बेचेहरा साल !

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रजनीकांत के लतीफों से शुरू हुआ साल उनके दामाद की आवाज़ में कोलावेरी डी करता हुआ खत्म हो गया.

मुन्नी की बदनामी, शीला की जवानी और जलेबी बाई के विभिन्न संस्करणों की कॉपियां छापता हुआ एक भला आदमी दरियागंज से दस जनपथ के बीच चक्कर काट रहा था. वह सोच रहा था कि दुनियाभर में मशहूर एक पत्रिका को ‘साल का चेहरा’ दिखाने के लिए एक ‘बेचेहरा’ ही क्यों हाथ आया?

उसे बताया गया, ‘यह आंदोलनकारी है. क्योंकि यहां से वहां तक आंदोलनकारी ही फैले हुए हैं इसलिए कोई एक चेहरा नहीं, एक भाव ही आवरण बन सकता था. आपको हमसे क्या समस्या है?’

उसने कहा, "भाव को कोई भाव नहीं देता. भाव अपने आप में एक समस्या है. उसे छुपाया या दबाया नहीं जा सकता है. उसका कोई हल नहीं है. एक चेहरा दे दो, अभी उसका हिसाब किए देते हैं."

बताने वाले ने कहा, "या हमने दिल्ली में एक चेहरा दिया तो था, अन्ना हज़ारे! उसका तुमने क्या किया?"

भले आदमी ने कहा, "मैं उसे नहीं जानता. मैं तो कपिल सिब्बल, चिदंबरम, ए.राजा और सुरेश कलमाड़ी को जानता हूं. हद से हद दिग्विजय सिंह को पहचाना जा सकता है. इनका चेहरा दे देते तो बात बनती."

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"राहुल या सोनिया भी चल जाते?"

"नहीं, उनका चेहरा सामने नहीं होना चाहिए. वे तो अनंत भाव हैं."

"अभी तो तुमने कहा कि भाव को कोई भाव नहीं देता. भाव अपने आप में एक समस्या है. फिर तुम उन्हें भाव रूप में कैसे ग्रहण कर सकते हो?"

"भाव और अनंत भाव में अंतर होता है. अनंत भाव के रूप अनंत चेहरों के रूप में प्रकट हो सकते हैं परंतु वह स्वंय अप्रकट रहता है. इस तरह वह समस्त सृष्टि को संचालित करता हुआ भी कह सकता है कि यह सब उसके कारण नहीं हो रहा. यदि कुछ अघट, घट जाए तो सुविधानुरूप तारणहार के रूप में अवतरित भी हो सकता है."

‘यह भारतवर्ष की अखंड परंपरा के अनुरूप ही है. फिर भी जब उन्हें इतना तत्वज्ञान प्राप्त है तो चेहरे की तलाश में क्यों भटक रहे हो?’

भला आदमी कुछ देर खामोश रहा. फिर बोला, "क्या तुम यह कहना चाहते हो कि पिछले साल में नीरा राडिया, स्टीव जॉब्स, अमर सिंह, ओसामा बिन लादेन, बरखा दत्त, असांज अथवा रामदेव कोई चेहरे ही नहीं थे? क्या केएफसी ने कोई नया चिकन या डोमिनोज़ ने कोई नया पिज़्ज़ा पेश नहीं किया? क्या देल्ही-बेली और डर्टी पिक्चर देश को नहीं मिले? क्या ओबामा, अफगानिस्तान और बिग बॉस के स्वामी अग्निवेश बेकार थे? या ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से देश की गरीबी हटाने वाली सरकारी महायोजना मनेरगा ने ब्रांड एम्बेसडर के रूप में सुशीलकुमार को नहीं पाया?"

इतने सारे चेहरों की बारिश से बताने वाला घबरा गया. बताने वाला दरियागंज से चला था और भला आदमी उसे बात करते-करते दस जनपथ तक ले आया था. उसे खुद याद नहीं रहा था कि उसका भी कोई चेहरा था या नहीं.

अचानक दोनों ने एक दूसरे को गौर से देखा. दोनों बेचेहरा थे.

बताने वाला, आने वाला साल था. पूछने वाला, जाता हुआ साल था.