'होना कुछ नहीं, लेकिन वोट तो डालना ही है'

मतदाता
Image caption कई मतदाता काफ़ी निराश हैं

उत्तराखंड के नैनीताल शहर के रहने वाले 20 वर्षीय दीपक मथेला ने उत्तराखंड विधान सभा के लिए होने वाले चुनावों में पहली बार वोट डाला.

नैनीताल स्टेडियम के पास बने पोलिंग बूथ पर अपना वोट डालने के बाद बीबीसी से बातचीत के दौरान दीपक ने कहा, "होना तो कुछ नहीं है लेकिन वोट डालना मेरा हक़ है इसलिए वोट डालने आया हूं."

दीपक के अनुसार उत्तराखंड में बेरोज़ग़ारी बढ़ती जा रही है, सड़कों का हाल बहुत बुरा है, गांवों में पानी और बिजली की सुविधाएं नहीं हैं लेकिन वो इस उम्मीद पर वोट डालने आए कि शायद सरकार कुछ करे.

दीपक के साथ ही पहली बार वोट डालने आए 19 साल के ख़लील अहमद का भी मानना है कि सरकारें करती तो कुछ नहीं हैं, लेकिन नागरिक होने के नाते वोट डालना उनका अधिकार है, इसलिए वो वोट डालने आए हैं.

कभी उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे उत्तराखंड का एक अलग राज्य के रूप में गठन एक लंबे आंदोलन और 43 लोगों की जान गंवाने के बाद वर्ष 2000 में हुआ था.

क्या मिला

तब से आज तक यहां दो बार लोक सभा और दो बार विधान सभा के चुनाव हो चुके हैं. मौजूदा चुनाव उत्तराखंड विधान सभा के लिए होने वाला तीसरा चुनाव है.

इस मौक़े पर अगर इस बात की समीक्षा की जाए कि राज्य के गठन के 11-12 साल बाद उत्तराखंड की जनता को क्या मिला, क्या वे सपने पूरे हुए जिन सपनों के साथ यहां के लोगों ने क़ुर्बानी देकर अलग राज्य के गठन की मांग की थी.

उत्तराखंड राज्य के गठन में सबसे अधिक भूमिका निभाने वाली पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल के युवा नेता और दो बार विधायक रह चुके पुष्पेश त्रिपाठी का कहना है कि वर्ष 1999-2000 में उत्तराखंड का बजट मात्र 900 करोड़ रुपए था, जो 2011-12 में बढ़कर नौ हज़ार करोड़ रुपए हो गया है, विधायकों की संख्या 19 से बढ़कर 70 हो गई है, पुलिस और दूसरे विभागों में लोगों को नौकरियां भी मिली हैं.

पुष्पेश के अनुसार अगर इस हिसाब से देखा जाए तो यक़ीनन उत्तराखंड राज्य ने काफ़ी तरक़्क़ी की है, लेकिन उनका ख़ुद मानना है कि जिन सपनों के साथ उत्तराखंड का गठन किया गया था वो शायद अभी तक पूरा नहीं हो सका है.

आरोप-प्रत्यारोप

वहीं केंद्रीय मंत्री और उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत का कहना है कि जिन सपनों के साथ राज्य का गठन हुआ था उनको पूरा करने के लिए 2002 की कांग्रेस सरकार ने कई अहम क़दम उठाए थे लेकिन 2007 में उनकी पार्टी की हार के बाद जब भाजपा सत्ता में आई तो हालात ख़राब होने लगे.

हरीश रावत का कहना था, "हमारी सरकार के समय में बहुत तेज़ी से राज्य का औद्योगीकरण हुआ और तीस हज़ार करोड़ रूपए की लागत के उद्योग यहां आए, हमारी विकास दर बहुत तेज़ी से आगे बढ़ी, रोज़गार के साधन बढ़े, विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में हमने कुछ पहल की, जिसका नतीजा बड़ा सकारात्मक रहा, आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी हमारी सरकार ने बहुत ध्यान दिया, कुल मिलाकर हमारी दिशा ठीक थी लेकिन भाजपा के समय में पूरी चीज़े गड़बड़ा गईं, विकास को तो उन्होंने पूरी तरह छोड़ दिया."

लेकिन भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के इन तमाम आरोपों को ख़ारिज करते हुए 2007 से लेकर अब तक अपने पाँच साल के कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों की एक लंबी फ़ेहरिस्त गिनाती है.

पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक 2010 में सफल कुंभ मेला आयोजन, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की स्थापना, 108 एम्बुलेंस सेवा, अटल ग्राम योजना जैसे कामों को अपनी उपलब्धि के रूप में गिनाते हैं.

अक्तूबर 2011 में बीसी खंडूरी दोबारा मुख्यमंत्री बने. इस चुनाव में लोकपाल विधेयक और सिटिजन चार्टर को अपनी विशेष उपलब्धि बताते हुए उन्होंने लोगों से वोट मांगे.

भाजपा भी खंडूरी है ज़रूरी के नारे के साथ ही चुनावी मैदान में उतरी है.

हालाँकि उत्तराखंड में जन आंदोलन से जुड़े लोगों का भी मानना यही है कि सपने पूरे होना तो दूर हालात दिन ब दिन ख़राब होते जा रहे हैं.

नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह कहते हैं कि उत्तराखंड तो ठेकेदारखंड बन गया है.

राजीव कहते हैं, "आंदोलनकारियों ने जो सपने देखे थे वे तो कहीं भी पूरे होते नहीं दिख रहे. पलायन बढ़ रहा है, रोज़गार के अवसर नहीं और जो सबसे बड़ा सपना था कि किसी दूरस्थ गांव में एक आदमी को इतनी बुनियादी सुविधाएं मिल सकें, ताकि ज़िंदगी का संघर्ष थोड़ा कम हो और उसे रोज़ी-रोटी के लिए घर-बार छोड़कर कहीं जाना ना पड़े वो सपना तो बिल्कुल ही पूरा नहीं हो सका."

उत्तराखंड में जन आंदोलनों में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के शमशेर सिंह बिष्ट कहते हैं कि इन 11-12 वर्षों में तो राज्य सरकारों ने एक भी ऐसा काम नहीं किया जिससे स्थानीय लोगों को रोज़गार मिल सके.

उनके अनुसार जंगल, पानी और पहाड़ों को बचाने के मुद्दे बिल्कुल ग़ायब हैं. जन आंदोलन से जुड़े एक और कार्यकर्ता पूरन चंद तिवारी भी कुछ ज़्यादा आशान्वित नहीं दिखते.

वे कहते हैं, "उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या पलायन है. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के लिए लोग पलायन कर रहे हैं. लगभग 60 प्रतिशत उत्तराखंड मानवविहीन होने जा रहा है और बड़े-बड़े भू-माफ़िया उत्तराखंड को लूट रहे हैं."

पलायन

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Image caption भाजपा नेता अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में लगे हुए हैं

एक और सामाजिक कार्यकर्ता दया कृष्ण कांडपाल कहते हैं, "उत्तराखंड का राजनैतिक नेतृत्व इन 10 वर्षों में उत्तराखंड से पलायन कर चुका है, जिसके कारण पहाड़ की आवाज़ विधान सभा में और प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के एजेंडे से ग़ायब हो चुकी है."

कांडपाल के अनुसार पर्वतीय जनपदों से युवा हताश होकर बड़ी मात्रा में पलायन कर रहे हैं. कांडपाल के मुताबिक़ आधिकारिक तौर पर अल्मोड़ा ज़िले से 11 हज़ार और पौड़ी ज़िले से 14 हज़ार युवा बाहर जा चुके हैं.

राज्य के पर्वतीय ज़िलों में आधारभूत ढांचों की ख़स्ताहाली का ज़िक्र करते हुए शमशेर सिंह बिष्ट कहते हैं, "शिक्षा की हालत ये है कि 40 ऐसे डिग्री कॉलेज हैं, जिसमें प्रिंसिपल और चपरासी के अलावा कोई नहीं हैं. अस्पतालों की स्थिति ये है कि अलमोड़ा स्थित कुमाऊं के बेस अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं, पिथौरागढ़ में 75 डॉक्टरों की जगह पर केवल 24 डॉक्टर हैं, वहां 24 विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए वहां केवल सात हैं, 24 महिला डॉक्टर होनी चाहिए थी लेकिन केवल नौ हैं और पिछले ग्यारह वर्षों में जितने नेता और नौकरशाह बने सभी ने देहरादून में अपने घर बना लिए हैं."

शमशेर सिंह बिष्ट कहते हैं कि समय आ गया है कि जन आंदोलन फिर से शुरू किया जाए, क्योंकि उत्तराखंड का गठन ही जन आंदोलन ने किया है किसी राजनैतिक पार्टी ने नहीं किया.

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