नहीं आए लेकिन छाए सलमान रुश्दी

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Image caption सलमान रुश्दी विश्व के साहित्यिक मंच का जाना पहचाना नाम है.

जयपुर साहित्य महोत्सव में दुनियाभर से आए साहित्यकारों को सुनने, नज़दीक से देखने और उन्हें जानने के लिए नेता आए, अभिनेता आए, जनता आई, हर ख़ासो आम ने बढ चढ़ कर हिस्सा लिया.

भीड़ इतनी उमड़ी कि लगा जयपुर के हेरिटेज होटल दिग्गी पैलेस में कुंभ का मेला लगा हो.

समारोह के एक सत्र से दूसरे सत्र के वेन्यू पर जाना भीड़ के उफ़नते सागर को पार करने जैसा था.

लेकिन पहले दिन से लेकर अब तक जयपुर के इस वैश्विक साहित्यिक आयोजन में न आकर भी छाए रहे भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखक सलमान रूश्दी.

समारोह से पहले ही रूश्दी के आने के ख़िलाफ़ दारुल उलूम के कुलपति मौलाना नोमानी की धमकियों ने साहित्य महोत्सव के पूरे आयोजन को रूश्दीमय बना दिया.

अब साहित्य की जगह चर्चा ये होने लगी कि रूश्दी आएंगे या नहीं.

पत्रकार आयोजकों से यही पूछते नज़र आए कि क्या रूश्दी पर कोई नया अपडेट है.

न आनेवाले रूश्दी को लेकर माहौल इतना रूश्दीमय हो गया कि समारोह में हिस्सा लेने वाले बाकी के 257 लेखक अपने विख्यात रचना संसार के साथ नेपथ्य में चले गए.

शायद यही वजह रही कि 20 जनवरी को समारोह के औपचारिक उद्घाटन से एक दिन पहले किए गए प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आयोजकों ने सबसे पहले कहा कि ‘‘कृपया सलमान रूश्दी से संबंधित सवाल न पूछें. उद्घाटन समारोह में वो नहीं आ रहे हैं और अगले कुछ दिन तक जयपुर आने का उनका कोई कार्यक्रम भी नहीं है, हालांकि साहित्य महोत्सव की तरफ़ से उन्हें दिया गया निमंत्रण बरकरार है.’’

उन्होंने ये भी कहा कि एक लेखक के न होने से एशिया प्रशांत के इस सबसे बड़े साहित्यक आयोजन पर कोई असर नहीं पड़ता, यहां शिरकत करनेवाले 257 लेखक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने सलमान रूश्दी.

लेकिन आयोजकों के इतना कह देने भर से ही बात ख़त्म नहीं हो गई.

20 जनवरी को समारोह शुरू हुआ और सबसे पहले मध्यकालीन संत कबीर के बहाने बात शुरू हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से. इस स्वतंत्रता के बहाने अप्रत्यक्ष रूप से हर तरफ़ छाए हुए थे सलमान रूश्दी.

दोपहर होते होते आयोजकों ने एक प्रेस कॉन्फ्रे़ंस की और सलमान रूश्दी का एक बयान पढ़कर सुनाया जिसका लब्बोलुबाब ये था कि सलमान रूश्दी को ख़ुफ़िया सूत्रों से पता चला है कि उन्हें मारने की सुपारी दी गई है और जयपुर पहुंचने पर उनकी जान को ख़तरा है और वो नहीं चाहते कि अपनी, अपने परिवार और समारोह में आनेवालों की सुरक्षा के प्रति ग़ैर ज़िम्मेदार बनें.

लगा मामला ख़त्म हो गया है, लेकिन फिर रूश्दी ने ट्वीट कर दिया कि वो वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए अपनी बात रखेंगे. अब चर्चा शुरू हो गई कि कब संबोधित करेंगे रुश्दी.

तभी लेखक हरि कुंज़रू और अमिताभ कुमार ने सलमान रूश्दी की भारत में प्रतिबंधित किताब ‘सैटनिक वर्सेज़’ के कुछ अंश पढ़कर एक नया बवाल खड़ा कर दिया.

जो किताब प्रतिबंधित है उसके अंश कैसे पढ़े जा सकते हैं. आननफ़ानन में आयोजकों ने इस मामले से कर लिया किनारा और कहा कि लेखकों ने जो कुछ भी किया है उसके लिए वही ज़िम्मेदार हैं, आयोजकों की इसमें कोई सहमति नहीं है.

अब शोर होने लगा कि हरि कुंज़रू और अमिताभ कुमार के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.

किसी तरह पहला दिन बीता और दूसरे दिन की साहित्यिक शुरुआत हुई गुलज़ार की शायरी से, प्रसून जोशी के कविता पाठ से. लेकिन बात होती रही कि क्या कुंज़रू और अमिताभ कुमार के ख़िलाफ़ वाक़ई क़ानूनी कार्रवाई होगी.

इन्हीं सबके बीच चर्चित लेखक चेतन भगत ने कह डाला कि सलमान रूश्दी की किताब पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि उससे एक बड़े समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि सलमान रूश्दी को भारत आने से रोका नहीं जाना चाहिए.

तो इस तरह दूसरे दिन भी समारोह पर रूश्दी का प्रभाव छाया रहा.

बात होती रही कि अगर रूश्दी नहीं आए हैं तो क्या इससे कट्टरपंथियों की जीत हो गई है, वो अपने मक़सद में क़ामयाब रहे हैं.

और अब तीसरे दिन सलमान रूश्दी के उस ट्वीट की चर्चा है कि जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘मैंने पता लगाया है कि मेरी जान को ख़तरा बताना एक झूठ था और मुझे लगता है कि मुझे ग़लत ख़बर देने वाले पुलिस के लोग ही हरि कुंज़रू और अमिताभ कुमार को ग़िरफ़्तार करने की फ़िराक़ में हैं’.

क्या सच है क्या झूठ ये तो समय और जांच से पता चलेगा लेकिन हक़ीक़त यही है कि जयपुर साहित्य महोत्सव में न आ कर भी हर जगह मौजूद हैं सलमान रूश्दी.

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