चुनाव से जुड़ी उम्मीदें चकनाचूर हुईं....

महिलाएँ
Image caption झंडे का कारोबार अच्छा न चलने का काफ़ी नुक़सान हुआ है

पुराने लखनऊ में हाथी पार्क के सामने रेलवे लाइन के किनारे एक मोहल्ला है जवाहर नगर. अधेड़ उम्र की ताहिरा ख़ातून का परिवार यहीं रहता है. दो बच्चे हैं. पति मज़दूरी करते हैं.

परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए ताहिरा झंडे और टोपियां सिलने का काम करती हैं. ताहिरा साल भर से इंतज़ार कर रही थी कि विधान सभा का चुनाव आए, तो उनकी दीवाली हो जाए. लेकिन इस बार चुनाव आयोग की सख़्ती से ताहिरा मायूस हैं.

ताहिरा कहती हैं, "पहले चुनाव के दौरान दिन-रात सिलाई होती थी. 125 रुपए रोज़ मिल जाते थे. दो महीने में आठ-दस हजार रुपए कमा लेते थे. इस बार थोड़े दिन सिलाई हुई, अब बंद है."

चुनाव सामग्री के व्यापारी पार्टियों के झंडों और टोपियों का सचित्र रंगीन छपा-छपाया कपड़ा सौ-सवा सौ मीटर के बड़े थान में अहमदाबाद सूरत से मंगवाते हैं.

आमदनी

ताहिरा ख़ातून और उनके मोहल्ले की दूसरी महिलाएँ इस कपडे से अलग झंडे काटकर सिलती हैं.

झंडे के एक किनारे वह नेफ़ा सिला जाता है, जिसमे डंडा डालकर झंडा फहराया जाता है.

ताहिरा की पड़ोसन शमीम बानो, सोनमती मौर्य और लक्ष्मी भी काम ठप होने से मायूस हैं. इनका कहना है कि चुनाव के दौरान झंडों की सिलाई से मिलने वाले पैसे से परिवार के कई रुके कम हो जाते थे.

जैसे ईंट ख़रीदकर एक और कोठरी बनवाना, नए कपड़े सिलवाना या बच्चों की पढ़ाई की फीस वगैरह–वगैरह. लेकिन अब परिवार की अतिरिक्त आमदनी का यह ज़रिया ख़त्म हो गया.

बड़ा नुक़सान

गनीमत है कि ताहिरा का काम ही बंद हुआ, जेब से कुछ नहीं गया. इन लोगों को झंडे सिलाई का काम देने वाली बबली का तो और नुक़सान हो गया.

बबली के घर में झंडों का सामान बोरों में भरा रखा है. मांग के मुताबिक़ माल आख़िरी वक़्त पर तो तैयार हो नहीं सकता, इसलिए अग्रिम तैयारी करनी पड़ती है.

Image caption कई महिलाओं को पहले से काम देने का वादा किया गया था

बबली के पास क़रीब 50 महिलाओं का नेटवर्क है. लेकिन अब उनके पास उन्हें देने के लिए काम ही नहीं है.

बबली कहती हैं, "सबसे बड़ी परेशानी हमारी यह है कि जहाँ भी हम काम के लिए जाते हैं, जिनसे हमारा कम चल रहा था, वह कहते हैं कि पीछे से कोई काम ही नहीं आ रहा है, कोई माल ही नहीं ले रहा है, तो हम आपसे क्या बनवाएं. क्या सिलवाएँ? जब हमारे पास ही काम नहीं है, तो हम महिलाओं को क्या दें?"

एक अनुमान के मुताबिक़ पूरे उत्तर प्रदेश में क़रीब 40 करोड़ रुपए का झंडे का कपड़ा इसी तरह आकर बोरों में बंद रखा है.

जब झंडे नही बन रहें तो बगल की बांस मंडी से झंडे और बैनर लगाने के लिए खपच्चियाँ भी नहीं बिक रही.

अनुमान है कि इस तरह चुनाव के दौरान क़रीब एक लाख लोगों को मेहनत मज़दूरी के काम मिल जाते थे, जो इस बार बंद हैं.

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