कहाँ गया परंपरागत चुनावी रंग?

Image caption दूर-दूर तक फैले हरे-भरे गेंहू, अरहर और गन्ने के खेतों के बीच पीली सरसों बड़ी मनमोहक लग रही है

इस चुनाव में रंग केवल खेतों में है. लखनऊ से चल कर बाराबंकी से बहराइच वाली सड़क पर आगे बढते ही दोनों ओर दूर-दूर तक फैले हरे-भरे गेंहू, अरहर और गन्ने के खेतों के बीच पीली सरसों बड़ी मनमोहक लग रही है.

गोंडा, अयोध्या, फैज़ाबाद , टांडा और बस्ती होते हुए गोरखपुर तक आने-जाने में सड़क के दोनों ओर बस यही हरे पीले खेत दिखे.

चुनावी हवा का एहसास कराने वाले बैनर, पोस्टर, कट आउट, होर्डिंग्स और दीवारों पर लिखे नारे आदि सब गायब हैं.

हाँ साबुन, तेल, सीमेंट और नामर्दी दूर करने वाले दवाखानों के विज्ञापन बदस्तूर दीवारों पर कायम हैं.

बाराबंकी का रामनगर हो ,बहराइच का जरवल, गोंडा का करनैलगंज कस्बा या अकबरपुर का टांडा. किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार का चुनाव कार्यालय नहीं दिखा.

न कोई रिक्शा पर लाउडस्पीकर लगाकर प्रचार करता दिखा और न ही गाड़ी रोक कर पर्चा बांटता मिला. कहीं कोई नुक्कड़ सभा नही दिखी.

आयोग की पैनी नज़र

चुनाव आयोग के आदेश पर हर काम के लिए पुलिस–प्रशासन की अनुमति चाहिए.

इन्हीं परम्परागत प्रचार साधनों से बच्चे और आम नागरिक भी चुनाव की राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होते थे.

मगर अब चार लोग मिल बैठकर राजनीतिक बात नहीं कर सकते. कोई प्रत्याशी या नेता रास्ते में गाड़ी रोक कर कहीं सौ-पचास लोगों से संवाद नहीं कर सकते.

शादी-ब्याह और घरेलू दावत के खर्च पर भी आयोग की नज़र है.

Image caption हर वाहन को जगह-जगह रोक कर गहन तलाशी ली जा रही है

एक रेलवे क्रॉसिंग पर मेरी गाड़ी रुकी , तो पीछे से एक और बड़ी लाल बत्ती वाली गाड़ी आकर रुकी. आगे की सीट पर पुलिस का गनर था. बीच की सीट पर दो अफसर बैठे थे.

मेरे ड्राइवर ने गाड़ी के आगे लगी तख्ती देखकर बताया कि ये चुनाव आयोग के प्रेक्षक हैं, जिनके डर से ही ये सन्नाटा छाया हुआ है.

रेलवे क्रॉसिंग खुली तो प्रेक्षक की गाड़ी ज़ोर-ज़ोर से हूटर बजाती चल पड़ी.मैंने ड्राइवर से अपनी गाडी इसके पीछे लगाने को कहा, ताकि रास्ता साफ़ मिले.

देखा घाघरा पुल के इस पार ढेर सारी गाड़ियाँ खड़ी हैं और पुलिस उन सबकी तलाशी ले रही है.

इनमें सब आम लोग थे. कोई व्यापारी भी होगा तो कोई अपने बीमार को इलाज के लिए अस्पताल ले जा रहा होगा.

पुलिस की अनदेखी?

आज कल मामूली बीमारी में लाख दो लाख जेब में रखकर अस्पताल जाना पड़ता है. ये पैसा आपके घर में रखा हो सकता है, बिज़नेस का हो सकता है, थोक मंडी से माल लाने के लिए या बिक्री का पैसा बैंक में जमा करने के लिए हो सकता है.

मगर चुनाव आयोग के आदेश पर पुलिस और आयकर विभाग को इस पैसे का लिखित रिकॉर्ड दिखाना है, वरना पैसा ज़ब्त.

मगर मज़े की बात है कि इतनी तलाशी के बाद भी चुनाव में रूपये खर्च करने वाले नेता का पैसा न तो पकड़ा गया और न ही जब्त हुआ. क्या इनकम टैक्स और पुलिस अफ़सरों को नहीं मालूम कि नेता लोग अपना काला धन कहां रखते हैं?

बहरहाल, आयोग के प्रेक्षक की गाडी के पीछे लगी होने से घाघरा पुल पर तो मेरी गाडी नहीं रोकी.

लेकिन गोरखपुर प्रवेश करते समय मेरी गाडी के आगे कोई प्रेक्षक नही था.

अर्धसैनिक बालों की एक टोली यहां गाड़ियों की तलाशी ले रही थी. एक पत्रकार मित्र ने बताया था कि दो दिन पहले कैसे उनके बैग की एक-एक जेब की तलाशी ली गई थी.

ऐसे ही एक पत्रकार ने अपना लेख लिखने के लिए कुछ दलों के एक-एक पर्चे अपने साथ रखे थे, तो उन्हें चुनाव सामग्री बताकर पुलिस वाले ज़ब्त करने लगे. तब ज़िले के पुलिस कप्तान को फोन करने पर उन्हें पर्चे वापस मिले.

ये सब जानते हुए मैंने अपने आप ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा और उतर कर उन्हें इत्मिनान से तलाशी लेने दी.

एक क्षण के लिए मेरे दिमाग में कुछ साल पहले नेपाल दौरे की याद ताज़ा हो गई, जब वहां आपातकाल के दौरान सेना और माओवादी गुरिल्ले दोनों ही, सड़क पर गाड़ी रोककर तलाशी लेते थे.

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