चुनावों में बुनकरों को लुभाने पहुंची पार्टियां

बुनकर
Image caption मुलायम सिंह सरकार ने बुनकरों को एक स्थिर दर पर बिजली सप्लाई तय करके बड़ी राहत दी थी.

फ़ैज़ाबाद से क़रीब पचास किलोमीटर पहले सरयू नदी के किनारे बसा टांडा क़स्बा लगभग हज़ार साल से कपड़े के कुटीर उद्योग के लिए जाना जाता है. पहले हथकरघा और फिर पावरलूम.

कहते हैं कि जैसे अयोध्या के हर घर में मंदिर है वैसे ही टांडा के हर घर में पावरलूम.

टांडा में पैदल सड़क पर चलें तो करघे चलने की खटखट की आवाजें कान में गूंजती रहती हैं. बरामदों में लोग बोरों में कपडे की पैकिंग करते दिखते हैं और संकरी गलियों में रिक्शों पर इन कपड़ों से लदे बोरे.

यहाँ क़रीब एक लाख करघे हैं जिनसे क़रीब तीन लाख परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार मिलता है.

टांडा में कमीज़ और कुर्ता पाजामा के लिए सस्ता टेरीकॉट का कपड़ा बनता है. यहाँ की लुंगी और गमछा भी मशहूर है. मगर टांडा हिंदुस्तान का एकमात्र कस्बा है जो खाड़ी के देशों को अर्फी रुमाल का निर्यात करता है. इस मामले में वह चीन से प्रतिस्पर्धा करता है.

टांडा से करीब छह- सात सौ करोड़ रूपए का सालाना टर्न ओवर है. लेकिन कई सालों से टांडा का पावरलूम उद्योग उपेक्षा का शिकार है.

पिछली मुलायम सिंह सरकार ने जाते-जाते बुनकरों को एक स्थिर दर पर बिजली सप्लाई तय करके बड़ी राहत दी थी.

मायावती से नाख़ुश

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Image caption बुनकरों की सबसे बड़ी समस्या धागों की सप्लाई में किल्लत और महंगाई है.

टांडा अकबरपुर जिले का हिस्सा है जो मुख्यमंत्री मायावती का अपना ज़िला जाना जाता है क्योंकि वह यहाँ से सांसद और विधायक चुनी गयी थीं.

मायावती सरकार में अकबरपुर से तीन-तीन कैबिनेट मंत्री हैं. उन्होंने मुलायम सिंह द्वारा दी गई बिजली की स्थिर दर को ख़त्म नही किया , लेकिन बुनकरों को शिकायत है मायावती सरकार ने उनको पर्याप्त बिजली सप्लाई और कच्चा माल यानि धागे की सप्लाई देने पर कोई ध्यान नही दिया.

यहाँ के मशहूर और बुजुर्ग बुनकर हाजी सरवर कहते हैं कि, “बिजली की कमी रहती है, जिसकी वजह से हमारा कारोबार ख़राब रहता है. अधिकतम दस घंटे ही बिजली हमको मिलती है.”

बगल में बैठे उनके बेटे हाजी कमाल अहमद धागों की सप्लाई में किल्लत और महंगाई की याद दिलाते हैं.

वह कहते हैं , “ धागे की बड़ी समस्या है क्योंकि पहले सरकारी स्पिनिंग मिलें बनायीं गई वे सब धीरे-धीरे बंद हो गई हैं. इसलिए निजी मिलों के शोषण से हम लोगों की गाढ़ी कमाई उन लोगों कि तिजोरियों में चली जाती है.”

यहां 24 कताई मिलें अब से क़रीब तीस साल पहले कांग्रेस सरकार ने लगवायी थीं जो दूसरे सरकारी कारखानों की तरह धीरे - धीरे बंद होती चली जा रही हैं.

धागे की समस्या

टांडा के क़रीब मरेला की कताई मिल भी बंद हो गयी है. अब उत्तर प्रदेश सरकार चीनी मिलों की तरह इन्हें भी बेंचना चाहती है.

पहले यहाँ धागे का डिपो होता था, जिससे बुनकर को सीधे कच्चा माल मिल जाता था, अब वह सुविधा भी बंद हो गई है. बुनकरों का कहना है कि निजी मिलों ने हाल ही में धागे का दाम बीस रुपए किलो बढ़ा दिया.

उत्तर प्रदेश के बुनकरों का कहना कि दक्षिण के तमिलनाडु , आध्रप्रदेश , गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में कपडा उद्योग और बुनकरों को बहुत मदद मिलती है लेकिन उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में लगातार उपेक्षा हो रही है, जबकि किसानों के बाद सबसे बड़ी आबादी होने के नाते बुनकर राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं.

उत्तर प्रदेश की लगभग चार करोड़ मुस्लिम आबादी में सात फीसदी अंसारी यानि बुनकर बिरादरी के लोग हैं. ये पश्चिम के गाज़ियाबाद , मेरठ, मुज़फ़्फरनगर से लेकर इटावा कानपुर बाराबंकी, अंबेडकरनगर , खलीलाबाद , गोरखपुर , आजमगढ़ , मऊ बनारस, गाजीपुर , भदोही और इलाहाबाद तक फैले हैं.

राजनीतिक दृष्टि से इनका झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ दिखाई देता है , लेकिन पिछले दो चुनावों से पीस पार्टी ने भी इनके बीच सेंध लगाई है.

कांग्रेस का वादा

बुनकरों के बीच अपना खोया जनाधार वापस पाने के लिए कांग्रेस की केंद्र सरकार ने हाल ही में छह हज़ार करोड़ रुपयों से अधिक का पैकेज घोषित किया है , जिसमे कर्ज़ा माफ़ी और क्रेडिट कार्ड की सुविधा शामिल है. लेकिन आचार संहिता के चलते अभी इस पर अमल नही हुआ.

बुनकरों को यह भी शिकायत है कि अब तक उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता सहकारी समितियों के माध्यम से आती है जो समितियों में भ्रष्टाचार के कारण उन तक नही पहुंचती. यह कमी दूर करने के लिए राहुल गांधी अब पैसा सीधे बुनकरों के खाते में भेजने की बात कह रहें हैं.

मगर यहाँ के बुनकरों की सबसे बड़ी मांग है कि बंद पड़ी कताई मिलें चालू करवा दें. बुनकरों की शिकायत है कि निजी मिलें धागे की कालाबाज़ारी करती हैं.

बुनकर शकील अख्तर कहते हैं , ''अभी हमें दक्षिण से धागा मंगाना पड़ता है, इसलिए हमारा माल मंहगा पड़ता है और प्रतिस्पर्धा के कारण बिक नही पाता.''

केंद्र की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम समुदाय को रिझाने के लिए पिछड़े वर्गों के सत्ताईस फ़ीसदी कोटे में मुसलमानों के लिए साढ़े चार फ़ीसदी का कोटा निर्धारित किया है जिसके ख़िलाफ़ भाजपा बड़ा आंदोलन छेड़ने जा रही है और समाजवादी पार्टी इसे धोखा करार दे रही है.

पिछड़े वर्गों में जिन मुस्लिम जातियों को आरक्षण मिलना है उनमे जुलाहा यानि अंसारी प्रमुख हैं. मगर बुनकर हाजी सरवर इसको बहुत महत्त्व नही देते .

उनका कहना है, “हम लोगों को आरक्षण से क्या फायदा होगा.हम लोग तो औद्योगिक लोग हैं और कपड़ा अपनी मेहनत मज़दूरी से बनाते हैं.हम लोगों के यहाँ गरीबी है जिसकी वजह से हम लोग अपना पेट पालने में ही लगे रहते हैं. बहुत कम लोग ही शहर में सरकारी नौकरियों में जाने की बात सोच पाते है, क्योंकि शिक्षा की बहुत उचित व्यवस्था नही है.”

अब चुनाव का माहौल है,भाजपा को छोड़ बाकी सभी पार्टियां राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बुनकर समुदाय को लुभाने में लगी हैं.

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