पंजाब के चुनावी दंगल में कौन ज़्यादा तगड़ा?

पंजाब के 117 विधानसभा सीटों पर 30 जनवरी को होने वाले मतदान में कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है.

अभी तक पंजाब में कोई भी सत्ताधारी पार्टी चुनाव नही जीत सकी है, हालांकि प्रजातान्त्रिक चुनाव में ऐसे किसी रूझान पर भरोसा करना ठीक नही होगा.

कांग्रेस के प्रमुख चुनावी मुद्दें भ्रष्टाचार और शिरोमणी अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन वाली सरकार के शासन की कमियां है.

कांग्रेस का मानना है कि पंजाब में ट्रांसपोर्ट और शराब के व्यवसाय में सत्ताधारी बादल परिवार का लगभग एकाधिकार होने, अवैध बालू खनन और भ्रष्टाचार में उसके कथित तौर पर संलिप्त होने के चलते ये मुद्दें काफी अहम है.

साख की चाह

उधर सत्ताधारी शिरोमणी अकाली दल आर्थिक विकास के मुद्दे को आगे रखकर अपनी उम्मीदवारी पेश कर रही है.

इसके साथ ही वो जाट सिख समुदाय के अलावा भी अपनी साख बनाने की कोशिश कर रही है, इसमे दलित से सिख बने वोटर भी शामिल है.

शिरोमणी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार ने काम करने का अधिकार जैसे क़ानून बनाए है. इसके साथ ही राज्य की अपनी खाद्य सुरक्षा योजना, ''आटा दाल'' स्कीम भी लायी गई, जिसके अंतरगत आर्थिक रूप से कमज़ोर श्रेणी के लोगों को मुफ्त आटा, दाल दिया जाना है.

पारंपरिक तौर पर चुनावों में पंजाब में कांग्रेस और शिरोमणी अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के बीच सीधी भिड़ंत होती रही है. हालांकि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत बादल के नेतृत्व वाली पंजाब पीप्ल्स पार्टी (पीपीपी) का अस्तित्व में आना चुनावी समीकरणों में बदलाव कर सकता है.

तीन हिस्से

चुनावी विश्लेषण के लिए पंजाब को आम तौर पर तीन हिस्सों में बांटकर देखा जाता है:

मालवा: सतलुज के दक्षिण में स्थित ये इलाक़ा कपास की खेती करने वाले अमीर जाट सिख बहुल है, जिसमें सबसे ज़्यादा 69 विधानसभा सीटें है.

दोआबा: सतलुज और व्यास नदियों के बीच गेहूं की पैदावार वाले इस इलाक़े में कुल 23 विधानसभा सीटें है.

माझा: पाकिस्तान की सीमा से सटे व्यास नदी के उत्तर में स्थित इस इलाक़े में 25 विधानसभा सीटें है.

साल 2007 से पहले के चुनाव पैटर्न में देखा गया कि जिस भी दल को बहुमत मिला वो सभी तीन इलाक़ों में अपने प्रतिद्वंदियों से आगे रही.

हालांकि साल 2007 में कांग्रेस मालवा के 37 सीटों पर जीतकर शिरोमणी अकाली दल से आगे निकल गयी, लेकिन दोआबा और माझा में उसे हार का सामना करना पड़ा था.

माना जाता है कि मालवा में कांग्रेस की जीत का कारण डेरा सच्चा सौदा का अपने सदस्यों को जारी किया गया एक फ़रमान है जिसमें कांग्रेस को वोट करने के लिए कहा गया था. इसके अलावा पार्टी का खाद्यान्न जुटाने की नीतियों और उच्च दर्जे के कपास बीजों को इस्तेमाल में लाए जाने से भी कांग्रेस को फायदा पहुँचा था.

हालांकि साल 2012 में कांग्रेस के पास ऐसी कोई बढ़त नहीं है.

लिहाज़ा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मालवा के मतदान में कांग्रेस या शिरोमणी अकाली दल में से किसी एक को निर्णायक फ़ायदा नही पहुंचेगा.

इस बार डेरा सच्चा सौदा किसी दल के समर्थन में फ़रमान जारी करने के मूड में नहीं दिख रहा है.

ऊपर से चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन पर भी कांग्रेस के भीतर असंतोष का माहौल है.

Image caption पंजाब की ये पीपुल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब 10 महीने पहले ही अस्तित्व में आई है

माना जा रहा है कि मनप्रीत बादल की पार्टी पीपीपी की नेतृत्व वाले सांझा मोर्चा यानी तीसरा मोर्चा चुनावी खेल में खलल डाल सकता है.

कहा ये भी जा रहा है कि सरकार के खिलाफ़ बने माहौल से फ़ायदा उठाते हुए कांग्रेस दोआबा और माझी में पहले से बेहतर प्रदर्शन करेगी.

दोआबा की बड़ी दलित बहुल जनसंख्या कांग्रेस के पक्ष में मतदान कर सकती है, हालांकि पीपीपी कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है.

माझा में साल 2007 में बुरे प्रदर्शन के बाद कांग्रेस इलाक़े पर विशेष ध्यान दे रहा है. इलाक़े के तीन सबसे महत्वपूर्ण जिले अमृतसर, तरण तारण और गुरदासपुर में चुनाव प्रचार के लिए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने अपनी ताकत झोंक दी है.

अमृतसर-व्यास इलाक़े में धार्मिक समुदाय राधा स्वामी सत्संग काफी प्रभावशाली मानी जाती है. ये समुदाय आम तौर पर किसी भी राजनीतिक दल का खुलकर समर्थन नही करता है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि समुदाय अकाली दल को मौन समर्थन दे सकता है.

दलित मतदाता

पंजाब में चुनावी नतीजा दलित मतदाताओं पर काफी निर्भर करेगा.

Image caption राज्य में आम तौर पर दलितों ने कांग्रेस का समर्थन किया है लेकिन साल 2007 में हुए चुनाव में तस्वीर कुछ उलट थी

राज्य में आम तौर पर दलितों ने कांग्रेस का समर्थन किया है, लेकिन साल 2007 में पंजाब के तीनो इलाक़ों में दलित मतदाताओं का रूझान अलग सा रहा है. मालवा में दलितों ने कांग्रेस के लिए वोट किया और जोआबा में अकाली दल के लिए, जबकि माझा में दलित वोट कांग्रेस और अकाली दल के बीच बंट गया था.

उम्मीद की जा रही है कि राज्य में बेहद सामान्य प्रदर्शन के लिए भारतीय जनता पार्टी को नुकसान झेलना पड़ सकता है. भ्रष्टाचार के आरोप में भाजपा के तीन मंत्रियों को शिरोमणी अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार से निष्कासित कर दिया गया था.

हालांकि नज़रें मनप्रीत बादल की पीपीपी पर टिकी हैं. अगर पीपीपी दहाई के अंक हासिल कर पाएं तो फिर ये एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी.

चुनाव में अनिश्चितता के बीच माना जा रहा है कि इस बार साल 2007 से ज़्यादा मतदान होगा.

साल 2007 में पंजाब में 76 फ़ीसदी मतदान हुआ था.

30 जनवरी में होने वाले चुनाव में मतदाताओं की रुचि भी महत्वपूर्व रहेगी.

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