खनन के ख़िलाफ़ खड़े राजस्थान के शिक्षक

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Image caption खनन के ख़िलाफ़ जागरूकता का नाटक प्रस्तुत करती शिक्षकों की टोली

भीलवाड़ा इन दिनों खनन के संकट से गुज़र रहा है. खनन की चकाचौंध में कितनों को रातों रात लखपति, करोड़पति बनने की राह नज़र आ रही है, लेकिन स्वार्थ की इसी राह पर भीलवाड़ा एक बहुत बड़ी ग़लती करता जा रहा है.

राजस्थान के इस ज़िले के मांडल ब्लॉक में काला ग्रेनाइट पत्थर प्रचुर मात्रा में है.

दशकों तक यह पत्थर अनुपयोगी घोषित रहा. इसे पसंद नहीं किया जाता था. सो, पत्थर सोए हुए थे और साथ साथ खदान माफिया भी.

पर छोटे झाड़ीदार पेड़ों वाले दूर तक पसरे खुले मैदानों में किसी आधुनिक कला वीथिका की तरह सजाए गए लगते ये पत्थर अब शांत नहीं है. इनमें हलचल हो रही है. हलचल पैदा कर रही हैं मशीनें. प्रकृति की इस सदियों पुरानी ‘गैलरी’ को बुलडोज़र उखाड़ रहे हैं, कटर मशीनें सिल्लियां काट रही हैं.

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दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों का आय़ोजन हुआ तो सजावट और तामझाम में पैसा पानी की तरह बहा. सजावट के नए-नए तरीके खोजे गए. कथित रचनात्मकता के लिए संसाधनों और पैसों का जिस तरह से इस्तेमाल हुआ वो मामला अब अदालतों में है.

काला ग्रेनाइट बना निशाना

इसी का एक निशाना बना भीलवाड़ा का काला ग्रेनाइट. क्षेत्र के लोग बताते हैं कि कॉमनवेल्थ खेलों में निखरकर सामने आया यहां का काला ग्रेनाइट अब इस इलाके के लिए अभिशाप बन गया है.

क्षेत्र में तेज़ी से खनन जारी है. कई इलाकों में खनन की स्थिति इतनी चिंताजनक है कि आवंटित पट्टों के अलावा सरकारी ज़मीन और गांवों के इर्द-गिर्द बची चरागाह की ज़मीन पर भी खनन माफ़िया मशीनें लगाकर पत्थर खोदने में लगे हैं.

पिछले दिनों स्थानीय लोगों और संगठनों द्वारा खनन पर एक राज्यस्तरीय जनसुनवाई में हिस्सा लेने का भी मौक़ा मिला.

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Image caption भीलवाड़ा के मांडल क्षेत्र में खनन का काम तेज़ी से चल रहा है. जगह-जगह खनन कंपनियों के बोर्ड दिख रहे हैं

यहाँ ज़िला कलेक्टर ने स्थानीय लोगों के विरोध का स्वर भी सुना और प्रशांत भूषण जैसे अधिवक्ताओं की उलाहना भी. सरकारी देखरेख में लापरवाही की बात भी निकलकर सामने आई. ज़िलाधीश ने वादा किया कि दो सप्ताह के भीतर पूरे ब्लॉक की सार्वजनिक दीवारों पर खनन के पट्टों का पूरा ब्यौरा लिखा जाएगा ताकि अवैध खनन पर नज़र रखी जा सके.

हालांकि ज़िलाधीश का वादा सिर्फ़ वादा निकला. सरकारी दीवारें अभी तक ऐसी किसी भी सूचना के लिखे जाने का इंतजार ही कर रही हैं और क्षेत्र में खनन जारी है.

गाँव वालों से बात करने पर स्थिति की गंभीरता समझ में आई. पता चला कि खनन ने ज़मीनों की कीमतें आसमान पर पहुंचा दी हैं. ये क़ीमतें लोगों को लुभा रही हैं और रोटी पैदा करने वाली मिट्टी उजड़ने के लिए नीलाम की जा रही है.

रंग-बिरंगी सपने

इसी पड़ताल के दौरान गांव टोंकरा जाना हुआ. यहाँ के प्राथमिक विद्यालय में दाखिल होते ही मन खुश हो गया.

एकदम साफ परिसर, खूब सारे नीम के पेड़, घनी छांव में खेलते बच्चे, साफ कक्षाएं, पीने योग्य पानी की व्यवस्था और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग और स्वच्छ शौंचालय.

आमतौर पर ये तस्वीर सरकारी विद्यालयों की नहीं होती.

इस विद्यालय के एक शिक्षक लादू सिंह रावत दूसरे शिक्षकों के लिए एक मिसाल हो सकते हैं.

दिनभर विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने के बाद लादू सिंह जी आस पास के कुछ गांवों के अन्य शिक्षकों के साथ जन-जागरण का काम करते हैं.

जनजागरण, ताकि लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके, उन्हें खनन के नुक़सानों और खनन के नाम पर हो रहे छलावों के बारे में बताया जा सके और इसे जिस सीमा तक संभव हो सके, रोका जा सके.

लादू सिंह और उनके साथियों से बातचीत करने पर पता चला कि आस-पास के कुछ गांवों में जो ज़मीनें बेची गई हैं, उनमें सबसे ज़्यादा ज़मीनें दलितों की बिकी हैं.

अन्य जातियों के लोगों को तोड़ने में और उन्हें दलाली के लिए प्रेरित करने में भी खनन माफिया सफल रहे हैं.

इसका परिणाम यह हुआ है कि दलालों ने गांवों के दलितों को पैसों की सीढ़ी पर चढ़कर सुंदर ख्वाब देखने का लालच दिया है. गरीब और शोषित दलित को सपनों में मोटरसाइकिल, रंग-बिरंगे कपड़े और चश्मे, डीवीडी प्लेयर, टीवी और मोबाइल दिखाई देने लगे हैं. ज़मीन बिक रही है, प्राकृतिक संसाधनों की क़ीमत पर उपभोग के संसाधन आ रहे हैं.

पर ऐसा क्यों है कि अधिकतर दलित इसका निशाना बन रहे हैं? इस सवाल पर पूर्व सरपंच कहते हैं कि अन्य जातियों के लोग अपनी ज़मीनें भी बेचेंगे पर तब जब दाम और ज़्यादा चढ़ेगा.

वे कहते हैं, "शुरुआती चढ़त में वो अपनी ज़मीनें रोककर और दलितों को उकसाकर दलाली से जेबें भर रहे हैं. दलितों के पास ज़मीन कम हैं और गरीबी के कारण संसाधनों के प्रति आकर्षण ज़्यादा इसलिए वे आसानी से इस चंगुल में फंस रहे हैं."

जागरुकता

रात को स्कूल के शिक्षक लादू सिंह और उनके साथी हमें फिर मिल गए. इस बारे बच्चों को नहीं, पूरे समाज को सिखाते हुए.

लादू सिंह रावत और उनके साथियों से मांडल ब्लॉक के थाणा क्षेत्र में कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे.

पैंट-कमीज़ में स्कूलों में दिखाई देने वाले ये शिक्षक अब पारंपरिक पोशाकों में थे. सफेद और लाल साफे, धोती और कुर्ते में. साथ में पर्यावरण जागरूकता के नारे वाले पोस्टर. कठपुतलियों के खेल, गाने, जो पेड़ लगाने, लड़की को पढ़ाने और पर्यावरण को बचाने की बातें कह रहे थे.

एक नाटक का मंचन भी हुआ जिसमें गांव के सरपंच से लेकर दलाल तक और खनन माफिया से लेकर ज़मीन बेंचने वाले तक की भूमिकाएं थी.

क्या इन नाटकों का कुछ असर होता है, इस सवाल पर थाणा क्षेत्र के शंकर कहते हैं कि लोगों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह कहीं और की नहीं, उनकी अपनी कहानी है.

वे कहते हैं कि उनके साथ ऐसा ही हो रहा है. इन नाटकों में लोग खुद को खोज-देख पाते हैं और इसलिए इनसे जुड़ते हैं. जो बातें सीधे तौर पर कहना आसान नहीं है, उन्हें हम नाटक के माध्यम से सहजता से कह लेते हैं.

ज्ञानगढ़ के ओंकार सिंह जी कहते हैं कि लोगों पर इसका असर दिखना शुरू हुआ है. लोग अब हमें बुलाते हैं कि आप हमारे क्षेत्र में आइए और लोगों को समझाने का, उनके बीच अपने संचार के तरीकों से बातों को रखने का काम कीजिए. यह एक अच्छा संकेत है.

लादू सिंह और उनके साथी ऐसा क्यों करते हैं. उनको इसके लिए प्रेरणा कहाँ से मिलती है, इसपर वो कहते हैं, "हमें लगता है कि हमारा पर्यावरण हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है."

वे कहते हैं, "हम शिक्षक हैं और शिक्षक का कर्तव्य है लोगों को शिक्षित करना. केवल पाठशाला में सिखाने से स्थितियां अच्छी नहीं होंगी क्योंकि पाठशाला से बाहर स्थितियां खराब हो रही हैं. फिर ये काम हम दूसरों के लिए कहां कर रहे हैं. ये तो हमारे अपने क्षेत्र की ज़मीन और पर्यावरण का मसला है, हम कुछ बचा पाएंगे तो हमारा भी हित होगा."

आज इन शिक्षकों के प्रयासों से थाणा क्षेत्र की 250 बीघे ज़मीन को गांववालों के श्रमदान और आर्थिक मदद से एक संरक्षित चरागाह में बदला जा सका है. यहां वृक्षारोपण का काम सामूहिक रूप से किया जा रहा है. गांव के जानवरों के लिए एक सुरक्षित और हरा-भरा चरागाह है. साथ साथ पेड़ों की वजह से क्षेत्र में हरियाली बढ़ रही है.

भले ही यह कोशिश छोटी हो, पर इन शिक्षकों के जनजागरण अभियान और ग्रामीणों के प्रयास से एक बड़े खनन माफिया के खिलाफ़ संगठित शक्ति इस क्षेत्र में खड़ी दिखाई दे रही है जो बाकी कई ज़िलों, राज्यों के लिए एक मिसाल है.

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