धान ले रहा है किसानों की जान

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Image caption गलसी देश में सबसे बड़ा धान उत्पादक प्रखंड है.

पश्चिम बंगाल में बर्धवान के गलसी प्रखंड के नाम एक शानदार रिकार्ड दर्ज है.

यह देश में सबसे बड़ा धान उत्पादक प्रखंड है. लेकिन यही ख़ासियत अब उसके माथे का कलंक बनती जा रही है.

कर्ज़ और धान की बंपर फसल के बोझ के तले दब कर इलाक़े के किसानों के सांसों की डोर टूटने लगी है.

आर्थिक बदहाली से तंग किसान इन समस्या से छुटकारे के लिए आत्महत्या का आसान रास्ता अपना रहे हैं.

पिछले सप्ताह कीटनाशक पीकर जान देने वाले 35 साल के सुशांत घोष की कहानी इसका सबूत है.

सुशांत अपने छह-सदस्यीय परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य था. लेकिन उसकी मौत भूख नहीं, बल्कि धान के उस ढेर की वजह से हुई जो अब भी उसके घर के आगे रखा है. इस धान का कोई ख़रीददार ही नहीं है.

सुशांत के पिता विकास उस धान को अब तक बेच नहीं सके हैं.

धान की उचित कीमत

इसकी वजह यह है कि उनको उसकी उचित क़ीमत नहीं मिल रही है. अपने घर के सामने बैठे विकास सूनी आंखों से धान का उस ढेर को निहारते रहते हैं.

वह कहते हैं, ''मेरे बेटे ने कुछ धान बेचा था. लेकिन उससे इतने पैसे नहीं मिले कि हम आलू की खेती कर सकते.सुशांत पर दो लाख का कर्ज़ था. इनमें से 60 हज़ार रुपए तो भारतीय स्टेट बैंक की स्थानीय शाखा से लिए थे और स्थानीय कॉरपोरेटिव बैंक से 35 हज़ार. लेकिन इसके अलावा एक स्थानीय महाजन से उसने ऊंची ब्याज़ दर पर क़रीब एक लाख रुपए लिए थे. धान, आलू और सरसों की उचित कीमत नहीं मिलने की वजह से सुशांत यह कर्ज़ नहीं चुका पा रहा था.''

यह सब एक दिन में नहीं हुआ. सुशांत ने पहले कर्ज़ लेकर अपने सात बीघा खेत में अमन धान की खेती की थी. उसके बाद बाकी आठ बीघा पर बोरो धान की रोपाई की थी. लेकिन फसलों को बेचकर जो पैसे मिले उससे घर का ख़र्च चलाना ही मुश्किल था.

ऐसे में कर्ज़ भला कहां से चुकाता? इसके बाद उसने आलू और सरसों की खेती के लिए दोबारा कर्ज़ लिया.

लेकिन बेमौसम हुई बरसात ने इन फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया. नतीजतन लागत भी डूब गई.

सुशांत के चचेरे भाई देव नरायाण घोष बाते हैं, ''सुशांत ने पांच सौ रुपए क्विंटल धान बेचकर कुछ कर्ज़ चुकाने का प्रयास किया था. इस परिवार में कर्ज़ के अलावा दूसरी कोई समस्या नहीं थी.''

लेकिन प्रशासन इस हक़ीकत को कबूल करने के लिए तैयार नहीं है.

गलसी की बीडीओ वर्षा रानी बसु कहती हैं, ''इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट मिले बिना मौत की वजह पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती.''

तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता प्रशांत कुंडू कहते हैं, ''सुशांत आलू का कारोबार करता था. उनमें भारी घाटा होने और किसी को दिया गया कर्ज़ डूब जाने की वजह से उसने आत्महत्या की है. इस मामले का खेती से कोई लेना-देना नहीं है.''

भारी कर्ज़

लेकिन माकपा की गलसी शाखा के सचिव फैयाज़ रहमान का दावा है कि वे सुशांत को निजी तौर पर जानते थे. उसने बैंक और स्थानीय महाजन से भारी कर्ज़ लिया था. लेकिन फसलों की बिक्री नहीं होने की वजह से वह कर्ज़ नहीं चुका सका.

यह बिडंबना ही है कि बंपर उत्पादन की वजह से जिस बर्धवान ज़िले को धान का कटोरा कहा जाता है वहीं इसी धान की फसल किसानों के लिए जानलेवा साबित हो रही है.

ज़िले में अब तक 14 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. अकेले पिछले सप्ताह ही राज्य में जिन छह किसानों ने आत्महत्या की उनमें से चार बर्धवान ज़िले के ही थे. बर्धवान के अलावा पड़ोसी मुर्शिदाबाद, मालदा, हुगली और उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले से भी किसानों की आत्महत्या की ख़बरें लगातार आ रही हैं.

फसलों का बंपर उत्पादन किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत समझा जाता है.

लेकिन पश्चिम बंगाल में इस फसल की खरीद और उनके भंडारण की समुचित व्यवस्था नहीं होने की वजह से प्रतिकूल असर पड़ रहा है.

राज्य में इस साल 150 लाख टन धान की पैदावार हुई है. पिछले साल यह आंकड़ा 130 लाख टन था.

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Image caption धान की उचित क़ीमत न मिलने के कारण किसान कर्ज़ के बोझ के तले दब गए हैं

केंद्र सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1080 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है. लेकिन किसानों तक यह रकम नहीं पहुंच रही है. सरकार ने इस साल 20 लाख टन धान की खरीद का लक्ष्य तय किया है. लेकिन अब तक दो लाख टन की ही खरीद हो सकी है.

नतीजतन किसान खुले बाज़ार में छह सौ रुपए क्विंटल की दर से अपनी फसल बेचने को मजबूर हैं. ऐसे में बिचौलियों की बन आई है. वे सस्ती दर पर किसानों से धान खरीद कर उनको ऊंची कीमत पर चावल मिलों को बेच देते हैं.

बंगाल के ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था का जटिल गणित ही किसानों की जान का दुश्मन साबित हो रहा है.

सरकारी खरीद की नई नीति में एक पेंच यह है कि इसके तहत धान की खरीद पर भुगतान बैंकों के ज़रिए ही किया जा है.

बिचौलिया एक समस्या

लेकिन ज़्यादातर किसानों का बैंक में खाता नहीं होने की वजह से उनको मजबूरन बिचौलियों की शरण में जाना पड़ता है. राज्य में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज भी नहीं है जहां इस बंपर उत्पादन को रखा जा सके.

बर्धवान में पंद्रह दिनों पहले आत्महत्या करने वाले अमिय साहा के बेटे जीवन बताते हैं, ''सरकार ने अगर वक्त पर धान की खरीद में सक्रियता दिखाई होती तो मेरे पिता की जान बच सकती थी. उनको धान और कर्ज़ के बोझ ने मार दिया.''

उनका सवाल है कि अगर किसान को पूरे साल की मेहनत के बाद अपनी फसल बेच कर मुनाफ़ा नहीं मिले तो वह परिवार का पेट कैसे चलाएगा और कर्ज़ कहां से चुकाएगा ?

किसानों के पास आम तौर पर कमाई का दूसरा कोई ज़रिया नहीं होता. आलू उगाने वाले किसानों की हालत भी ऐसी ही है. लाखों टन आलू कोल्डस्टोरेजों में रखे-रखे सड़ रहे हैं. किसानों को 50 किलो आलू की बोरी सौ रुपए में बेचनी पड़ रही है. जबकि बाज़ार में इस आलू की क़ीमत आठ से 10 रुपए प्रति किलो है. बाकी मुनाफा बिचौलिए मार जाते हैं.

किसानों को आमतौर पर फसलों की बुवाई के सीज़न में पहले बीज और फिर खाद के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है. लेकिन बैंक आम तौर पर छोटे किसानों को खेती के लिए कर्ज़ देने में आनाकानी करते हैं.

ऐसे में उनके पास स्थानीय महाजनों से कर्ज़ लेना पड़ता है और इस पर इन्हें बयाज़ दर 120 प्रतिशत सालाना तक चुकानी पड़ती है यानी एक लाख के कर्ज़ पर उनको फसल कटने के बाद 2.20 लाख तक चुकाना पड़ सकता है.

इलाके में जो लोग बीज और खाद का कारोबार करते हैं, 'चित भी मेरी और पट भी मेरी’'की तर्ज़ पर वही इन किसानों को कर्ज़ भी मुहैया कराते हैं. बाद में यह लोग किसानों से लागत से भी कम क़ीमत पर उनकी फसलों को खरीद कर घर बैठे मोटा मुनाफा कमा लेते हैं.

ब्याज़ दर

महाजनों का यह मकड़जाल इस कदर उलझा है कि एक बार इनके जाल में फंसने वाला किसान चाह कर इससे मुक्त नहीं हो सकता. वर्षों की कोशिशों के बावजूद जब कर्ज़ की रकम लगातार बढ़ती जाती है तब उसे हताशा में अपनी जान देने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं सूझता.

गलसी के एक किसान निताई घोष कहते हैं, ''सरकार अगर समय पर हमारी फसल खरीद ले तो आत्महत्या की घटनाएं काफी कम हो सकती हैं. इसके लिए पहले स्थानीय साहूकारों और बिचौलियों का जाल ध्वस्त करना जरूरी है. लेकिन ऐसा करने की बजाए सरकार मूकदर्शक बनी हुई है.''

जाने-माने गायक और तृणमूल कांग्रेस सांसद कबीर सुमन ने किसानों की आत्महत्या पर गीत लिख कर खुद अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है.

'कान्नाय कान दाऊ यानी रुलाई पर ध्यान दो' शीर्षक इस गीत नें उन्होंने कहा है कि 'मां, माटी और मानुष' के नारे पर चुनाव जीत कर आने वाली ममता बैनर्जी सरकार को किसानों के आंसू पोंछने की दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए.

लेकिन ठोस कदम की कौन कहे, सरकार तो इनको किसान ही मानने को तैयार नहीं है.

पूरे बर्धवान ज़िले के विभिन्न गांवों में लगभग हर घर के सामने लगे धान के ढेर को ताकते हुए लोगों की आंखें अब पथराने लगी हैं. उनकी आंखों के आंसू भी सूखने लगे हैं. ऐसे में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं तो फिलहाल थमती नजर नहीं आतीं.

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