उत्तर प्रदेश चुनाव 2012: बदलाव की बाट जोहती अनीता

अनीता
Image caption अनीता भूमिहीन मज़दूर है. फिर भी उसतक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच रहा है.

फरुखाबाद से छिबरामऊ जाते हुए आलू के खेतों और कोल्ड स्टोरेज के बीच सड़क पर चलते हुए बाएं तरफ एक गाँव और गोबर के कंडे पाथती हुई एक महिला दिखाई दी.

जब तक गाडी रोककर उस महिला तक पहुँचते वह अपना काम खत्म कर गोबर का खाली पलरा लिए वापस घर जाने लगी.

मै और बीबीसी हिन्दी के संपादक अमित बरुआ उसके साथ चल दिए.

अनीता से बातचीत शुरू करने का ये सही वक्त था.

आप इसी गाँव की हैं ?

उसने ना में सर हिलाया.

अच्छा तो यह आपकी ससुराल है? जवाब आया- हाँ.

मायका कहाँ है?

हरदोई. बगल के जिले में.

ये सब शिष्टाचार की बातें करते हुए वह हमें अपने घर ले जाने के लिए तैयार हुई.

अम्बेडकर ग्राम की पक्की सड़क पर चंद कदम चलते- चलते अनिता ने बताया कि उसके पास जमीन नही है. मेहनत मजदूरी करके गुजर–बसर होता है.

चलने के ही बाद गाँव में जो पहला घर था, युवती उसमे घुसी और पीछे पीछे हम भी.

पक्की ईंटों की दीवारों और छप्पर के घर में आँगन में चारपाई पर बैठे मिले अनीता के पति राम औतार. गोद में छोटा सा बच्चा. अनीता ने हाथ धोया और दूसरे बच्चे को गोद में उठाया.

राम औतार जाति से नाऊ हैं. मगर गाँव में कई नाई होने से बार्बर का काम नही चलता. बहुत से लोग अब दाढी तो रेजर से खुद ही बना लेते हैं.

पति–पत्नी दोनों अनपढ़ हैं. मगर दोनों का पढ़ाई का महत्त्व मालूम हो गया है अनीता और राम औतार वह गलती नही दोहराएंगे जो उनके मां-बाप ने की थी.

इसलिए दो बच्चों को स्कूल और दो को आंगनबाडी केंद्र भेजते हैं.

बदलाव का इंतज़ार

Image caption अनीता और उसके पति के पास एक ही सरकारी कार्ड है और वो है मतदाता पहचान पत्र.

पांच बच्चों और पत्नी समेत सात लोगों का पेट पालने के लिए राम औतार आलू खोदने और भट्टा पर ट्राली भरने का काम कर लेते हैं.

पति पत्नी दोनों का कहना है कि पिछले पांच सालों में उनके जीवन में कुछ बदलाव नही आया.

गाँव में नरेगा लागू है मगर अनीता या उसके पति का जाब कार्ड नही बना.

सरकार ने गाँव में गरीबों के लिए कालोनी बनवाई. मगर उसमे भी इनका नाम नही आया. सस्ते राशन के लिए बीपीएल कार्ड भी नही बना.

ऐसे कैसे हो सकता है कि इस अति पिछड़े नाई परिवार को किसी सरकारी योजना का लाभ नही मिला.?

मै यह सोच ही रहा था. तभी दांतों में ब्रश रगड़ते हुए एक युवक दाखिल हुआ.

यह हैं अनीता के पड़ोसी शिव कुमार धोबी. शिव कुमार के पास दो एकड़ जमीन है. शिव कुमार ने ही अपने घर के बगल में पडी आबादी की जमीन अनीता को ये घर बनाने के लिए दिलवाई.

सरकारी योजना का लाभ नहीं

शिव कुमार ने ही मेरे इस सवाल का जवाब दिया कि अनीता को पांच साल में किसी सरकारी योजना का लाभ नही मिला.

गाँव में बिजली लाइन है मगर सिंचाई के लिए समय से और जरुरत भर की बिजली नही मिलती.

सारे अफसर केवल जाटव टोले में जाते हैं. धोबी और दूसरे हरिजन टोले में वह बुलाने पर भी नही आते. इसीलिए इधर के लोगों को कोई फायदा नही मिलता. अब शायद आपको ये बताने की जरुरत नही कि प्रदेश सरकार की मुखिया जाटव बिरादरी से हैं.

राम औतार कहते हैं जाटव लोगों को हर फायदा है, सरकार उनकी है. मुलायम बैठेंगे तो यादव लोगों को फायदा होगा.

ये गाँव भोजपुर विधान सभा क्षेत्र में पड़ता है. वर्तमान विधायक समाजवादी पार्टी से हैं.

चुनाव की बात कुरेदने पर शिव कुमार कहते हैं कि वह इस बार कांग्रेस को मौका देना चाहते हैं क्योंकि कांग्रेस ने एक ईमानदार और बुजुर्ग कांग्रेसी नेता को पहली बार चुनाव मैदान में उतारा है, जो सरकार से एक-एक रुपए का हिसाब लेने का वादा कर रहें हैं.

अनीता और उसके पति के पास सारकार की और कोई चीज भले न हो, मगर वोटर कार्ड जरुर है.

पति पत्नी दोनों कहते हैं कि वोट जरुर डालेंगे. मगर किसे देंगे?

जवाब है अभी पता नही.

दोनों कहते हैं जो आगे जीतता नजर आएगा उसको डाल देंगे.

वोट बेकार करने से क्या फायदा?

पांच साल में और कुछ बदला हो या न बदला हो कम से कम वोट देने के बारे में लोगों का नजरिया तो बदल ही गया है.

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