उत्तर प्रदेश के पांच साल का राजनीतिक लेखा-जोखा

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Image caption उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति और समुदाय की बड़ी भूमिका है

पिछले पांच सालों में उत्तर प्रदेश में राजनीति जितनी जाति और संप्रदाय आधारित हुई है, उतनी शायद पहले कभी नहीं थी.

जो जातियां दृढ़तापूर्वक अपनी पहचान बनाने में नाकाम रहीं, वे अपने को राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी से वंचित महसूस कर रही हैं.

उत्तर प्रदेश भारत का वो राज्य है जहां पूरी दुनिया के आठ प्रतिशत ग़रीब निवास करते हैं. इस राज्य में साक्षरता दर तो सबसे कम है, लेकिन शिशु और मातृ मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है.

सड़कों की स्थिति दयनीय है. गांवों में औसतन दो घंटे बिजली रहती है, जबकि अन्य हिस्सों में नौ घंटे बिजली रहती है. यानी “बिजली-पानी-सड़क” का सपना अभी सपना ही बना हुआ है.

बावजूद इसके, जाति-आधारित राजनीति आज भी एक बड़ी सच्चाई है.

ये ध्यान देने योग्य बात है कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को भी अन्य पिछड़ा वर्गों की खोज के लिए मजबूर होना पड़ा है.

परंपरागत वोट

ओबीसी और दलित राजनीति के उभार ने कांग्रेस के परंपरागत ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम वोट को नुकसान पहुंचाया है.

अपने इस वफ़ादार वोट बैंक को दरकिनार कर कांग्रेस पार्टी ने ओबीसी चेहरे के रूप में एक कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा को आगे किया है. इसके अलावा पार्टी ने क़रीब सौ ओबीसी नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा है.

साथ ही कुम्हारों, गड़ेरियों, मोचियों और बुनकरों जैसे बेहद पिछड़े समुदाय के लोगों को उनके परंपरागत व्यवसाय को आगे बढ़ाने में आर्थिक मदद का आश्वासन दिया है.

इसके अलावा दलित वर्ग के पासी समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की है, जो कि बीएसपी के वोट बैंक चमारों के बाद सबसे बड़ा दलित समुदाय है.

वहीं भारतीय जनता पार्टी को अपने पुराने ओबीसी चेहरा कल्याण सिंह को छोड़कर ओबीसी मतदाताओं को रिझाने के लिए पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश से उमा भारती को बुलाना पड़ा है, जो कि लोध समुदाय से हैं.

यही नहीं, बीजेपी को ओबीसी मतों के चक्कर में बीएसपी से निकाले गए पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह जैसे नेताओं का पार्टी में स्वागत करने में भी कोई हिचक नहीं हुई. जबकि उनके ऊपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं.

जहां तक बहुजन समाज पार्टी के दलित वोट बैंक सवाल है, तो वह फ़िलहाल उसके साथ ही है. लेकिन ब्राह्मण, मुस्लिम और ओबीसी का गठजोड़ उसके हाथ से खिसक गया है.

यही नहीं, दलितों में भी पासी समुदाय को ये शिकायत है कि उन्हें चमार वर्ग की तुलना में हाशिए पर रखा गया.

यहां तक कि पार्टी में कुछ ब्राह्मण चेहरों को आगे करने के कारण चमार वर्ग में भी काफ़ी रोष है. हालांकि इसी असंतोष के चलते साल 2008 में मायावती को एलान करना पड़ा था कि उनका उत्तराधिकारी दलित परिवार से ही होगा.

बीएसपी से मुस्लिम समुदाय भी कुछ हद तक दूर दिख रहा है. इसकी वजह सिर्फ़ यह नहीं है कि मायावती ने उनके लिए कुछ ख़ास नहीं किया, बल्कि यह कि उनकी सरकार ने आतंकवादी होने के आरोप में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवकों को गिरफ़्तार किया.

इसके अलावा बटला हाउस मुठभेड़ और आज़मगढ़ को “आतंकवाद की नर्सरी” बताने जैसे मामलों में मायावती की चुप्पी भी मुस्लिमों में उनके प्रति नाराज़गी की वजह है.

मुस्लिम समर्थन

समाजवादी पार्टी के पास जहां यादव समुदाय का समर्थन है, वहीं बीएसपी के पास दलित वर्ग का. लेकिन दोनों में एक अंतर ये है कि सपा को मुस्लिमों का समर्थन मिल रहा है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि मुस्लिम वोट पूरा सपा को ही मिलता रहा हो, भले ही पार्टी के मुखिया का नाम “मौलाना” पड़ गया था. फ़िलहाल मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस और पीस पार्टी में बंटा दिख रहा है.

राजनीति में अपराधियों की भूमिका को लेकर समाजवादी पार्टी की अभी भी किरकिरी होती है. मुलायम सिंह यादव को घोषणा करनी पड़ी है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो “गुंडों” की जगह जेल में होगी, भले ही वो समाजवादी पार्टी के ही क्यों न हों.

उनके बेटे और उत्तराधिकारी अखिलेश यादव ने दाग़ी छवि वाले नेता डीपी यादव से दूरी बनाकर ऐसा संकेत भी दे दिया.

पिछले पांच सालों में मुस्लिम मतदाताओं में बढ़ रही राजनीतिक कुशलता भी दिखी है. बीजेपी को सत्ता से किनारे करने के बाद उन्हें मतदान के लिए रणनीति बनाने की ज़रूरत नहीं महसूस हो रही है.

मुस्लिम समुदाय अब अपनी आर्थिक तरक्की के लिए मतदान करने का इच्छुक दिख रहा है.

जहां कांग्रेस को लगता है कि उसके 4.5 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण के फ़ैसले से मुस्लिमों का झुकाव उसकी ओर हो जाएगा, तो दूसरी पार्टियां भी इस तरह के झुनझुनों का वादा करने में पीछे नहीं हैं.

विकास

जहां तक विकास की बात है, पिछले पांच साल में उत्तर प्रदेश में शहरीकरण और राजमार्गों के नाम पर ज़मीन अधिग्रहण के अलावा कोई ख़ास काम नहीं हुआ.

अधिग्रहण का मामला भी क़ानूनी पेंच में फँस गया. मायावती बिजली परियोजनाओं के विकास की बात करती हैं लेकिन फ़िलहाल ज़मीन अधिग्रहण से ज़्यादा कुछ नहीं हुआ है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति समीकरण आर्थिक विकास संबंधी जागरूकता में परिवर्तित नहीं हो सका है. दूसरी ओर, विकास का सीमित लाभ भी कुछ विशेष समुदाय तक ही सिमट कर रह गया.

इन परिस्थितियों में, उत्तर प्रदेश में केवल वही पार्टी सफल हो सकती है जो इन जातियों और समुदायों के राजनीतिक और आर्थिक हितों को पूरा कर सके.

इन्हें ज़्यादा से ज़्यादा तादाद में इन उपेक्षित समुदायों को अपने साथ जोड़ना होगा.

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