और औचित्य दोनों पर ही सवाल उठाते हैं.

उनका कहना है, 'जहां तक माइनॉरिटीज़ की बात है तो वो रिज़र्वेशन संविधान के विरुद्ध है. जहां तक एससी, एसटी, ओबीसी की बात है तो ये रिज़र्वेशन हर संस्था के लिए नहीं बनाए गए थे. ये सिविल सर्विस के लिए बनाए गए थे और एजुकेशन के लिए बनाए गए थे. एक ऐसी संस्था जो पुलिस का काम करेगी, जांच का काम करेगी, उसके लिए रिज़र्वेशन तो समझ से परे है.'

वहीं पूर्व मुख्य न्यायाधीश वीएन खरे कहते हैं कि संवैधानिक दृष्टि से आरक्षण देने में कोई बुराई नहीं है लेकिन धर्म के आधार पर आरक्षण ठीक नहीं.

"रिज़र्वेशन हो सकता है. संवैधानिक रूप से भी ये ठीक है. लेकिन धर्म के आधार पर आरक्षण देना ठीक नहीं. 1951 में चंपकम दोरायराजन बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट धर्म के आधार पर आरक्षण को नकार चुका है."

एक अन्य संविधान विशेषज्ञ और अंतर्राष्ट्रीय अधिवक्ता डॉ. सूरत सिंह इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए कहते हैं कि संवैधानिक दृष्टि से इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.

अल्पसंख्यक समुदाय को लोकपाल में आरक्षण के मामले में सूरत सिंह का कहना है कि संविधान समुदाय के आधार पर भेदभाव को रोकता है, न कि उन्हें आरक्षण देने से.

'जो संविधान की धर्म के आधार पर स्वतंत्रता की बात है वो ये है कि धर्म के आधार पर किसी के साध भेदभाव नहीं किया जाएगा, लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े किसी भी वर्ग अथवा समुदाय के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान करने से संविधान नहीं रोकता.'

बहरहाल ये ऐसा मुद्दा हो गया है जिस पर जितनी राजनैतिक चर्चा होगी, उससे कहीं ज़्यादा बहस क़ानूनी और संवैधानिक होगी.

जानकारों का कहना है कि इस बहस का कोई हल निकले या न निकले, लेकिन लोकपाल विधेयक के संसद में जल्द पारित होने पर संदेह ज़रूर पैदा हो गया है.

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