किताबों पर प्रतिबंध और राजनीति

तसलीमा नसरीन इमेज कॉपीरइट AP
Image caption तसलीमा नसरीन की 'द्विखंडितो किताब पर भारत में रोक लगाई गई है.

बुधवार को कोलकाता में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन की नई किताब के विमोचन का विरोध हुआ है लेकिन ढाका में एकुशे पुस्तक समारोह में उनकी किताब का निर्विरोध विमोचन किया गया.

तसलीमा नसरीन कोलकाता किताब मेले में 'निर्बासन' नामक अपनी जीवनी जारी करना चाहती थीं जिसमें उन्होंने वर्ष 2007-08 में कोलकाता से पलायन करने का ब्योरा दिया है.

लेकिन विरोध होने के कारण पुस्तक छापने वाले प्रकाशक को हॉल से बाहर ही किताब को जारी करना पड़ा. तसलीमा ने इसके लिए कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों को ज़िम्मेदार ठहराया था.

तसलीमा नसरीन ने अंग्रेजी समाचार पत्र दी हिंदू को दिए गए साक्षात्कार में कहा है,'' ये बहुत ही अच्छी ख़बर है कि मेरी किताब का बिना किसी विवाद के ढाका में विमोचन करने दिया गया. लेकिन ये भी एक अजीब बात है कि मुझे 18 साल पहले अपने लेखन की वजह से अपना ही देश छोड़ना पड़ा था और तब से मैं वापस नहीं लौट पाई हूं.''

दबाव

इस विषय पर 'नई दुनिया' के संपादक आलोक मेहता का कहना है,'' कोलकाता जैसे प्रगतिशील मेट्रोपोलिटन शहर में ऐसा होना निंदनीय है और सरकारों को कट्टरपंथी संगठनों के दबाव में न आकर इसे रोकने के लिए क़दम तलाशने चाहिए.''

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. अलग-अलग लेखकों की 17 से ज़्यादा किताबे है जिनपर प्रतिबंध लगाया जा चुका है.

पिछले महीने जनवरी के अंतिम हफ़्ते में जयपुर साहित्य सम्मेलन में भी जाने-माने लेखक सलमान रुशदी के आने और उनकी प्रतिबंधित किताब

'द सैटेनिक वर्सेस' के कुछ भाग पढ़कर सुनाने को लेकर कट्टरपंथी समुदाय ने काफ़ी हंगामा किया था.

पत्रकार आलोक मेहता कहते है,''सांप्रदायिक संगठनों चाहे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल या फिर इस्लामिक संगठन हो ये धर्म के नाम पर मुद्दा तो उठाते है लेकिन जनता में इनको समर्थन हासिल नहीं होता ऐसे में सरकारों को देखना चाहिए कि जिस लेखन से मासुमों के मारे जाने का ख़तरा न हो सरकार को इस तरह के प्रतिबंध नहीं लगाए जाने चाहिए.''

लेखक अशोक वाजपेयी भी कहते है कि प्रतिबंध लगाना क़ानून के अंतर्गत आता है इसलिए जायज़ तो है लेकिन वे इसे अनैतिक और अलोकतांत्रिक बताते है.

उनका कहना है कि लोगों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लेखक क्या लिख रहा है लेकिन सरकार इन छोटे-छोटे समुदाय के दबाव में आ जाती है.

वे कहते है, ''सरकार छोटे -छोट समुदाय की बात मानती है क्योंकि बड़ा समुदाय चुप रहता है.सरकार इनके सामने घुटने टेक देती है क्योंकि सरकार कमज़ोर हो रही है क्योंकि सरकारों ने व्यापक जनता की आवाज़ सुनने की बजाय थोडे-थोडे दबाव समुहों की बाते सुनना शुरु कर दिया है, चाहे वो नीति के निर्माण में हो चाहे किसी योजना के कार्यन्वन में हो और मीडिया के लोग हल्ला मचा दे तो सरकार को लगता है कि ये जनमत है.''

प्रतिबंध

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption द सैटेनिक वर्सेस पर ये रोक भारत के कस्टम्स एक्ट 1962 की धारा 11 के तहत लगाई गई.

भारत में कई किताबे है जिन पर प्रतिबंध लगाया गया है.

इसमें सलमान रुश्दी की 'द सैटेनिक वर्सेस' के अलावा बेहतरीन लेखन के लिए पुलिट्ज़र पुरस्कार से सम्मानित लेखक जोसेफ़ लेलिवेल्ड की किताब 'ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विद इंडिया' भी है.

इस किताब को गुजरात सरकार ने विकृत मानसिकता को बढ़ावा देने वाली बताकर उस पर रोक लगाई थी.

गुजरात सरकार ने भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह द्वारा लिखित मोहम्मद अली जिन्ना की जीवनी 'जिन्ना: इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेन्डेन्स' पर रोक लगाई थी लेकिन कुछ ही महीनों में इसे गुजरात हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया. हालांकि पार्टी ने जसवंत सिंह को विवाद की वजह से कुछ समय के लिए निष्कासित कर दिया था.

महाराष्ट्र सरकार ने अमरीकी लेखक जेम्स लेन की किताब, 'शिवाजी: हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया', पर रोक लगाई थी. लेकिन इसे चुनौती दी गई और पहले बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने ये रोक हटा दी.

पश्चिम बंगाल सरकार ने बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की किताब, 'द्विखंडितो', पर रोक लगाई थी. उनका आरोप था कि ये किताब लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है.

कालजयी मानी जाने वाली लेखक डीएच लॉरेन्स की किताब, 'लेडी चैटरलीज़ लवर' में कामोत्तेजक भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए भारत सरकार ने इस पर रोक लगाई थी.

संबंधित समाचार