किन बदलावों के साथ पारित हुआ लोकपाल बिल

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Image caption लोकसभा में 10 घंटे तक चली बहस के बाद विधेयक कुछ संशोधनों के साथ पारित हुआ.

मंगलवार को दस घंटे तक चली बहस के बाद लोकपाल बिल कुछ संशोधनों के साथ लोकसभा में पारित हुआ है.

लोकसभा के सरकारी मसौदे में सम्मिलित किए गए इन बदलावों में सबसे बड़े बदलाव है राज्यों को लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक 2011 लागू करने या न करने संबंधी छूट और भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री पर जांच के आदेश की प्रक्रिया में फेरबदल.

लोकपाल का मतलब एक ऐसे कानून से है जो राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी को अमल में लाएगा जो प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम होगा.

लोकसभा में पारित संशोधित लोकपाल विधेयक के अनुसार अब प्रधानमंत्री के खिलाफ़ जांच के आदेश जारी करने के लिए तीन-चौथाई के बजाय दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होगी. भारतीय जनता पार्टी का मानना था कि लोकपाल के सरकारी मसौदे में प्रधानमंत्री को एक तरह का सुरक्षा कवच प्रदान किया गया था.

राज्यों में लोकायुक्त नियुक्त करने के संबंध में संशोधन का प्रस्ताव यूपीए के घटक दल तृणमूल कांग्रेस और डीएमके की ओर से आया. इन दलों के मुताबिक राज्यों को केंद्र की तरह लोकपाल नियुक्त करने को बाध्य करना भारत के संघीय ढांचे का उल्लंघन होगा. इस संशोधन को भी लोकपाल का हिस्सा बना लिया गया है.

बदलावों के तहत सरकार ने लोकपाल विधेयक के अध्याय 24 को भी हटा दिया है जिसके रहते किसी भी सांसद या विधायक पर भ्रष्टाचार का मामला साबित होने से पहले संपत्ती ज़ब्त होने जैसी कार्रवाई मुमकिन थी.

इसके अलावा सैन्यबलों, कोस्ट गार्ड और सार्वजनिक धन से चलने वाली ट्रस्ट कंपनियों को भी लोकपाल के दायरे से बाहर कर दिया गया है.

इन बदलावों के बावजूद विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों की ओर से सुझाए गए 30 से भी ज़्यादा संशोंधनों में से ज़्यादादर संशोधनों को खारिज कर दिया गया है.

जानकारों का मानना है कि लोकसभा के बाद राज्यसभा में पहुंचने पर भी इस विधेयक में संशोधन सुझाए जा सकते हैं और संभव है कि भाजपा सहित अन्य दल अपने कुछ संशोधनों को राज्यसभा में अमल में लाने में कामयाब रहें.

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