मंत्री की शिकायत कितना उचित कदम?

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Image caption ऐसा भी पहली बार हुआ है जब किसी मंत्री ने चुनाव आयोग की सीधे तौर पर अवमानना की हो

चुनाव आयोग और सलमान खुर्शीद के बीच का विवाद जैसे-जैसे तूल पकड़ रहा है, वैसे-वैसे सवाल ये भी उठ रहे हैं कि चुनाव आयोग ने इस मामले में ख़ुद कार्रवाई करने के बजाय राष्ट्रपति को शिकायत करने का विकल्प क्यों चुना?

जहां कुछ विशेषज्ञ इस विवाद को कार्यपालिका के भीतर पैदा हुए विवाद के रूप में देख रहे हैं, वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव आयोग ने व्यावहारिक क़दम उठाया है.

संवैधानिक मामलों के जानकार सुभाष कश्यप से बीबीसी ने पूछा कि चुनाव आयोग का राष्ट्रपति को शिकायती चिट्ठी भेजना कितना उचित है?

उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति को शिकायत पत्र भेजा जाना एक तरह से चुनाव आयोग की ओर से कार्रवाई ही है. चूंकि ये एक केंद्रीय मंत्री से जुड़ा मामला है और केंद्रीय मंत्री प्रधानमंत्री की सलाह के बाद ही राष्ट्रपति द्वारा ही नियुक्त किए जाते हैं, तो ऐसे में राष्ट्रपति को शिकायत पत्र भेजना एक सही क़दम है.”

बीबीसी से बातचीत में सुभाष कश्यप ने कहा कि चुनाव आयोग के अधिकार एक तरह से सरकार के अधीन ही होती हैं और अगर आयोग किसी कार्रवाई का निर्णय लेता भी है तो उसे सरकार के परामर्श की ज़रूरत पड़ती है.

‘बीच का रास्ता’

हालांकि चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को परिभाषित करते हुए सुभाष कश्यप ने कहा, “निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करवाने के लिए चुनाव आयोग के पास कई अधिकार होते हैं. अगर चुनाव आयोग चाहता तो इस मामले में और कड़ी कार्रवाई भी कर सकता था, लेकिन ऐसा करने से उन गुटों को फ़ायदा पहुंचता जो इस मुद्दे का इस्तेमाल कर वोट-बैंक राजनीति करते."

उनका मानना है, "अगर आयोग चाहता तो उस निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव स्थगित कर सकता था, लेकिन इस कार्रवाई से कोई हल नहीं निकल सकता था. ऐसे में आयोग ने एक बीच का रास्ता अपनाया और राष्ट्रपति को शिकायत पत्र लिखा."

सुभाष कश्यप ने कहा कि एक मंत्री के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति को शिकायत पत्र भेजा जाना अपने आप में ही एक सख़्त क़दम है.

उन्होंने कहा कि अब ये प्रधानमंत्री पर निर्भर करता है कि वो क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद को किस तरह की हिदायत देते हैं.

उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री सलमान खुर्शीद को ये समझाएंगें कि उनका व्यवहार उचित नहीं था और एक संवैधानिक संस्थान की इस प्रकार अवमानना करना ठीक नहीं था.

‘पहला मामला’

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Image caption अब ये प्रधानमंत्री पर निर्भर करता है कि वो क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद को किस तरह की हिदायत देते हैं: सुभाष कश्यप

सुभाष कश्यप ने बीबीसी को बताया कि ऐसा पहली बार हुआ है जब चुनाव आयोग ने किसी मंत्री के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति को शिकायत पत्र भेजा हो.

उन्होंने कहा कि ऐसा भी पहली बार हुआ है जब किसी मंत्री ने चुनाव आयोग की सीधे तौर पर अवमानना की हो.

एक चुनावी सभा के दौरान सलमान ख़ुर्शीद ने ये कह दिया था कि चुनाव आयोग चाहे उन पर पाबंदी लगाए या फिर उन्हें फांसी दे दे, लेकिन वे पिछड़े मुसलमानों को उनका हक़ दिलाकर रहेंगे.

यहां सवाल ये उठता है कि क्या चुनाव प्रचार के दौरान किसी मंत्री द्वारा दिए गए बयान को उनकी पार्टी का विचार माना जाए, या इस मामले को केवल एक व्यक्ति-विशेष से ही जोड़ा जाए?

ये सवाल पूछे जाने पर सुभाष कश्यप ने कहा, “मेरी समझ में इस मामले को केवल क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद से ही जोड़ कर देखा जाना चाहिए. लेकिन उन्होंने आचार संहिता के साथ साथ संविधान के ख़िलाफ़ जाने की कोशिश की है. जहां तक कार्रवाई की बात है, तो अगर कोई इस मामले में अदालत में याचिका दायर करता है तो चुनाव के बाद अदालत ही तय करेगी कि इस मामले में क़ानून मंत्री के ख़िलाफ़ क्या क़दम उठाया जा सकता है.”

अब देखना ये होगा कि प्रधानमंत्री इस मामले पर क्या कार्रवाई करते हैं.

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