'मौलाना बिना खुशबू के फूल'

उत्तर प्रदेश के सियासी बगीचे में मौलाना जज़्बाती तक़रीर करने वाले लोग ऐसे फूल बन गए हैं, जिनकी खुशबू चली गई है, बस खूबसूरती रह गई है- यह बयान किसी हिंदू नेता का नहीं, किसी राजनीतिक विशेषज्ञ का भी नहीं, यह बयान है मोहम्मद अय्यूब का, जो हापुड़ ज़िले के तिल्खुआ के एक पास के छोटे से गाँव में रहते हैं.

अय्यूब का यह वाक्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बहुत बड़े बदलाव को रेखांकित करता है.

अय्यूब कहते हैं, "मुसलमानों की सोच बदली है, पहले ज़ज्बातों में आ कर उन्होंने कई फैसले लिए लेकिन अब नहीं. अब तो लोग मौलानाओं के बारे ज़्यादा फ़िक्र नहीं करते."

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर असमर बेग़ अय्यूब की बात को सही ठहराते हैं.

बेग कहते हैं, "यही कारण है इस बार चुनावों में राज्य के प्रमुख दलों के नेताओं के चेहरे उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के धार्मिक गुरुओं के साथ अख़बारों में नहीं चमक रहीं. असमर बेग़ कहते हैं कि भाजपा के पतन के बाद उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के लिए सुरक्षा का मुद्दा सबसे बड़ा नहीं रहा."

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों पर बारीकी से नज़र रखने वाले बेग़ कहते हैं, "अब हालात में वो बात नहीं रही इसलिए मुसलमान अब अधिक मुखर हो गए हैं. अब वो असल मुद्दों पर आ गए हैं और पूछ रहे हैं कि कौन हमें क्या दे रहा है. इसीलिए पहली बार कांग्रेस अल्पसंख्यकों को 4.5 फ़ीसदी आरक्षण की बात कर रहे हैं और समाजवादी पार्टी ने तो मुसलमानों को ही 18 फ़ीसदी के आरक्षण का वादा कर डाला. इस चुनाव में जज़्बाती बातें अलंकार काम नहीं कर रहे."

असमर बेग़ बताते हैं कि यही कारण है कि इस चुनाव में पहली बार एक मुस्लिम पार्टी 'पीस पार्टी' के रूप में मैदान में है.

नए मुद्दे

तो क्या केवल आरक्षण मुसलमान का मुद्दा है?

इस सवाल के उत्तर में राज्य के मेरठ ज़िले के एक गावं में अपना निजी कारोबार करने वाले 30 वर्षीय युवा नैयर चौधरी कहते हैं, "आरक्षण तो मुसलमानों का मुद्दा है, वो तालीम चाहता है और समाज में अपना एक स्थान चाहता है. पर अगर मेरी पूछो तो मुसलमान जानता है कि कोई कुछ देने वाला नहीं, जो करना है ख़ुद करना होगा."

उत्तर प्रदेश में मुसलामानों की क़रीब 18 फ़ीसदी आबादी है और ऐसा माना जाता है की विधानसभा की क़रीब 125 सीटों पर यह समुदाय जीत-हार के समीकरण बदल सकता है.

यानी मुसलमान वोटों के लिए लड़ाई जारी है, लेकिन लड़ाई के नियम बदले हुए लग रहे हैं क्योंकि मुसलमान बदला हुआ लग रहा है.

अब क्या नतीजे बदलते हैं यह देखना होगा और नतीजे केवल चुनाव परिणामों भर से जाहिर नहीं होंगे.

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