उत्सव तो नहीं मगर उत्साह अब भी है

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Image caption अस्सी और नब्बे के दशक में प्रदेश में राजनीतिक पारा काफ़ी गर्म था

अस्सी के दशक के अंत और नब्बे की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में जो लोग होश सँभाल रहे थे उनके लिए राजनीति से अछूता रहना शायद ही संभव था.

ये राज्य हमेशा से ही राजनीतिक रूप से सक्रिय रहा है. शायद इसमें एक बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि गाँधी-नेहरू परिवार के चुनाव क्षेत्र इसी प्रदेश में रहे और जब वे प्रधानमंत्री नहीं रहे तो भी अधिकतर प्रधानमंत्री इसी प्रदेश से बने.

राजनीतिक फ़ैसलों की कड़ी प्रतिक्रिया के चलते इस राज्य के युवाओं का राजनीति की ओर सहज आकर्षण होना स्वाभाविक भी था.

लखनऊ के बेग़म हज़रत महल पार्क में 1984 में विश्व हिंदू परिषद की रैली से अयोध्या आंदोलन को मिली नई तेज़ी, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफ़ोर्स के मुद्दे के साथ इलाहाबाद से 1988 में उपचुनाव जीतना, 1989 में जनता दल के नेतृत्त्व में जनमोर्चा की सरकार का गठन, उसी सरकार का आरक्षण लागू करने का फ़ैसला और उसके विरोध में आत्महत्याओं की आग, लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा, अयोध्या में कारसेवकों पर मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान हुई गोलीबारी....

अस्सी के दशक की ये घटनाएँ इतनी बड़ी और देश की राजनीति को झकझोरने देने वाली थीं कि उसे आप नज़रंदाज़ कर ही नहीं सकते थे.

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Image caption छह दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना ने देश की राजनीति को प्रभावित किया

अख़बारों के पन्ने के पन्ने इन ख़बरों से रंगे रहते थे. उससे पहले तक मैं अख़बार पीछे से पढ़ना शुरू करता था क्योंकि पीछे का पन्ना खेलों का होता था.

मगर इन सभी घटनाओं ने मुझे पीछे के पन्नों से हटाकर अख़बार को पहले पन्ने से पढ़ना सिखाया. इससे पहले तक दूरदर्शन के जो राष्ट्रीय समाचार और चर्चाएँ नीरस लगती थीं उनमें रस आ गया.

बाबरी मस्जिद प्रकरण

चुनाव के बाद मतगणना के दौरान दूरदर्शन पर प्रणॉय रॉय और विनोद दुआ की जोड़ी के साथ दिन बीत जाता था. वो किसी भी तरह मेरे लिए फ़िल्म स्टार से कम नहीं रह गए थे.

नब्बे का दशक शुरू हुआ तो भारतीय जनता पार्टी राज्य की सबसे प्रभावशाली पार्टी थी. समाजवादी पार्टी दूसरे नंबर पर थी और 1990 में मुलायम सिंह यादव सरकार को समर्थन देने के राजीव गाँधी के फ़ैसले ने कांग्रेस को हाशिए पर ला खड़ा किया था.

छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. उस समय चौबीस घंटे के चैनल नहीं थे इसलिए लोग जगह-जगह झुंड बनाए खड़े थे.

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Image caption वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार भाजपा के समर्थन वापसी की भेंट चढ़ गई

एक-एक कर मस्जिद के गुंबदों के गिरने की ख़बर आ रही थी और शाम के अख़बार ‘प्रतिदिन’ ने भी ये ख़बर जारी कर दी कि कारसेवकों ने मस्जिद गिरा दी है.

पूरा प्रदेश तनावग्रस्त था. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकारें बर्ख़ास्त हो चुकी थीं. कर्फ़्यू लग चुका था और दंगों का डर लग रहा था. दंगों की पहली दहशत का अंदाज़ा तभी हुआ था.

इधर नब्बे के दशक में ही बहुजन समाज पार्टी को कांशीराम प्रासंगिक बनाने की कोशिश कर रहे थे और उसी बीच एक दिन अख़बार में बयान पढ़ा- ‘अगर हम हरिजन की औलाद हैं तो क्या गांधी शैतान की औलाद थे.’ बापू को जिस सम्मान की नज़र से देखा जाता है वहाँ उनके लिए ये शब्द अचानक काफ़ी झटके जैसे थे.

मगर उस बयान ने प्रदेश की राजनीति में मायावती नाम के सितारे को काफ़ी चमक दे दी थी.

पहला मतदान

उसके बाद समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भाजपा किसी न किसी जुगाड़ से सत्ता की गोटियाँ सेट करते रहे तो कांग्रेस अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रही.

Image caption बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने प्रदेश में पार्टी को प्रासंगिक बनाया

प्रदेश से अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में एक और प्रधानमंत्री बनने से लेकर कल्याण सिंह के ‘जंबो मंत्रिमंडल’ को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता था.

मुझे याद है जब 1998 में मैंने पहली बार मतदान किया था. उंगली पर लगी स्याही किसी स्मृति चिह्न से कम नहीं थी. मैं चाहता था कि वो काफ़ी समय तक उंगली पर रहे जिससे मैं दिखा सकूँ कि मैंने भी मतदान किया है.

मतदान करने में गर्व की अनुभूति इसलिए भी थी कि सरकार चुनने में मेरा भी एक वोट है. अब तक मैं जिन घटनाक्रमों का गवाह था उसकी आगे की दिशा तय करने वाली सरकार चुनने में मेरी भी भूमिका होगी- ये रोमांचक था.

ये सोच कभी आई नहीं कि एक मैंने वोट नहीं डाला तो क्या असर होगा. मुझे पत्रकारिता की ओर मोड़ने में भी शायद उस दौर का अहम योगदान है.

उसके बाद से आज तक मैं अगर भारत में था तो मैंने मतदान ज़रूर किया है फिर चाहे उसके लिए सुबह लखनऊ पहुँचकर मतदान करके रात की ट्रेन लेकर दिल्ली वापस क्यों न आना पड़ा हो.

विदेश में अनुभव

कुल मिलाकर इन घटनाक्रमों ने राजनीति की पैठ मुझमें इतनी गहरी कर दी कि जब देश से बाहर ब्रिटेन में रहकर बीबीसी में काम करने का मौक़ा मिला तो वहाँ लेबर पार्टी और कंज़र्वेटिव पार्टी की राजनीति ने भी उतना ही आकर्षित किया.

Image caption पीटर स्नो, डेविड डिंबलबी (मध्य) और जेरेमी पैक्सैन की चुनाव से जुड़ी बीबीसी पर प्रस्तुति काफ़ी रोचक लगी

टोनी ब्लेयर के भाषण, गॉर्डन ब्राउन के साथ उनकी तक़रार की ख़बरों और मौजूदा ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पार्टी अध्यक्ष पद सँभालने पर हमेशा नज़र रही.

ब्रितानी चुनाव के नतीजे मतदान ख़त्म होने के कुछ ही घंटों बाद आने शुरू हो जाते हैं, देर रात तक जगकर वो नतीजे भी देखे और भले ही सीटों का या प्रभाव का अंदाज़ा उस तरह नहीं था मगर दोनों पार्टियों की खींचतान काफ़ी आकर्षक थी.

विनोद दुआ और प्रणॉय रॉय की जगह डेविड डिंबलबी, जेरेमी पैक्समैन और पीटर स्नो ले चुके थे.

इस बार राज्य के चुनाव में सबकी नज़रें इस बात पर लगी हैं कि क्या मायावती करिश्मा दोहरा पाएँगी, क्या राहुल गाँधी की मेहनत रंग लाएगी, क्या समाजवादी पार्टी सत्ता विरोधी लहर भुना पाएगी और क्या भाजपा स्थिति सुधार पाएगी.

इन सवालों के बीच मेरी नज़र लखनऊ में 19 फ़रवरी को होने वाले मतदान पर है जहाँ एक बार फिर मैं अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकूँगा.

चुनाव में अब वो उत्सव सा मज़ा तो नहीं रह गया है मगर उसके लिए मेरा उत्साह पहली बार के उत्साह से किसी भी तरह कम नहीं है.

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