कांग्रेस के लिए बाग़ी बने सिरदर्द

इंदिरा हृदयेश
Image caption कांग्रेसी नेता इंदिरा हृदयेश का मानना है कि बाग़ी उम्मीदवारों से नुक़सान होता है

चुनाव के दौरान बाग़ी उम्मीदवारों का खड़ा हो जाना एक आम बात है, लेकिन बाग़ी उम्मीदवार किसी पार्टी के लिए चुनावों में हार-जीत का कारण बन जाते हैं, तो फिर ये एक बड़ी समस्या हो जाती है.

उत्तराखंड में इस समय कांग्रेस पार्टी भी इसका शिकार होती हुई दिख रही है. उत्तराखंड में कुल 70 विधान सभा सीटें हैं और ऐसा माना जा रहा है कि कम से कम पांच-छह सीटों पर बाग़ी उम्मीदवारों कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार के लिए सिरदर्द बने हुए हैं.

नैनीताल ज़िले के अंतर्गत आने वाली कालाढ़ुंगी विधान सभा से कांग्रेस के पुराने नेता महेश शर्मा प्रबल दावेदार थे लेकिन उनको टिकट नहीं मिल सका. उनकी जगह राहुल गांधी के क़रीबी माने जाने वाले प्रकाश जोशी को टिकट दे दिया गया. इसके विरोध में महेश शर्मा निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं.

स्थानीय राजनीति पर नज़र रखने वाले समीक्षकों का मानना है कि महेश शर्मा के जनाधार को नकारा नहीं जा सकता है और वो कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती बने हुए हैं.

उसी तरह लालकुंआ विधान सभा सीट से दो बार विधायक रह चुके हरीश दु्र्गापाल का टिकट काट कर उनकी जगह नौजवान नेता हरेंद्र बोरा को टिकट दिया गया. इसके विरोध में हरीश दुर्गापाल निर्दलीय चुनाव लड रहे हैं.

प्रत्याशी

देवप्रयाग विधान सभा से पूर्व मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी को टिकट नहीं मिला तो वो भी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी जगह सूरवीर सिंह साजवान को कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया है.

उसी तरह दोईवाला विधान सभा सीट से हीरा सिंह बिष्ट को कांग्रेस का टिकट दिए जाने के विरोध में कांग्रेस के ही एसपी सिंह निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं.

स्थानीय पत्रकार दीप भट्ट का कहना है कि ये बाग़ी उम्मीदवार कांग्रेस के लिए कुछ सीटों पर भारी समस्या खड़ी कर सकते हैं. ग़ौरतलब है कि 2007 के चुनाव में भी कांग्रेस को बाग़ी उम्मीदवारों की वजह से कई सीटें गंवानी पड़ीं थीं.

लेकिन केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री और उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत इससे इनकार करते हैं.

उनका कहना है कि इस बार माहौल अच्छा है इसलिए बाग़ी शब्द ज़्यादा दुख नहीं देता है, 2007 में माहौल अच्छा नहीं था इसलिए उस समय बाग़ी उम्मीदवारों ने हमें बड़ी तकलीफ़ दी थी. उन्होंने यक़ीन दिलाया कि बाग़ी उम्मीदवार ज़्यादा नहीं जीतेंगें.

हरीश रावत ही हरीद्वार से समाजवादी पार्टी के वर्षों पुराने नेता अमरीश कुमार को कांग्रेस में लेकर आए थे लेकिन उन्हें कांग्रेस का टिकट नहीं मिल सका और वो पार्टी छोड़कर चले गए.

इनकार

हरीश रावत इसको नकारते हुए कहते हैं कि अमरीश कुमार को टिकट देने का वादा कांग्रेस पार्टी ने कभी नहीं किया था. लेकिन पूर्व मंत्री और राज्य में एनडी तिवारी के बाद शायद सबसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता इंदिरा ह्रदयेश का मानना कुछ और है.

उनके मुताबिक़ बाग़ी उम्मीदवारों से नुक़सान होता है. बाग़ी उम्मीदवारों को मनाने का काम करना चाहिए था लेकिन ये नहीं हो सका.

नैनीताल ज़िले की हल्द्वानी विधान सभा सीट से चुनाव लड़ रही इंदिरा ह्रदयेश सीधे तौर पर किसी बाग़ी उम्मीदवार से तो नहीं जूझ रही हैं, लेकिन इस समय भारतीय जनता पार्टी से उनके ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहीं रेणु अधिकारी पुरानी कांग्रेसी हैं और नगर पालिका की अध्यक्ष रह चुकी हैं.

वो कांग्रेस से टिकट मांग रही थीं लेकिन नहीं मिलने पर वो भाजपा में शामिल हो गईं और उन्हें टिकट भी मिल गया. इस तरह कांग्रेस के नेता चाहे जितना भी इनकार करते रहें कि बाग़ी उम्मीदवारों से पार्टी को कोई नुक़सान नहीं होगा, चुनावों पर नज़र रखने वाले लोगों का मानना है कि कांग्रेस को इसका घाटा हो सकता है.

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