क्यों है चुनावों पर भ्रष्टाचार की फाँस!

 गुरुवार, 26 जनवरी, 2012 को 20:07 IST तक के समाचार
जन लोकपाल बिल

अन्ना हज़ारे के आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को भी जन लोकपाल बिल पर गंभीर होना पड़ गया.

पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की बिसात बिछ चुकी है. सभी मोहरे अपनी-अपनी जगह पर दम भर रहे हैं. लकिन भारतीय राजनीति में पिछले एक साल से भी ज़्यादा से जो चीज़ सबके ज़ेहन पर हावी है, वो है इन चुनावों में छाया रहने वाला भ्रष्टाचार का मुद्दा.

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चलाया गया जन आंदोलन जैसे ही देशव्यापी होने लगा था, राजनीतिक दलों ने इस पर 'रोटियां सेंकने' की मुहिम सी छेड़ दी थी.

ख़ुद अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगियों ने कई पार्टियों पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का इल्ज़ाम भी लगाया था और उनके ख़िलाफ़ प्रचार करने की बात भी कई बार दोहराई गई.

इत्तेफ़ाक ऐसा भी रहा कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में राज्य सरकारें भी इसी दौरान तमाम कथित आरोपों से जूझ रहीं थीं.

उत्तर प्रदेश में अगर राष्ट्रीय स्वास्थ्य स्कीम संबंधी घोटाले का पर्दाफ़ाश हो रहा था, तो पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली सरकार पर किसानों के साथ छल करने और राज्य में होने वाली नियुक्तियों में कथित धांधली के आरोप लग रहे थे.

ठीकरा

"भ्रष्टाचार मिटाने की ऐसी कोई भी गोली किसी राजनेता या राजनीतिक दल के पास नहीं है कि रातोंरात इसका सफ़ाया हो जाए. सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात जिसे अभी लोग समझ नहीं सके हैं वो ये है कि दूसरे के गिरहबान में झाँकने से पहले सभी दलों को अपनी-अपनी पार्टियों के भीतर का नज़ारा ले लेना चाहिए"

पुष्पेश पंत, राजनीतिक विश्लेषक

उत्तराखंड में तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी सरकार के सामने एक विकट समस्या रही. 2009 में हुए आम चुनावों में पार्टी ने प्रदेश में हुए ख़राब प्रदर्शन का ठीकरा तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी पर मढ़ा और उनके बदले रमेश पोखरियाल 'निशंक' को कुर्सी पर बैठा दिया.

लेकिन चुनाव आते आते 'निशंक' साहब पर भी कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगे और भुवन चंद्र खंडूरी दोबारा अपनी कुर्सी पर काबिज़ हो गए.

क्या पार्टियों ने चुनाव के मद्देनज़र भ्रष्टाचार विरोधी कहे जाने वाले जो क़दम उठाए, उनका तर्क सही बैठता है?

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत का मानना है कि राजनीति और देश में भ्रष्टाचार रहा तो लंबे समय से है और इसे जानता भी हर कोई रहा है.

उनका कहना है, "भ्रष्टाचार मिटाने की ऐसी कोई भी गोली किसी राजनेता या राजनीतिक दल के पास नहीं है कि रातों-रात इसका सफ़ाया हो जाए. सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात जिसे अभी लोग समझ नहीं सके हैं वो ये है कि दूसरे के गिरहबान में झाँकने से पहले सभी दलों को अपनी-अपनी पार्टियों के भीतर का नज़ारा ले लेना चाहिए. सब कुछ साफ़ हो जाएगा."

'भ्रष्ट' उम्मीदवारों की छंटनी?

उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड राज्यों में राजनीति भले ही अलग-अलग मुद्दों पर होती रहे, लेकिन कथित भ्रष्टाचार के आरोप यदा-कदा सभी पार्टियों पर लगते रहे हैं. ख़ास तौर से सत्ताधारी पार्टी पर.

शायद यही वजह रही हो कि चुनाव की तारीखें क़रीब आने पर ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं से कन्नी काटनी शुरू कर दी थी.

सबसे ज़्यादा मिसाल क़ायम करने की कोशिश रही मायावती की. उत्तर प्रदेश में लगातार दो सरकारों की मुखिया रहीं मायावती को बाबू सिंह कुशवाहा जैसे अपने कुछ सिपहसालारों से दूरी बनानी पड़ी और उन्ही की पार्टी में रहे सांसद धनंजय सिंह के खिलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज करने पड़े.

कुल मिलाकर प्रदेश में पांच मंत्रियों को अपने पद से रफ़ा-दफ़ा होना पड़ा. सवाल यही उठते रहे कि क्या चुनावों से पहली उठाई गई इस तरह की कोशिशें रंग लाएंगी?

क्या ये मान लिया जाए कि भारत में पिछले कुछ समय से भ्रष्टाचार और आपराध से जुड़े मामले अब स्थानीय नहीं रह गए हैं और उन्होंने एक राष्ट्रीय रंग ले लिया है.

कम से कम पुष्पेश पंत इस बात से ज़रूर सहमत हैं कि तमाम राजनीतिक दलों में एक हलचल सी ज़रूर है लेकिन इसके परिणाम अभी दूरगामी नहीं दिखते.

वो कहते हैं, "निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों में इस बात को लेकर कौतूहल ज़रूर है कि उनके उम्मीदवारों की छवि कैसी है. पर आख़िरकार चुनाव आते-आते सभी को अपने उम्मीदवारों की हार-जीत की संभावना की चिंता होने लगी थी और उसका अंजाम हम सब के सामने है."

आगे क्या?

मूलभूत प्रश्न यही है कि चुनावी नतीजे क्या होंगे? जिस पार्टी को जनमत सबसे ज़्यादा मिलेगा, सरकार तो उसी की बनेगी.

लेकिन इस सबके बीच निगाहें इसी बार रहेंगी की छह मार्च को आने वाले नतीजों में किस उम्मीदवार को जनता ने विधान सभा में भेजा.

उस उम्मीदवार का राजनीतिक इतिहास कैसा है, उसके ख़िलाफ़ कथित भ्रष्टाचार के मामले कभी दर्ज भी हुए या नहीं.

लकिन इन सब के बीच सबसे अहम मुद्दा यही रहेगा कि आगामी चुनावों में पांच भारतीय राज्यों की जनता क्या इस बात पर ज़रा भी गौ़र करेगी कि उनके प्रदेश में जो सरकार आए उसकी छवि दूसरों के मुक़ाबले बेहतर रहे.

फ़िलहाल तो आलम ये है कि कम से कम उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में शायद ही कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी हो जिसके सभी के सभी उम्मीदवार पूरी तरह साफ़-सुथरी छवि वाले हों.

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