'आ लौट के आ जा मेरे मीत'

 रविवार, 22 जनवरी, 2012 को 11:52 IST तक के समाचार

छत्तीसगढ़ में आदिवासी नक्सलियों और पुलिस के बीच पिस रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों और पुलिस की लड़ाई में पिसते आदिवासी पलायन को मज़बूर हैं. जंगलों के रास्ते आंध्र प्रदेश गए आदिवासी जिल्लत और परेशानी झेलने को अभिशप्त हैं.

इन्हें वापस लाने की कोई पुरज़ोर सरकारी कोशिश तो नहीं हुई है लेकिन कुछ संगठनों और निचले स्तर के अधिकारियों ने मिलकर आदिवासियों को वापस गांव लाने की कोशिश ज़रुर की है.

बीजापुर के सुदूर अंचल में एक ऐसा ही गाँव है लिंगागिरी जहां आदिवासी परिवार वापस आकर बसे हैं.

लिंगागिरी के लिए निकलते हुए मुझे दंतेवाड़ा में ही कलक्टर का साक्षात्कार करने में देर हो गई. दोपहर के आस पास मेरी गाड़ी आवापल्ली के रास्ते पर थी और मेरे ड्राइवर के दिल में खौफ. सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था.

पहले पुलिस नाके से हमारी तलाशी का अभियान शुरू हुआ. मेरा पहचान पत्र देखा गया. मुझे ऊपर से नीचे तक देखा गया. कुछ सवाल किए गए. सुरक्षा बलों के हथियारबंद जवान पता नहीं मेरी गाड़ी में वह क्या तलाश कर रहे थे. सभी हैरान थे और मानो यह सोच रहे हों कि इस इलाके में बाहर से आने की हिमाक़त कौन कर सकता है.

डरे सहमे लोग

छोटी सी सड़क चारों तरफ घने जंगल और रास्ते में जहाँ तहां पड़े बारूदी सुरंगों से सुरक्षा बलों के क्षतिग्रस्त वाहनों के अवशेष. मेरे ड्राईवर नें इतना चुनौती भरा सफ़र पहले कभी नहीं किया था इस लिए वह घबराया हुआ था. मगर मैंने उसकी हिम्मत बाँधी वरना टूटी फूटी बारूदी सुरंगों से पटी हुई इस सड़क पर एक छोटी सी ग़लती या चूक महंगी पड़ सकती है.

एक आदिवासी

"हां के लोग हमें अपने नलों से पानी भी नहीं भरने देते थे. वह बोलते थे कि छत्तीसगढ़ के लोग वापस छत्तीसगढ़ जाओ. यहाँ से पानी नहीं भरने देंगे"

एक एक कर पांच नाकों से होते हुए हम बासागुडा पहुंचे. पहली बार लगा कि वक़्त कितनी तेजी के साथ आगे बढ़ जाता है. इस इलाके में रात हो जाने का मतलब नाका बंद. अगर नाका बंद कर दिया गया तो रात वहीँ बितानी पड़ेगी. इसके लिए मेरा ड्राइवर तैयार नहीं था.

बासागुडा बेस कैंप पार कर मैंने गाड़ी रोकी और लोगों से लिंगागिरी जाने का रास्ता पूछा.

मगर कोई बताने को तैयार नहीं था. मैंने दुकान में खड़े एक युवक से कहा कि क्या वह हमें वहां तक पहुंचा सकता है. मगर उसकी मजबूरी साफ़ झलकती नज़र आई.

काफी देर की खामोशी के बाद वह बोला, ‘‘वह सामने पुल देख रहे हैं ना आप. वहां तक पुलिस या प्रशासन का राज है. पुल के उस पार माओवादियों का इलाका है."

युवक ने अपनी दुविधा बताते हुए कहा, ‘‘आप आज आए हैं. फिर चले जायेंगे. मुझे आपसे कोई लेना देना नहीं है. ना आप मुझे जानते हैं ना मैंने आपको बुलाया है मगर आपके जाने के बाद मैं जवाब देता देता थक जाऊंगा कि क्यों ले कर गया था. आप खुद चले जाइए.’’

मैं जिससे बात करने की कोशिश करता वह अपना मुंह फेरकर चलता बनता. मेरे पास वक़्त कम था इस लिए चिंता बढ़ रही थी. रात यहाँ बिताना एक अच्छा ख़याल नहीं हो सकता था.

लिंगागिरी में कुछ परिवार वापस लौटे हैं लेकिन पुलिस और माओवादी उन पर शक करते हैं.

पुल के पास गाड़ी छोड़ चार किलोमीटर का पैदल सफ़र तय कर लिंगागिरी पहुंचा. वहां के समुदायिक नल पर औरतों की भीड़ थी जो पानी भर रहीं थी. कुछ देर के बाद गाँव के लोग चौपाल में इकठ्ठा हुए.

लिंगागिरी की बेचैनी

इस गाँव के युवक चीरम नागेश ने बातचीत की शुरुआत की. उनका कहना था कि इस इलाके में 62 परिवार ऐसे हैं जो आंध्र प्रदेश से वापस लौट आए हैं.

फिर एक एक लोग खुलते चले गयी कुछ गोंडी बोल रहे थे मगर नागेश और एक अन्य युवक गुन्टालू राजू उसका अनुवाद कर उनकी भावनाएं मुझे बता रहे थे.

नागेश ने बताया, ‘‘यहाँ सलवा जुडूम के लोगों का आतंक बढ़ गया था. हमारे ऊपर हमले हो रहे थे. हम क्या करते. जान बचाना पहला काम था इस लिए हम जंगल के रास्ते होते हुए आंध्र प्रदेश के चेरेला के इलाके में जा बसे. कुछ लोग यहाँ से 2006 में गए तो कुछ 2009 में.’’

गाँव के ही एक बुज़ुर्ग आंध्र प्रदेश में बिताये अपने एक एक पल को याद कर सिहर उठते हैं. उन्होंने बताया कि उन सब आदिवासियों की ज़िन्दगी नरक बन गयी थी. "वहां के लोग हमें अपने नलों से पानी भी नहीं भरने देते थे. वह बोलते थे कि छत्तीसगढ़ के लोग वापस छत्तीसगढ़ जाओ. यहाँ से पानी नहीं भरने देंगे."

गुन्टालू राजू

"इतने में गुज़ारा बहुत मुश्किल था क्योंकि हम किराए पर रहते थे जहाँ रोज़ के पचास रूपए देने पढ़ते थे. अगर पचास रूपए किराए में देते हैं तो हम खाते क्या और पहनते क्या."

चूँकि यह मजबूर आदिवासियों की जमात थी इस लिए इनका शोषण आंध्र प्रदेश के ठेकेदारों और खेतों के मालिकों ने भी जमकर किया. दिनभर की मजदूरी के बदले उन्हें सिर्फ पचास रूपए ही मिल पाते थे.

गुन्टालू राजू ने कहा, ‘‘इतने में गुज़ारा बहुत मुश्किल था क्योंकि हम किराए पर रहते थे जहाँ रोज़ के पचास रूपए देने पढ़ते थे. अगर पचास रूपए किराए में देते हैं तो हम खाते क्या और पहनते क्या."

लिंगागिरी के आदिवासी अपने खेत खलिहान और जंगल छोड़ अपनी जान बचाने भाग कर चले गए थे. अब सामाजिक संगठनों की मध्यस्ता से इनकी घर वापसी हुई है. मगर बस्तर संभाग से गए दूसरे आदिवासी इतने खुशकिस्मत नहीं हैं. लिंगागिरी के लोगों का कहना है कि बासागुडा कैंप से सुरक्षा बलों का आना फिर शुरू हो गया है. वह बताते हैं कि एक बार फिर अब पुलिस वाले रात बेरात उनके घरों की तलाशी लेने धमक जाते हैं.

अब सवाल उठता है कि घर वापसी का मार्ग प्रशस्त करने की बजाए, इन वापस आये लोगों का दिल जीतने की बजाए अगर एक बार फिर इन्हें शक की निगाहों से देखा जाएगा तो फिर यहाँ के हालात के बेहतर होने की कल्पना नहीं की जा सकती.

सामाजिक और आदिवासी संगठनों के अनुमान के हिसाब से पूरे बस्तर संभाग में 700 मोहल्ले और टोले ओसे हैं जो वीरान हो गए हैं.

यहाँ के जंगल, जहाँ आदिवासी अपने जानवर चराया करते थे, वह भी वीरान हो गए हैं. यहाँ के परंपरागत लोक गीत और संगीत की धुनें सूनी हो गयीं हैं. ना मेले लगते हैं ना सामाजिक अनुष्ठान ही होते हैं. इन सब पर हिंसा का साया है. यह सूने पड़े हाट बाज़ार. यहाँ से बहने वाली नदियाँ और झरने, यहाँ के जंगल पहाड़ मानो इनके वापस लौटने की बाट जो रहे हैं.

रात हो गयी है. इलाके की नाकेबंदी से पहले मुझे बीजापुर शहर पहुंचना है. जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई मेरी गाड़ी आगे बढ़ रही है और कैसेट पर मुकेश का यह गाना बज रहा है. "आ लौट के आजा मते मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं."

इतने दिनों से इन आदिवासियों के पलायन पर काम करते हुए बस्तर और आंध्र प्रदेश के इलाकों में घूमकर ऐसा लग रहा था शायद यहाँ के जंगल, पहाड़, नदियाँ, हाट, बाज़ार, कह रहे हों "......आ लौट के आ जा मेरे मीत...., मेरा सूना पड़ा रे संगीत, तुझे तेरे गीत बुलाते हैं.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.