क्यों है गढ़वा नक्सलियों का गढ़?

झारखंड के गढ़वा ज़िले में एक बारूदी सुरंग में हुए विस्फ़ोट के बाद 13 पुलिसकर्मियों के मारे जाने और कई अन्य के घायल होने की खबर आई है लेकिन ये घटना इस इलाक़े के हिंसक इतिहास की एक कड़ी मात्र है.

झारखंड में रांची से लगभग 200 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित ये इलाक़ा माओवादियों का गढ़ है और नक्सल हिंसा प्रभावित पलामू, लातेहार जैसे ज़िलों से सटा है.

साल के ज़्यादातर महीनों में सूखे से प्रभावित रहने वाले इस इलाक़े में आज भी ‘सूखा-पलामू, भूखा पलामू’ के नारे गूंजते हैं.

बारुदी सुरंग में विस्फ़ोट, 13 की मौत

‘बंधुआ मज़दूरी’ और ज़मींदारों की ‘निजी सेनाओं’ के लिए कुख्यात रहे इस इलाक़े में सामंतवाद के खिलाफ़ लामबंद हुए खेतीहर मज़दूरों के आंदोलनों को माओवादियों का समर्थन मिला और समय के साथ माओवादियों ने इलाक़े में अपनी पैठ जमा ली.

पलामू-गढ़वा के इस इलाक़े की सीमाएं उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार से सटी हैं. यही वजह है कि माओवादी अक्सर हिंसक वारदातों को अंजाम देने के बाद सुरक्षाबलों को चकमा देकर किसी भी राज्य की सीमा में दाख़िल हो जाते हैं.

सुरक्षाबलों के लिए एक बड़ी चुनौती

तीन राज्यों का मसला होने के चलते नक्सली हिंसा से निपटने के लिए ज़रूरी एकजुटता और एकल रणनीति का अभाव भी बढ़ते हमलों की एक वजह है.

घने जंगलों और छितरी आबादी वाला ये इलाक़ा अपनी भौगोलिक संरचना के चलते सुरक्षाबलों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुआ है. यही वजह है कि झारखंड में होने वाली ज़्यादातर नक्सली घटनाएं इसी क्षेत्र में अंजाम दी जाती हैं.

तीन दिसंबर 2011 को माओवादियों ने लातेहार में एक बारुदी सुरंग का विस्फ़ोट कर दस पुलिसवालों और एक बच्चे को मार दिया था.

इन इलाकों में माओवादी पुलिस अधिकारियों और सुरक्षाबलों को बंधक भी बना चुके हैं.

ये झारखंड के वो इलाक़े हैं जहां सूरज ढलने के बाद आवाजाही की इजाज़त नहीं.

नक्सली हिंसा भारत के 29 राज्यों में से 20 में फैल चुकी है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े ख़तरे के रुप में देखते हैं.

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