लोकपाल को संवैधानिक दर्जा नहीं दिला पाने के मायने

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Image caption इसे राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस के लिए एक झटका माना जा रहा है.

मंगलवार को लोकपाल बिल लोकसभा में पास तो हो गया लेकिन उसे संवैधानिक दर्जा देने के लिए जो बिल पेश हुआ वो गिर गया.

राहुल गांधी ने ही लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की माँग की थी. तो क्या ये राहुल गांधी के लिए एक बड़ा झटका है?

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह का मानना है कि ये राहुल गांधी के लिए निजी तौर पर और पूरी कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है.

प्रदीप सिंह कहते हैं, ''लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की माँग ना तो टीम अन्ना की थी, ना विपक्षी पार्टियों की और ना ही उस समय तक कांग्रेस की तरफ़ से ही ऐसी कोई मांग की गई थी.''

प्रदीप सिंह के अनुसार 27 अगस्त को लोकसभा में बहस के दौरान अचानक राहुल गांधी ने लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की मांग कर दी जिसके बाद से कांग्रेस ने इसके लिए प्रयास करना शुरू किया लेकिन इसके लिए जो संख्या जुटाने की ज़रूरत थी पार्टी ने उसके लिए गंभीरता से कोई काम नहीं किया.

लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा की राय कुछ अलग है.

विनोद शर्मा का कहना है, ''राहुल गांधी के लिए कोई झटका नहीं है क्योंकि संसद में गणित का खेल होता है और गणित सरकार के पक्ष में नहीं था.''

विनोद शर्मा का मानना है कि ये कांग्रेस के लिए एक तरह से अच्छा है क्योंकि कांग्रेस जनता के बीच में जाकर ये कह सकती है कि उसके पास संख्या नहीं थी इसलिए वो लोकपाल को संवैधानिक दर्जा नहीं दे पाई और उसके पास जब भी संख्या होगी वो उसे संवैधानिक दर्जा दिलाएगी.

आरोप-प्रत्यारोप

लेकिन सवाल ये भी उठता है कि आख़िर लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने संबंधित बिल पास क्यों नहीं हो सका? इस पर भी जानकारों की राय अलग-अलग है.

विनोद शर्मा का कहना है कि कांग्रेस के कुछ अपने सांसद सदन में मौजूद क्यों नहीं थे और उनके कुछ सहयोगियों ने बिल का समर्थन क्यों नही किया इसके लिए तो कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है जो विपक्ष के समर्थन के बिना संभव नहीं था.

सोनिया गांधी ने बुधवार की सुबह ही इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाया.

सोनिया गांधी ने कहा कि स्थाई समिति में बहस के दौरान भाजपा ने बिल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने का समर्थन किया था लेकिन मंगलवार को लोकसभा में मतदान के दौरान उसने अपना असली चेहरा दिखा दिया.

लेकिन प्रदीप सिंह का मानना है, ''व्हिप जारी होने के बाद भी अगर कांग्रेस के सांसद सदन में मौजूद नहीं थे तो इसके लिए विपक्ष को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. जहां तक भाजपा का सवाल है, भाजपा का कहना स्पष्ट है कि वो तो बिल के ही ख़िलाफ़ थी तो फिर उसे संवैधानिक दर्जा देने के पक्ष में कैसे हो सकती है.''

उनके अनुसार भाजपा ने इस मौक़े का फ़ायदा उठाया.

राज्य सभा

मंगलवार को लोकसभा से पास होने के बाद उसे राज्य सभा में पेश किया जाएगा. लेकिन राज्य सभा में यूपीए सरकार अल्पमत में है तो फिर बिल का भविष्य क्या होगा.

प्रदीप सिंह का कहना है कि राज्य सभा में बिल में नए संशोधन होने की संभावना बढ़ गई है.

उनके अनुसार एक तरह का संवैधानिक गतिरोध पैदा होने जा रहा है.

प्रदीप सिंह का कहना है, ''एक नए तरह का संशोधित बिल राज्य सभा से दोबारा लोकसभा में वापस भेजा जाएगा. क्या इसके लिए संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाएगा या फिर बिल को स्थाई समिति में भेजा जाएगा. ये एक अनिश्चितता की स्थिति बन गई है.''

Image caption सोनिया गांधी भाजपा पर आरोप लगा रही हैं तो भाजपा कांग्रेस की नीयत पर शक कर रही है.

विनोद शर्मा का भी मानना है कि राज्य सभा में यूपीए के पास संख्या नहीं है इसलिए वहां भाजपा कुछ और संशोधन कराने की कोशिश करेगी.

विधान सभा चुनाव

लेकिन क्या इसका कुछ प्रभाव पाँच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव पर भी पड़ेगा.

पिछले कुछ महीनों या फिर लगभग एक-डेढ़ साल से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस हमेशा कमज़ोर स्थिति में रही है, उसे हर तरफ़ से हमले झेलने पड़े हैं तो क्या लोकपाल बिल, व्हिसिल ब्लोअर बिल और सिटिज़न चार्टर बिल पास कराकर कांग्रेस इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करेगी.

विनोद शर्मा का मानना है कि कांग्रेस इसका लाभ लेने की कोशिश ज़रूर करेगी लेकिन विधान सभा में और दूसरे स्थानीय मुद्दे ज़्यादा अहम होते हैं.

लेकिन वो इतना ज़रूर कहते हैं कि राजनीतिक बहस में अगर आपके पास कुछ पुख़्ता कहने के लिए होता है तो फिर आपके ऊपर लगे आरोप का आप बेहतर तरीक़े से मुक़ाबला कर सकते है.

दूसरी तरफ़ प्रदीप सिंह का कहना है कि कांग्रेस और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने ढंग से इसका फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे.

प्रदीप सिंह कहते हैं, ''सरकार पर भ्रष्टाचार के जिस तरह के आरोप लग रहे हैं और मामले रोज़ अदालत में चल रहे हैं उसे देखते हुए मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस को निकट भविष्य में इसका कोई राजनीतिक लाभ मिलने वाला है.''

प्रदीप सिंह का तो यहां तक कहना है कि मंगलवार को लोकसभा में हुई पूरी बहस को सुनने के बाद कहा जा सकता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही लोकपाल बिल को लेकर गंभीर नहीं हैं.

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