बुंदेलखंड-आख़िर किस करवट बैठेगा ऊंट

बुंदेलखंड
Image caption बुंदेलखंड में हो रहे इस बार के चुनावों में प्रचार अभियान बग़ैर किसी शोर-शराबे के हो रहा है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कई मायनों में अहम हैं तभी यहां के नेता भी अपना सब कुछ दांव पर लगाकर चुनावी मैदान में कूद चुके हैं. इस बार का चुनाव एक तरह से कई बड़े पार्टियों के राजकुमारों के लिए सेमीफ़ाइनल जैसा है.

राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी हों या समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव या फिर कांग्रेस से राहुल गांधी, ये सभी जी-तोड़ कोशिश में लगे हैं लेकिन पूर्वी यूपी से होते-होते जब इन राजकुमारों का कारवां जब बुंदेलखंड पहुंचता है तो उनके सामने एक साथ कई चुनौतियां खड़ी हो जाती है.

बुंदेलखंड के दो विधानसभा क्षेत्रों माणिकपुर-मऊ और बांदा-चित्रकूट का दौरा कर ये जानने की कोशिश की गई कि आख़िर क्यों ये इलाक़ा उत्तरप्रदेश की राजनीति में इतना महत्वपूर्ण है और यहां के असल मुद्दे क्या हैं.

बुंदेलखंड के चुनावी माहौल के बारे में जानें..<span >

<span >चुनावी माहौल

बुंदेलखंड से पिछले दस सालों में ग्यारह मंत्री राज्य मंत्रिमंडल में रहे हैं, मुलायम सिंह यादव के समय छह और माया सरकार में पांच लेकिन इनमें से ज़्यादातर को भ्रष्टाचार के मामलों में अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है.

मंत्रियों की लंबी कतार भी इस इलाक़े की तस्वीर बदल नहीं पायी है, हां इस दरम्यान 1100 से ज्य़ादा किसानों की मौत ज़रूर हो गई है.

बदौसा के किसान रामसजीवन कहते हैं ''15-16 बीघा खेत होने के बावजूद पैदावार इतनी होती नहीं कि सालभर पेट भरने लायक अनाज पैदा कर सकें, सूखे ने कमर तोड़ दी है, जो भी जनप्रतिनिधि आता है बस अपना पेट भरकर चला जाता है, ग़रीब की ना कहीं सुनवाई होती है ना ही कोई उसकी रक्षा करता है.''

माणिकपुर-मऊ की आदिवासी बस्ती'मिथला गांव' के निवासी राजू कोल कहते हैं,''उनके यहां नेता खड़जों पर उछल-उछल कर आते तो हैं लेकिन वोट मिलने के बाद कोई उनपर मौरम तक नहीं बिछवाता, अस्पताल इतनी दूर है कि जच्चा औरतें के वहां पहुंचते-पहुंचते रास्ते में ही डिलीवरी हो जाती है पर किसी पार्टी ने अब तक इसपर ध्यान नहीं दिया है, इसलिए इस बार हम कांग्रेस को वोट देंगे.''

मिथला गांव की पूरी आबादी कोल जाति के आदिवासियों की है, जब मैंने उनके बच्चों से पूछा कि स्कूल क्यों नहीं जाते तो एक बच्ची सुषमा का कहना था,''हमें नहाने के लिए काफ़ी दूर जाना पड़ता है और वहां से लौटते हुए काफ़ी देर हो जाती है, स्कूल भी काफ़ी दूर है अगर साइकिल मिल जाए तो जा पाएंगे, घर पर भी पढ़ाई के लिए बिजली नहीं होती.''

बांदा में कॉलेज छात्र अनवर कहते हैं कि उनके लिए शिक्षा बहुत बड़ा मुद्दा है, नेताओं ने स्कूल-कॉलेज बनवाने के नाम पर अपनी जेबें भरी है, वो अपना वोट बर्बाद नहीं करना चाहते इसलिए वोट तो डालेंगे लेकिन ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसको?

डाकुओं का साम्राज्य

बुंदेलखंड का इतिहास यहां के डाकू गुटों की चर्चा के बगै़र अधूरा है, ऐसा कहा जाता है कि यहां के डाकूओं और नेताओं के बीच एक क़िस्म का समझौता था जिस कारण स्थानीय लोगों को उनके आदेश के अनुसार वोट डालना पड़ता था. इसलिए जब मैंने कुछ लोगों से पूछा कि क्या वे इन चुनावों में भी वो किसी तरह के दबाव में है?

तो इस बारे में बांदा निवासी अरुण दीक्षित का कहना है,''इस बार का माहौल बिल्कुल अलग है पहले इलाक़े के डाकू डर का माहौल पैदा कर वोटबैंक को पलट दिया करते थे, इस बार ऐसा नहीं है लोग भयमुक्त तो हैं ही कई राजनैतिक दलों द्वारा मतदाताओं को जागरूक करने की जो मुहीम चलाई गई थी उसका भी पूरा असर है.''

बदौसा के इस्माइल का कहना था,''पहले के मुकाबले इस बार का चुनाव काफ़ी शांत माहौल में हो रहा है, चुनाव आयोग की सख्त़ी के कारण ना तो हवा-हवाई प्रचार हो रहा है ना ही पैसों या बंदूक का बोलबाला है, मतदाता अपने विवेक का इस्तेमाल कर रहे हैं.''

यहां के चुनावी माहौल और नज़दीक से समझने के लिए मैंने स्थानीय पत्रकार संजय सिंह से उनके आकलन के बारे में पूछा, उनके अनुसार''इन चुनावों में नए और पुराने का समावेश है, स्थानीय मुद्दे, विकास और जाति के आधार पर मतदान तो हावी रहेगा ही लेकिन चुनाव आयोग की सख्त़ी के कारण एक ऊहापोह की स्थिती बनी हुई है, मतदाता अजमंजस में हैं और प्रतिनिधि जनता तक पहुंच नहीं पा रहे हैं, जिस कारण चुनाव पूरी तरह से 'तन' नहीं पा रहा है.''

'राहुल फैक्टर' कितना असरदार?

बुंदेलखंड का ये चुनाव राहुल गांधी के लिए भी एक परीक्षा है, बुंदेलखंड के विकास के लिए उन्होंने स्पेशल पैकेज भी दिलवाया था और उनकी चुनावी सभाओं में भीड़ भी जुट रही है तो मैंने पूछा कि, क्या राहुल फैक्टर काम कर रहा है?

बांदा निवासी ओम गुप्ता कहते हैं,''राहुल गांधी यहां के लोगों के लिए किसी भगवान की तरह हैं, जिनके दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है लेकिन इसमें संदेह है कि ये भीड़ वोट में भी तब्दील हो सके, हां इससे कांग्रेस के वोट बैंक में ज़रूर इज़ाफ़ा होगा, लेकिन मायावती के मुक़ाबले राहुल कहीं नहीं हैं.''

लोगों की बातचीत से ये बात साफ़ समझ में आती है कि लोग राहुल गांधी के नाम से चुनावी रैलियों में खिचें तो ज़रूर आते हैं, लेकिन अब भी उन्हें अपना नेता नहीं मानते उनके लिए राहुल अब भी 'दिल्ली वाले नेता' हैं.

Image caption बुंदेलखंड के लोगों की माने तो इन चुनावों में वे पहली बार बग़ैर किसी दबाव के वोट डाल रहे हैं

जबकि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बाद भी जातीय समीकरण और अपने ठेठ अंदाज़ के कारण मायावती और उमा भारती जैसे नेताओं को बुंदलखंड के लोग ज्य़ादा आसानी से स्वीकार कर रहे हैं, उनके लिए ये दोनों नेता उनके 'बीच' से निकले हुए नेता हैं.

झांसी के धर्मेंद्र साहू के मुताबिक,'' राहुल भले ही राष्ट्रीय स्तर पर बड़े नेता के तौर पर उभर रहे हों लेकिन बुंदेलखंड के लोगों के बीच पैठ बना पाने में वो फिलहाल सफल नहीं हुए हैं. यहां के लोग सिर्फ़ विशेष पैकेज से खुश नहीं बल्कि उसका क्रियान्वयन भी चाहते हैं.''

इसके अलावा लोगों का मानना है कि राहुल और कांग्रेस पार्टी ने अब तक यहां के लिए जितना भी काम किया है, उसमें उमा भारती की एंट्री ने कहीं ना कहीं सेंध मारने में सफलता हासिल की है और राहुल गांधी के लिए बुंदेलखंड का रास्ता फिलहाल इतना आसान नहीं है.

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