सेनाध्यक्ष की उम्र: सुनवाई 10 तक टली

जनरल वीके सिंह इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption वीके सिंह कह रहे हैं कि वे अपने सम्मान के लिए अदालत गए हैं

सुप्रीम कोर्ट ने सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि के विवाद के मामले की सुनवाई को 10 फ़रवरी तक के लिए टाल दिया है.

कोर्ट ने सरकार की ओर से पेश हुए एटॉर्नी जनरल से कहा है कि वह सरकार का रुख़ स्पष्ट करें कि क्या वह अपना 30 दिसंबर का आदेश वापस लेने को तैयार हैं जिसमें उन्होंने जनरल सिंह की वैधानिक शिकायत को ख़ारिज कर दिया था.

जनरल सिंह ने 21 जुलाई, 2011 के आदेश के ख़िलाफ़ ये शिकायत की थी लेकिन इसे ख़ारिज करते हुए सरकार ने आदेश दिए थे कि सभी रिकॉर्ड में जनरल सिंह की जन्म की तारीख़ 10 मई 1950 दर्ज कर ली जाए.

अदालत ने सेना प्रमुख की वैधानिक शिकायत ख़ारिज करने की सरकार की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि इसी से मामले में कड़वाहट आई है.

इसके बाद ही सेनाप्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

इस मामले को सुलझाने के लिए गुरुवार को वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने जनरल वीके सिंह से मुलाक़ात की थी लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

जनरल सिंह दावा करते हैं कि उनकी जन्मतिथि मेट्रिक के सर्टिफ़िकेट के आधार पर मानी जानी चाहिए जबकि सरकार का कहना है कि सेना में उनके सभी दस्तावेज़ों में जन्मतिथि एक साल पहले की है.

'यही विकल्प था'

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा और एचएल गोखने के एक पीठ ने कहा है कि जब 21 जुलाई, 2011 को रक्षामंत्रालय ने ये निर्णय लिया कि जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1950 ही मानी जाएगी तब उसने एटॉर्नी जनरल से सलाह ली थी.

पीठ का कहना है कि इसके बाद जब जनरल सिंह ने वैधानिक शिकायत दर्ज की और 30 दिसंबर को सरकार ने उसे ख़ारिज करने का फ़ैसला लिया वह फ़ैसला भी एटॉर्नी जनरल के सुझाव पर ही लिया गया था.

पीठ ने सरकार से पूछा कि क्या सरकार 30 दिसंबर का अपना फ़ैसला वापस लेने को तैयार है, तो एटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने कहा कि वे इस पर सरकार से निर्देश लेंगे.

इसके बाद अदालत ने कहा कि यदि सरकार अपना फ़ैसला वापस ले लेती है तो जनरल सिंह के सामने और भी विकल्प होंगे.

अदालत ने कहा कि एक तो 21 जुलाई के फ़ैसले के ख़िलाफ़ वैधानिक शिकायत ख़ारिज होने के बाद अधिकारी उस फ़ैसले पर पुनर्विचार कर सकते हैं या फिर जनरल सिंह इस मामले में सैन्य न्यायाधिकरण में जा सकते हैं.

इमेज कॉपीरइट pti
Image caption रक्षा मंत्रालय ने अपने दोनों फ़ैसलों के लिए एटॉर्नी जनरल की राय ली थी

पीठ ने कहा कि जब सरकार ने सेनाध्यक्ष की शिकायत को ख़ारिज कर दिया तो उनके पास सुप्रीम कोर्ट आने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था.

अदालत का ये भी कहना था कि जितना मामला सामने आया है उससे लगता है कि न्याय की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.

हालांकि एटॉर्नी जनरल और सॉलीसिटर जनरल दोनों ने ही सरकार का बचाव करने की कोशिश की और कहा कि सरकार का जनरल सिंह के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं है.

अदालत के आदेश पर जनरल सिंह के वकील पुनीत बाली ने कहा कि निश्चित रुप से वे ख़ुश हैं लेकिन वे मुक़दमे के बारे में कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि ये न्यायालय में विचाराधीन है.

मामला

लंबे समय से चल रहे विवाद के बाद जनरल वीके सिंह ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके सेना के रिकॉर्ड में अपनी जन्मतिथि में सुधार करने की अपील की है.

दस्तावेज़ों के अनुसार जनरल वीके सिंह के मेट्रिक के प्रमाण पत्र में उनकी जन्म तिथि 10 मई, 1951 है लेकिन सरकार का कहना है कि यूपीएससी के फ़ॉर्म में जिसके ज़रिए वे सेना में भर्ती हुए उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1950 है.

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वह जनरल सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1950 को ही प्रामाणिक मानता है.

मंत्रालय का कहना है कि इसी जन्मतिथि के आधार पर उन्हें पिछली पदोन्नतियाँ दी गई हैं.

रक्षा मंत्रालय के 21 जुलाई, 2011 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जनरल सिंह ने एक वैज्ञानिक शिकायत दर्ज की लेकिन सरकार की ओर से 30 दिसंबर, 2011 को उसे भी ख़ारिज कर दिया गया.

यदि सरकार के अनुसार देखें तो सेनाध्यक्ष को मई, 2012 में सेवानिवृत्त होना पड़ेगा लेकिन यदि उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1951 मान ली जाती है तो उनकी सेवानिवृत्ति वर्ष 2013 में होगी.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि जनरल सिंह ने अदालत में 20 दस्तावेज़ पेश किए हैं जिसमें से 19 में उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1951 दर्ज है.

जनरल सिंह का कहना है कि सवाल उनकी सेवानिवृत्ति का नहीं, उनकी 'विश्वनीयता और प्रतिष्ठा' है.

विपक्षी दलों ने भी इस बात को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया है कि सेना के सर्वोच्च पद पर आसीन एक अधिकारी को लेकर उसने विवाद को अदालत तक पहुँचने की नौबत ला दी है.

संबंधित समाचार