'किताबों पर रोक ग़ैरक़ानूनी'

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Image caption भारतीय मूल के लेखक रुश्दी लंबे समय से ब्रिटेन में रह रहे हैं

लेखक सलमान रुश्दी की किताब “द सैटेनिक वर्सेस” ब्रिटेन में वर्ष 1988 में प्रकाशित हुई जिसके कुछ ही दिनों में भारत सरकार ने इस पर रोक लगा दी थी.

“द सैटेनिक वर्सेस” पर ये रोक भारत के कस्टम्स एक्ट 1962 की धारा 11 के तहत लगाई गई.

इसके मुताबिक़ किताबें और अन्य प्रकाशित सामग्री समेत किसी भी ऐसी चीज़ के देश में लाए जाने पर रोक लगाई जा सकती है अगर वो 'भारत की सुरक्षा, क़ानून व्यवस्था, राष्ट्रीय गौरव, अन्य देशों के साथ रिश्तों, शालीनता के क़ायदों इत्यादि का उल्लंघन' करती हों.

भारत सरकार के मुताबिक़ रुश्दी की किताब एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती थी.

लेकिन वरिष्ठ वकील कोलिन गोन्सालविस के मुताबिक ये रोक ग़ैर-क़ानूनी है और भारत में किसी क़ानून के तहत किसी किताब पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता.

बीबीसी से बातचीत में कोलिन ने कहा, “भारत का संविधान सबको अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, ये तो सरकार की तानाशाही है जिससे जनता डर जाती है, जो ग़लत है, वरना ऐसे प्रतिबंध ग़ैरक़ानूनी हैं और उन्हें अदालत में चुनौती दी जा सकती है.”

कोलिन के मुताबिक रोक के बाद उसपर सवाल खड़े किए जा सकते हैं और फिर ये रोक लगाने वाली सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो साबित करे कि प्रतिबंध ज़रूरी है.

‘इंटरनेट पर रोक व्यवहारिक नहीं’

कोलिन मानते हैं कि इंटरनेट के ज़रिए अभी भी प्रतिबंधित किताबों की प्रतियां निकाली जा सकती हैं और ये कस्टम्स एक्ट का उल्लंघन नहीं होगा.

साइबर क़ानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल भी कहते हैं कि इंटरनेट पर बेची और ख़रीदी जाने वाली सामग्री के नियम, वर्ष 2000 में लागू किए गए ‘इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी एक्ट’ के तहत बनाए गए हैं.

उनका कहना है कि ये नियम किसी भी तरह की जानकारी पर प्रतिबंध लगाने के बारे में विशेष तौर पर कुछ नहीं कहते.

दुग्गल ने बीबीसी को बताया, “क़ानून के तहत आप इतना भर कर सकते हैं कि भारत में जानकारी ब्लॉक कर दें, लेकिन क्योंकि अन्य देशों में स्थित सर्वर के तहत यही जानकारी भारत में फिर भी पढ़ी जा सकती है, इसलिए इंटरनेट पर कोई भी रोक व्यावहारिक नहीं होती.”

सलमान रुश्दी की किताब “द सैटेनिक वर्सेस” की प्रतियां ना सिर्फ़ उनकी अपनी वेबसाइट पर, बल्कि फ़्लिपकार्ट और ऐमेज़ॉन जैसी वैबसाइटों तथा किन्डल और ई-बुक जैसी नई तकनीक के ज़रिए अब भी भारत में उप्लब्ध हैं.

भारत में किताबों पर रोक

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Image caption तस्लीमा नसरीन के विवादास्पद लेखन की वजह से कई वर्ष पूर्व बांग्लादेश सरकार ने उन्हें देश-निकाला दे दिया था

“द सैटेनिक वर्सेस” के अलावा भी भारत में कई किताबों पर केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों ने समय-समय पर रोक लगाई है.

गुजरात सरकार ने बेहतरीन लेखन के लिए पुलिट्ज़र पुरस्कार से सम्मानित लेखक जोसेफ़ लेलिवेल्ड की किताब, “ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विद इंडिया” को विकृत मानसिकता को बढ़ाना देने वाली बताकर उस पर रोक लगाई थी.

गुजरात सरकार ने भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह द्वारा लिखित मोहम्मद अली जिन्ना की जीवनी “जिन्ना: इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेन्डेन्स” पर रोक लगा दी थी लेकिन कुछ ही महीनों में इसे गुजरात हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया. हालांकि पार्टी ने जसवंत सिंह को विवाद की वजह से कुछ समय के लिए निष्कासित कर दिया था.

महाराष्ट्र सरकार ने अमरीकी लेखक जेम्स लेन की किताब, “शिवाजी: हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया”, पर रोक लगाई थी. लेकिन इसे चुनौती दी गई और पहले बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने ये रोक हटा दी.

पश्चिम बंगाल सरकार ने बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की किताब, “द्विखंडितो”, पर रोक लगाई थी. उनका आरोप था कि ये किताब लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है.

कालजयी मानी जाने वाली लेखक डीएच लॉरेन्स की किताब, “लेडी चैटरलीज़ लवर” में कामोत्तेजक भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए भारत सरकार ने इस पर रोक लगाई थी.

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