याचिका के बाद रणनीति पर सरकार में मंथन

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Image caption सेनाध्यक्ष और सरकार के बीच का विवाद पहली बार सुप्रीम कोर्ट पहुँचा है

सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह की ओर से अपनी जन्मतिथि को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका से परेशान सरकार अब इससे निपटने के उपाय तलाश करने में जुटी है.

सोमवार को जनरल सिंह की ओर से दायर याचिका पर सरकार ने मंगलवार को केविएट (आपत्ति सूचना याचिका) लगाया है. इसका अर्थ है कि सरकार ने अदालत से अनुरोध किया है कि जनरल सिंह की याचिका पर सुनवाई के समय सरकार को भी अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया जाए.

इसके बाद रक्षा मंत्री एके एंटनी और क़ानून मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात करके इस विषय पर चर्चा की है.

हालांकि ये पता नहीं चला है कि इस मुलाक़ात में क्या चर्चा हुई लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि इस मुद्दे पर रणनीति को लेकर अहम चर्चा हुई है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार माना जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले तक जनरल सिंह को अवकाश पर जाने को कहा जा सकता है लेकिन अभी ऐसा कोई आदेश नहीं आया है.

इस बीच सरकार ने मलेशिया के दौरे पर गए रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा को अपनी यात्रा में कटौती करके तुरंत वापस लौटने को कहा है.

मामला

लंबे समय से चल रहे विवाद के बाद जनरल वीके सिंह ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके सेना के रिकॉर्ड में अपनी जन्मतिथि में सुधार करने की अपील की है.

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Image caption रक्षा मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वह 10 मई, 1950 को ही जनरल सिंह की जन्मतिथि मानता है

दस्तावेज़ों के अनुसार जनरल वीके सिंह के मेट्रिक के प्रमाण पत्र में उनकी जन्म तिथि 10 मई, 1951 है लेकिन यूपीएससी के फ़ॉर्म में जिसके ज़रिए वे सेना में भर्ती हुए उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1950 है.

रक्षा मंत्रालय ने अपनी एक रिपोर्ट में साफ़ कर दिया है कि वह जनरल सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1950 को ही प्रामाणिक मानता है.

मंत्रालय का कहना है कि इसी जन्मतिथि के आधार पर उन्हें पिछली पदोन्नतियाँ दी गई हैं.

इस लिहाज़ से सेनाध्यक्ष को मई, 2012 में सेवानिवृत्त होना पड़ेगा लेकिन यदि उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1951 मान ली जाती है तो उनकी सेवानिवृत्ति वर्ष 2013 में होगी.

जनरल सिंह ने अदालत में 20 दस्तावेज़ पेश किए हैं जिसमें से 19 में उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1951 दर्ज है.

जनरल सिंह का कहना है कि सवाल उनकी सेवानिवृत्ति का नहीं, उनकी 'विश्वनीयता और प्रतिष्ठा' है.

विपक्षी दलों ने भी इस बात को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया है कि सेना के सर्वोच्च पद पर आसीन एक अधिकारी को लेकर उसने विवाद को अदालत तक पहुँचने की नौबत ला दी है.

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