'पति मर गया, कर्म तो करना ही पड़ेगा'

उत्तर प्रदेश चुनावी बुख़ार से तप रहा है. मुलायम सिंह अंबेडकर नगर में अस्पताल बनाने की बात कर रहे हैं. राहुल गाँधी हाथी के पैसे खाने की बात कर रहे हैं. मायावती विकास देने की बात कर रही है.

लेकिन कहीं कोई भूख, बीमारी, गरीबी से सबसे ज़्यादा मार खाए मुसहर समुदाय की बात नहीं कर रहा.

Image caption काशी अपने दामाद का अस्पताल में इलाज भी नहीं करा सके.

मुसहर का अर्थ होता है मूस का आहार हर लेने वाला. यह भूमिहीन लोग मज़दूरी करते हैं.

जब काम नहीं मिलता तो अनाज के लिए चूहों के बिलों को खोद कर उसमे जमा थोड़े अनाज को निकाल कर अपना जीवन चलाने को मजबूर होते हैं.

इनकी आबादी बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे कुशीनगर-देवरिया के इलाकों में यहाँ वहां फैली हुई है.

बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त ने कुशीनगर ज़िले के धुरिआभाट गाँव में रहने वाले दो मुसहरों के गावं जा कर इनसे बातचीत की.

‘मेरा नाम काशी है’

रविवार को मेरा दामाद नथुनी मर गया. नथुनी की मौत तपेदिक से हुई. बीमार था इसलिए काम नहीं कर पाता था और काम नहीं कर पाता था इसलिए पैसे नहीं होते थे.

पैसे नहीं होते थे तो खाता कहाँ से.

कमा कर देने वाला कोई था नहीं. उसकी पत्नी क्या काम करती, हल-कुदाल तो चला नहीं सकती थी तो कहीं मिट्टी ढोने का ऐसा ही दूसरा छोटा मोटा काम करती है.

दिन भर काम के बाद 40-50 रुपए मिलते हैं अब उसमे घर के चार लोगों का गुज़ारा कैसे चले और इलाज कहाँ से हो. एक बार खाना मिलता था एक बार नहीं!

नथुनी को पास ही अस्पताल में ले कर गए थे पर उन्होंने भर्ती नहीं किया.

बिना पैसे के कोई कैसे कामयाब होगा.

मेरे पास रोज़गार का सरकारी कार्ड है लेकिन उसके पास नहीं था. मेरा बहुत पहले मुफ्त में बन गया था लेकिन उसका नहीं बना फिर रोज़गार कार्ड बनाने के लिए चाहे प्रधान हो या कोई कर्मचारी 100 रुपए लेता है. अब वो 100 रुपए कहाँ से लाता सो उसका कार्ड नहीं बना.

नथुनी के मरने के दूसरे दिन सुबह प्रधान बिना पैसे के 50 किलो गेहूं 50 किलो चावल दे गया पर उसमे क्या होगा. इससे ज़्यादा तो उसके कर्म में लग जाएगा. जब वो मरा तो मैं जिसके दरवाजे़ पर काम कर रहा था उसने कफ़न दे दिया लकड़ी हमने यहाँ वहां से चीर ली.

मेरा एक और दामाद है उसका भी यही हाल है.

चुनाव चल रहा है लोग आते हैं कह सुन कर समझा कर वोट के विषय में बता कर चले जाते हैं. इतने नेता हैं, हमारी रक्षा कोई नहीं करता.

‘मेरा नाम निर्मला है’

Image caption निर्मला मज़दूरी करके गुज़ारा करना चाहती हैं.

नथुनी कई महीनों से कुछ ख़ा पी नहीं रहे थे कोई काम नहीं कर रहे थे. मैं कहीं मजदूरी करती हूँ. जिस दिन काम मिल जाता है उस दिन ख़ा लेते हैं जिस दिन नहीं मिलता उस दिन उपवास करते हैं. हफ़्ते में कई बार उपवास होता है.

मेरा बेटा आठ साल का है, बेटी पांच साल की.

नथुनी के मरने के बाद प्रधान में जो प्रधान ने गेहूं चावल भेजा उससे चूल्हा जला, तीन चार दिन के बाद मेरे बच्चों ने भर पेट खाना खाया. आंगनवाडी में खाना देते है बेटिन जाती है तो वहां ख़ा लेती है बेटा नहीं जाता इसलिए भूखा रह जाता है.

एक बार कहीं से दस बीस रूपये उधार मांग कर पति को अस्पताल ले गई थी उसके बाद पैसे नहीं जुड़े तो नहीं गए.

पति के कर्म में दस बीस हज़ार रुपए लग जायेगें. अब मर गया है तो कर्म तो करना ही लोगा. कहीं से उधार मांग कर भीख मांग कर पैसे लायेगें.

उसके बाद बेटी को घर छोड़ कर कहीं काम करने जाउंगी और बच्चों को खिलाऊँगी.

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