'अभी तो मैं जवान हूँ'

 शनिवार, 28 जनवरी, 2012 को 03:36 IST तक के समाचार
एनडी तिवारी

एनडी तिवारी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में कांग्रेस प्रमुख स्तंभों में से एक रहे हैं

उत्तर प्रदेश और फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके नारायणदत्त तिवारी का कुर्सी से मोह अभी भी शायद ख़त्म नहीं हुआ है.

तभी तो 87 साल के नारायणदत्त तिवारी ने उत्तराखंड में चुनाव प्रचार के दौरान ये कह कर सबको चौंका दिया कि अगर कांग्रेस विजयी होती है और पार्टी आलाकमान चाहेगी तो वो मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हैं.

बस उन्होंने उत्तराखंड की जनता पर शायद इतना एहसान किया कि सिर्फ़ दो-तीन साल के लिए मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हुए. इसकी वजह पूछे जाने पर कहा - '87 वर्ष का हो चुका हूं. ज़िंदगी की गाड़ी पर कब ब्रेक लग जाए कुछ कहा नहीं जा सकता.'

उनके इस बयान को भले ही आलाकमान ने गंभीरता से ना लिया हो लेकिन राज्य के कई नेता कह रहें हैं कि वो भले ही ख़ुद मुख्यमंत्री ना बनें लेकिन अभी भी राज्य की राजनीति में उनका क़द इतना ज़रूर है कि वो खीर में निंबू तो निचोड़ ही सकते हैं.

'जैसा देश वैसा भेस'

केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री और उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत विधान सभा चुनाव में ख़ूब मेहनत कर रहें हैं. रात दिन प्रचार के काम में जुटे हैं. लेकिन हर चुनावी रैली या जनसभा में आए लोगों का ख़ास ध्यान रखकर भाषण देते हैं.

नैनीताल ज़िले के हलद्वानी विधान सभा क्षेत्र में एक मुस्लिम बाहुल्य इलाक़े में जनसभा करते हुए उन्होंन अपनी भाषा का ख़ास ख़्याल रखा. थोड़ी देर के लिए तो मैं भी चकरा गया. शायद मुसलमानों को रिझाने के लिए एक दम ख़ालिस उर्दू का प्रयोग.

मैं उनका वोटर तो नहीं लेकिन उनकी उर्दू सुनकर तो मुझे भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि उन्हें इस ज़ुबान पर इतनी महारत हासिल है.

ज़ाहिर है जब ज़बान उर्दू थी तो मुद्दे भी मिलते-जुलते ही थे - बाबरी मस्जिद का गिराया जाना, गुजरात के दंगों के संदर्भ में मोदी की कथित भूमिका वगैरह-वग़ैरह. हां एक बात और, वो वहां मौजूद ज़्यादातर मुस्लिम मतदाताओं को ये बताना भी नहीं भूले कि लोकपाल समिति में अल्पसंख्यकों के आरक्षण का कैसे भाजपा ने विरोध किया.

मतदाता नहीं तो शपथ कैसी?

मतदाताओं को जागरूक बनाने के लिए 25 जनवरी को मतदाता दिवस बनाया गया.

इसके लिए बड़ी संख्या में मतदाताओं की ज़रूरत थी. अब इतनी संख्या में मतदाता एक साथ मिलें कहां.

किसी ने सुझाव दिया कि क्यों ना स्कूल कॉलेज का इस्तेमाल किया जाए. बस फिर क्या था, अभियान से जुड़े बाबू लोग निकल पड़े स्कूल-कॉलेजों में.

पहले तो अधिकारियों ने लंबे चौड़े भाषण दिए और फिर छात्र-छात्राओं को वोट डालने का संकल्प और शपथ दिलाई गई.

छात्र-छात्राओं ने शपथ तो ले ली लेकिन जब चुनाव अधिकारी चले गए तो सारी प्रक्रिया का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहने लगे हमारा तो वोटर लिस्ट में नाम ही नहीं है, फिर काहे का मतदान और कैसी शपथ?

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