मंदी अमरीका में, असर पंजाब चुनाव पर

पंजाब में चुनावी संग्राम इन दिनों परवान चढ़ रहा है. पंजाब एक ऐसा राज्य है जहाँ से विदेशों में जाकर बसने वाले भारतीय मूल के लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा है. लेकिन सात समदंर पार रहने के बावजूद ये एनआरआई यानी भारतीय मूल के लोग हमेशा से पंजाब चुनावों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं.

कुछ किसी विशेष राजनीतिक दल के उम्मीदवारों के लिए प्रचार करते हैं तो कुछ वित्तीय मदद तक देते हैं. लेकिन इस बार भारतीय मूल के कई लोग ऐसे भी हैं जो किसी दल का समर्थन न करते हुए केवल लोगों को जागरुक करने का काम कर रहे हैं.

इसी काम में जुटे हैं अमरीका में बसे सतनाम सिंह चहल जो करीब एक महीने से ख़ास तौर पर पंजाब चुनाव के लिए आए हुए हैं.

वे कहते हैं, “पंजाब के जो हालात हैं उसे देखते हुए हमने एक प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करने का फ़ैसला किया है. हम लोगों को जागरुक कर रहे हैं कि केवल साफ़ सुथरी छवि वाले लोगों को वोट दें न कि अपने दोस्त रिश्तेदारों को. तभी भ्रष्टाचार मुक्त ख़ुशहाल पंजाब बन सकेगा.”

आर्थिक संकट का असर

वैसे भारतीय मूल के ज़्यादातर लोग ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा जैसे देशों में बसे हैं. यूरोप और अमरीका में आर्थिक हालात ज़्यादा अच्छे नहीं है.

कैलिफॉर्निया से आए सतनाम सिंह चहल मानते हैं कि इसका कुछ असर भारतीय मूल के इन लोगों पर भी पड़ा है जो पंजाब चुनाव में योगदान देते हैं. उनका कहना है, "रिसेशन तो है. इस वजह से चुनाव में योगदान देने वाले लोगों की संख्या में कुछ कटौती तो हुई है. वोट करने के लिए भी कम लोग आ रहे हैं. लोग इतना पैसा नहीं खर्च कर सकते."

विदेशों में बसे भारतीयों का कार्यक्षेत्र अब केवल यहीं तक सीमित नहीं रहा है. पंजाब के दाखा मतदान क्षेत्र से तो कांग्रेस ने पूर्व में ब्रितानी नागरिक रहे जस्सी खंगूरा को उम्मीदवार बनाया है. वे दो साल की उम्र में ब्रिटेन चले गए थे.

पंजाब में उनका व्यवसाय और परिवार था. लेकिन 2002 में वे राजनीति से जुडे. 2007 में उन्होंने पंजाब विधानसभा में चुनाव लड़ा और विधायक बने. इस बार वे फिर से चुनावी मैदान में हैं.

हड़प लेते हैं पीछे से ज़मीन

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विदेशों में बसे इन भारतीयों की अपनी समस्याएँ भी हैं जिनका ये निदान चाहते हैं. ऐसे कई लोगों की खेती-बाड़ी और ज़मीन पंजाब में है. कईयों की शिकायत है कि उनकी ग़ैर मौजदूगी में दबंग लोग ज़मीन-ज़ायदात पर कब्ज़ा कर लेते हैं.

हैरी लाली कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में विधायक हैं. इन दिनों पंजाब आए हैरी लाली की भी यही समस्या है. वे कहते हैं, “विदेशों में बसे भारतीयों की संपत्ति को कई बार उनकी ग़ैर मौजूदगी में हड़प लिया जाता है. यहाँ का क़ानूनी सिस्टम भी एनआरआई नहीं जानता और फँस जाताहै. हम सुरक्षित वातावरण चाहते हैं.”

लुधियाना के गिल गाँव के भूपिंदर सिद्धु बरसों से कनाडा में रहते हैं और वहाँ अपना बिज़नेस है.. वे बिना लाग लपेट अमरिंदर सिंह का समर्थन करते हैं. वे बिजली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार चाहते हैं ताकि यहाँ कारोबार करने के लिए इतने पापड़ न बेलने पड़े.

पंजाब चुनाव में विदेशों से आए भारतीय मूल के लोगों का कितना प्रभाव है इसकी कई मिसालें हैं. पारंपरिक तौर पर ये लोग अपने गाँवों आदि के विकास के लिए समय समय पर पैसा भेजते हैं. इन लोगों का भारत में रहने वाले अपने रिश्तेदारों और गाँवों में ख़ासा रसूख होता है. इस वजह से ये एनआरआई बड़ी संख्या में वोटें किसी उम्मीदवार के पक्ष में प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं.

विभिन्न पार्टियों के नेता विदेशी मीडिया में जाकर इंटरव्यू भी दे रहे हैं ताकि अपनी बात लोगों तक पहुँचा सकें.

पंजाब चुनाव से जुड़ने के पीछे विदेशों में बसे भारतीय मूल के इन लोगों का अपना-अपना मकसद है. किसी का मकसद राजनीतिक है, किसी का व्यवसायिक, पारिवारिक और किसी का सामाजिक.

लेकिन ज़ाहिर है विदेशों में बसे भारतीय मूल के ये लोग चुनावी रंगों में अपना अलग रंग भर रहे हैं.

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